पूरी तरह समान नहीं यह संहिता

उत्तराखंड और गुजरात के बाद मध्य प्रदेश ने भी बनाया समान नागरिक संहिता का कानून. मगर राज्य के आदिवासी समुदायों को रखा गया इसके दायरे से बाहर

इलस्ट्रेशन: सिद्धांत जुमडे

महाराष्ट्र, असम और छत्तीसगढ़ सरीखे राज्य अभी समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में ही हैं. उधर, भगवा-शासित राज्यों के बीच मध्य प्रदेश बाजी मारते हुए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पारित करने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया. 21 जुलाई को मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता वाली राज्य मंत्रिपरिषद ने विधानसभा के मॉनसून सत्र में यूसीसी विधेयक को मंजूरी दे दी.

230 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ भाजपा के 164 विधायक होने के कारण विधेयक को पारित कराने में कोई विशेष कठिनाई नहीं आई. अब अगला कदम राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त करना है. इस दिशा के पहले प्रायोगिक मॉडल माने जा रहे उत्तराखंड के यूसीसी को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल चुकी है, जबकि गुजरात के यूसीसी को अभी इस मंजूरी का इंतजार है.

मध्य प्रदेश का यूसीसी विधेयक अपने दोनों पूर्ववर्ती कानूनों की मूल खासियतों—जैसे बहुविवाह पर रोक, लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण आदि—को अपनाता है, मगर गुजरात की तरह यह भी उत्तराखंड के यूसीसी की हूबहू प्रति नहीं है. इसके बजाए, इसकी कुछ धाराओं को राज्य की विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया गया है, विशेषकर इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मध्य प्रदेश की लगभग 21 फीसद आबादी जनजातीय है.

ऐसी संहिता, जिसे समान होने का दावा किया जाता है, उसमें शुरुआत से ही अपवाद शामिल करना पड़ा. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखा जा सके क्योंकि आदिवासी समुदायों के परंपरागत रीति-रिवाजों और प्रथाओं को संविधान की ओर से संरक्षण प्राप्त है. ऐसी अटकलें थीं कि उन आदिवासी लोगों को यह छूट नहीं होगी, जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है. मगर विधेयक के अंतिम स्वरूप में ऐसा कोई ‘अपवाद के भीतर अपवाद’ नहीं रखा गया.

आखिर यह किसकी विरासत?
यादव ने मंत्रिपरिषद की बैठक के लिए चुने गए स्थल के जरिए भी सियासी संदेश दिया. वह था जगदीशपुर, जिसे पहले इस्लाम नगर के नाम से जाना जाता था और यह अठारहवीं सदी की शुरुआत में स्थापित भोपाल रियासत की पहली राजधानी था. इसकी स्थापना अफगान दोस्त मोहम्मद खान ने की थी. ओरकजई पठान समुदाय से संबंध रखने वाला वह शख्स सीमांत क्षेत्र में एक अपराध करने के बाद वहां से भाग आया था.

उसी ने चमन महल का निर्माण कराया था, जहां इस बार मंत्रिमंडल की बैठक की गई. इस्लाम नगर उन कई स्थानों में शामिल है, जिनके नाम पिछले कुछ वर्षों में बदले गए हैं. 2023 में इसका नाम बदलकर जगदीशपुर कर दिया गया.

बैठक से पहले यादव ने क्षेत्र के इतिहास का जिक्र किया और इसकी मूल पहचान गोंड राज्य के रूप में रेखांकित की. उन्होंने कहा, ‘‘जगदीशपुर लंबे संघर्ष, समृद्ध विरासत और सभ्यता का साक्षी रहा है तथा यह गोंड, सिंधिया और राजपूत शासन का प्रतीक है.’’ उन्होंने भोपाल रियासत के उस इतिहास का जिक्र नहीं किया, जिस पर नवाबों और बेगमों के वंश ने शासन किया था. उन्होंने कहा, ‘‘जगदीशपुर में मंत्रिमंडल की बैठक करना इस स्थान के समृद्ध इतिहास के प्रति सम्मान प्रकट करने का प्रतीक है.’’

