ताकत दिखाने को तैयार पवार

क्या एनसीपी (एससीपी) भाजपा से हाथ मिलाने जा रही? सियासी हवा और पर्दे के पीछे जारी बातचीत में तो ऐसा ही इशारा है. शिंदे इसके लिए तैयार कर रहे जमीन

एनसीपी (एससीपी) प्रमुख शरद पवार

अगर यह समझौता सिरे चढ़ा तो महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी बदल देने जैसा होगा. नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) यानी तीन साल पहले अजित पवार गुट के अलग होने के बाद बचा धड़ा अब खुद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से नजदीकी बढ़ाता दिख रहा है. मगर एनसीपी के विलय के जरिए नहीं, जैसा अजित पवार के निधन के बाद कई लोगों ने सुझाव दिया था. यह सत्ताधारी गठबंधन के दूसरे घटकों के संग अपनी स्वतंत्र पहचान कायम रखते हुए नजदीकियां बढ़ा रहा है.

हाल में दिखे नए समीकरणों ने इन अटकलों को हवा दी कि क्या यह पार्टी संसद में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन करेगी, और क्या उसके साथ सरकार में शामिल होगी?

हलचलें तेज हुईं. अटकलों को पहला पुख्ता आधार मिला जब कई दलों से संपर्क साधने में माहिर एनसीपी (एससीपी) प्रमुख शरद पवार ने मॉनसून सत्र के दौरान विधानसभा परिसर में उपमुख्यमंत्री और अधिकृत दर्जा पाने वाली शिवसेना के प्रमुख एकनाथ शिंदे से मुलाकात की. चर्चाओं ने जोर पकड़ा जब विधानसभा में एनसीपी (एससीपी) नेता और पूर्व वित्त मंत्री जयंत पाटील ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उनके मुंबई स्थित आवास पर मुलाकात की. वहां अजित गुट के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे भी मौजूद बताए गए.

परिसीमन का दांव
ठीक उसी समय एनसीपी (एससीपी) की कार्यकारी अध्यक्ष शरद पवार की बेटी और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने समझौते का साफ तौर पर संकेत दिया. उन्होंने कहा कि यदि परिसीमन विधेयक सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50 फीसद वृद्धि का प्रावधान करता है तो वे इसका समर्थन करने को तैयार हैं. वैसे सुले ने अपनी बात को संभाला भी और बाद में बयानों से किनारा किया.

यह दावा भी किया गया कि पाटील ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक नगर पालिका अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई पर चर्चा के लिए फडणवीस से मुलाकात की थी. तटकरे ने भी पाटील से मुलाकात की बात से इन्कार किया.

बहरहाल, संसद के गणित और संख्या बल के हिसाब से यह प्रकरण काफी अहम हो जाता है. उद्धव ठाकरे की शिवसेना के छह सांसद एक साथ शिंदे गुट में शामिल हो गए थे. वह परिसीमन विधेयक पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की नरेंद्र मोदी सरकार की कवायद का हिस्सा था. एनसीपी (एससीपी) का राज्यसभा में एक और लोकसभा में आठ सांसद हैं.

महाराष्ट्र में उसके 10 विधायक हैं. सूत्रों का कहना है कि उनमें से एक-दो को छोड़कर बाकी सब भाजपा से हाथ मिलाने के पक्ष में हो सकते हैं.

जीत-हार एनसीपी (एससीपी) की सुप्रिया सुले

ऐसे में तीन दलों वाले महा विकास अघाड़ी की स्थिति खात्मे के करीब पहुंच जाएगी. 2024 के आम चुनाव में एक आशाजनक शुरुआत, और छह महीने बाद ही विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन ने इसको आंतरिक कलह में उलझा दिया. एनसीपी (एससीपी) भाजपा का समर्थन करती है और बदले में उसे केंद्र तथा राज्य सरकार में जगह मिलती है तो स्थितियां एकदम पलट जाएंगी. ऐसा होता दिख भी रहा है.

