वायनाड में लापरवाही का मलबा
भयंकर आपदाओं के बाद भी राज्य ने नहीं लिया उनसे कोई सबक

मनोरम और शांत जगह की कल्पना कीजिए, जहां त्रासदी बार-बार पहुंचने वाले सैलानी की तरह आती है और ऐसा जानलेवा पैटर्न लिख जाती है जो हर साल और ज्यादा जाना-पहचाना होता जाता है. केरल के उत्तरपूर्वी ऊंचे पहाड़ी इलाके वायनाड में त्रासदी के दोनों ही मायनों को आमने-सामने रखा जा सकता है. एक तो आम मायना—किसी बुरी घटना का महज होना, और इस तरह होना मानो बेतरतीब और बेवजह हो. कल्लाड़ी में सात जुलाई को आई हाल की आपदा पहली नजर में ऐसी ही लगती है. पर दोबारा देखें तो ज्यादा पुराने मायने खुलने लगते हैं.
हम यह सब पहले भी सुन चुके हैं. मॉनसून की भारी बारिश से भुरभुरी हुई मिट्टी और चट्टान का बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर गिर जाता है. सिर्फ जगह, वक्त, पैमाना और पीड़ितों के ब्योरे अलग हैं. यह आपदा भी मेप्पाड़ी के नजदीक अनाक्काम्पोयिल-कल्लाड़ी सुरंग के मुहाने पर हुई. अचानक मिट्टी में दब गया इन्सानी झुंड उस कार्यस्थल पर था जहां भोपाल की फर्म दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड का काम चल रहा था. आठ कामगार मारे गए, जो सभी उत्तरी राज्यों के थे.
अगर यह पहले भी कहीं देखा-सुना लगता है तो इत्तेफाक भर नहीं. यह जगह चूरलमाला से ठीक पांच किमी दूर है, जहां जुलाई 2024 में मूसलाधार बारिश के बाद दो पहाड़ी ढलानें दरककर मिट्टी और कीचड़ के विशाल जानलेवा सैलाब में बदल गई थीं. वह केरल की सबसे बदतर त्रासदियों में से एक थी, जिसमें दो-एक गांवों का नामोनिशान तक मिट गया और करीब 420 लोग मारे गए. इस बार यह अपने साथ जो ले गई, वह उसके मुकाबले कम था.
यह 8.73 किमी लंबी और 2,134 करोड़ रुपए की लागत से बनाई जा रही जुड़वा सुरंग थी, जिसका काम अगस्त 2025 से चल रहा था. कोझिकोड की ओर जाने वाली तमारासेरी घाट रोड पर यातायात को आसान बनाने के लिए बनाई जा रही इस सुरंग को इन हिस्सों में कम सुसाध्य माना जा रहा था.
सुरंग का बरसों से विरोध करते आ रहे वायनाड एन्वायरनमेंटल प्रोटेक्शन काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी 75 वर्षीय एन. बदुशा कहते हैं, “कल्लाड़ी त्रासदी प्राकृतिक नहीं बल्कि इन्सान की बनाई आपदा है.” उनका कहना है कि पिछली वाम सरकार ने चूरलमाला के बाद भी क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संवेदनशीलताओं का ध्यान रखे बिना इस परियोजना को आगे बढ़ाया.
बदुशा बताते हैं, “हमें डर है कि परियोजना जारी रही और पहाड़ियों की भीतरी चट्टानों में इसी तरह विशाल सुरंगें बनाई जाती रहीं तो और भी आपदाएं आ सकती हैं.”
उनकी चेतावनियां इतिहास के कच्चे चिट्ठे तक ले जाती हैं. माधव गाडगिल समिति की 2011 की रिपोर्ट ने वायनाड को तीन जोन में बांटा था, जो केवल खतरे के स्तर के लिहाज से अलग थे: नाजुक, मध्यम नाजुक, और कम नाजुक. जब उसने वहां “पर्यावरण के लिहाज से खतरनाक” गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की तो यह शुद्ध यथार्थ वाली बात थी.
यहां तक कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2026 में दो तालुकों के 13 गांवों को पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील अधिसूचित किया और राज्य से पत्थरों की खुदाई तथा बड़े निर्माण कार्यों पर लगाम लगाने को कहा. फिर भी सुरंग का काम चलता रहा.
बदतर यह कि खुदाई से निकली मिट्टी के अंबार उन ढलानों पर लगा दिए गए जो बस्तियों से ऊपर थीं. मेप्पाड़ी पंचायत अध्यक्ष रमला हमजा का कहना है, “हमने इसकी ओर ध्यान दिलाया था और कंपनी को मॉनसून से पहले इसे हटाने का निर्देश दिया था क्योंकि इससे स्थानीय निवासियों को खतरा था. मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई.”
राज्य के कृषि मंत्री और कल्पेट्टा के विधायक टी. सिद्दीक का भी आरोप है, “जिला प्रशासन ने भी कंपनी को मिट्टी हटाने और मॉनसून के दौरान निर्माण बंद करने के निर्देश जारी किए थे. मगर उसने स्थल पर काम जारी रखा.”
विशेषज्ञों की समिति अब इस परियोजना की समीक्षा करेगी जिसमें भूवैज्ञानिक सी.पी. राजेंद्रन भी हैं. चूरलमाला के बाद केरल ने भूस्खलनों के लिए पूर्व चेतावनी व्यवस्था का ऐलान किया था मगर वायनाड में ढलान-केंद्रित अलर्ट, लोगों को सुरक्षित निकालने के नियम और अंतिम छोर तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था ही नदारद है. यह ढिलाई आपराधिक है, खासकर दशकों की उन ज्यातियों के बाद, जिनमें जंगलों को काटकर वृक्षारोपण कराए गए तथा पहाड़ियों को काट, सुरंगें बनाकर तहस-नहस कर दिया गया.
इडुक्की, पलक्कड़ और वायनाड को मानो कंस्ट्रक्शन लॉबी ने अपना उपनिवेश बना लिया है. इन सबका खामियाजा जलवायु परिवर्तन की शक्ल में सामने आ रहा और यह पैटर्न शोकगीत की तरह दोहराया जा रहा.