इसमें शक नहीं कि सिविल कानून में अपवादों की सूची से जो पहलू हटाए गए हैं, उनका भी एक सियासी संकेत है. इस मामले में मध्य प्रदेश का यह विधेयक पहले के दोनों यूसीसी कानूनों के समान है. अप्रैल के अंत में इस विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए गठित छह सदस्यीय समिति की अध्यक्षता भी उसी शख्स को सौंपी गई, जिन्होंने पहले की समितियों का नेतृत्व किया था. वह थीं सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई.

मुख्यमंत्री मोहन यादव को अपनी रिपोर्ट सौंपता यूसीसी पैनल

सरकार को उम्मीद है कि इस संहिता के कुछ प्रावधानों, विशेषकर वे जो मुसलमानों के पर्सनल लॉ के उपयोग के हक को प्रभावित करेंगे, को अदालत में चुनौती मिलेगी. भोपाल उत्तर से कांग्रेस विधायक आतिफ अकील कहते हैं, ‘‘आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित करने के लिए आयोजित बैठक महज एक औपचारिकता थी. मसौदा तैयार करने वाली समिति में सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं था.’’

अकील का कहना है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने सभी समुदायों से परामर्श किया था और उनके विचारों को संविधान में समाहित किया था. वे सवाल उठाते हैं, ‘‘जब आप (समिति) मेरी राय पर विचार किए बिना ही यूसीसी पारित करने का फैसला कर चुके थे, तो फिर मुझे बैठक में बुलाने का क्या औचित्य था?’’

इस यूसीसी में भी लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य है. पंजीकरण न कराने पर दंड का प्रावधान है मगर यह उत्तराखंड के कानून की तुलना में अपेक्षाकृत हल्का है और गुजरात की तरह राज्य की सीमाओं से बाहर लागू नहीं होगा, बल्कि केवल मध्य प्रदेश के अधिकार क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा.

आंशिक सुधारवादी
संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में भी यह विधेयक पहले के दोनों यूसीसी कानूनों की सुधारवादी सोच को आगे बढ़ाता है. इसके मुताबिक, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति का सभी वैध उत्तराधिकारियों के बीच समान बंटवारा होगा. वैसे, मध्य प्रदेश के यूसीसी में एक दिलचस्प नया प्रावधान जोड़ा गया है. इसके तहत पुत्र की संपत्ति में अब उसकी पत्नी और बच्चों के साथ-साथ माता-पिता, दोनों को भी हिस्सा मिलेगा. पहले केवल माता को ही ऐसा हक प्राप्त था. इसका उद्देश्य वृद्ध माता-पिता को उपेक्षा से बचाना है.

वहीं, भाजपा आदिवासियों को अपने पाले में बनाए रखना चाहती है. आदिवासी संगठनों ने पहले ही साफ किया था कि वे अपनी परंपराओं में दखल बरदाश्त नहीं करेंगे. यह प्रतिक्रिया उन चर्चाओं के जवाब में थी जिनमें कहा जा रहा था कि आदिवासियों में प्रचलित बहुविवाह समेत सभी रीतिगत कानूनों को खत्म किए बगैर यूसीसी का कोई असल मतलब नहीं रह जाता.

अन्य सभी समुदायों के लिए बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है. इसे यूसीसी की एक प्रमुख विशेषता माना जा रहा. और यह धारणा है कि इसका मुख्य प्रभाव इस्लामी पर्सनल लॉ में पुरुषों के बहुविवाह पर पड़ेगा. यह प्रावधान 1867 में पुर्तगाली औपनिवेशिक राज में गोवा में तैयार किए गए भारत के पहले कॉमन सिविल कोड से लगातार बना हुआ है.

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