एनसीपी (एससीपी) के एक पदाधिकारी ने स्वीकारा, “हम सरकार को मुद्दों पर आधारित समर्थन देने को तैयार हैं. हम भाजपा से मिलने वाले किसी भी स्पष्ट प्रस्ताव पर विचार करने को भी तैयार हैं.” मगर शरद पवार खेमे में भी अलग-अलग राय है. उनके प्रपौत्र और एनसीपी (एससीपी) के विधायक रोहित पवार ने आरोप लगाया कि भाजपा परिसीमन की आड़ में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के साथ मनमाने ढंग से छेड़छाड़ कर रही है.

सूत्रों का कहना है कि एनसीपी (एससीपी) आधिकारिक एनसीपी धड़े में विलय के बिना ही एनडीए में शामिल हो सकती है. अधिकृत एनसीपी खुद दो गुटों के कारण बंटवारे के लिए तैयार घर जैसी स्थिति में नजर आ रही है. इसमें एक धड़े का नेतृत्व उपमुख्यमंत्री और अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा और राज्यसभा के सदस्य, उनके बड़े बेटे पार्थ कर रहे हैं; तो दूसरे की कमान प्रफुल्ल पटेल-तटकरे की जोड़ी ने संभाल रखी है.

एक विरोधी ने तो उस प्रक्रिया को ही चुनौती दे डाली जिसके तहत सुनेत्रा को पार्टी प्रमुख चुना गया था. जुलाई 2023 में एनसीपी का विभाजन होने के 30 महीने बाद दोनों ही पार्टियां विलय के लिए गंभीरता से बातचीत कर रही थीं, तभी जनवरी में एक विमान दुर्घटना में अजित पवार का निधन हो गया. अब इस गुटबाजी ने उन योजनाओं पर पानी फेर दिया है.

एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “सवाल यह है कि कौन किसका नेतृत्व स्वीकारेगा.” असहजता का एक बड़ा कारण निजी समीकरण भी रहे हैं. सुनेत्रा 2024 के चुनाव में बारामती सीट पर अपनी ननद सुले से हार को पचा नहीं पाई हैं. शरद पवार भी आंतरिक दबाव की वजह से एनडीए के साथ आने में हिचकिचाहट से जूझ रहे हैं क्योंकि यह कदम, जैसा भाजपा के एक नेता ने कहा, उनकी पार्टी के टूटने की वजह बन सकता है.

उन्होंने यह कहते हुए कि “पवार ने अतीत में भी ऐसे समझौते किए हैं,” याद दिलाया कि पवार ने तीन तलाक जैसे विवादित विधेयकों पर संसद में मतदान से दूरी बना ली थी.

डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार

सत्ता का खेल
गठजोड़-पूर्व के सारे मुद्दे अभी सुलझे नहीं हैं. सूत्रों का मानना है कि पवार गुट के भाजपा से हाथ मिलाने की कुछ बड़ी शर्तें हो सकती हैं—मसलन, राज्य में नेतृत्व परिवर्तन, जिसमें फडणवीस को राज्य की सियासत से दूर रखने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बनाया जाए. दरअसल, शिंदे हमेशा से अपनी पुरानी भूमिका में वापस को आतुर रहे हैं; कुछ भाजपा नेता भी इसके पक्ष में हैं.

जाहिर है, इतना बड़ा फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया जा सकता, जब तक फडणवीस को इसमें अपना कोई हित न दिखे. अजित गुट को शिंदे के कद से अस्तित्व के लिए खतरा महसूस हो रहा है, जो एक प्रमुख मराठा नेता के तौर पर उभर रहे हैं. एनसीपी के मुख्य गढ़ रहे पश्चिमी महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले शिंदे के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एनसीपी (एससीपी) के विधायकों से संपर्क साधा है. जाहिर है, सियासी शह-मात का एक बड़ा खेल चरम पर है.

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