सियासी सबक सीखते निशांत
लगातार हो रही पीआर फजीहत के बीच जद (यू) के युवराज निशांत कुमार की नई छवि गढ़ने की जिम्मेदारी अब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संभाली

अपनी सकारात्मक छवि गढ़ने की बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार की पहली गंभीर कोशिश उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं रही. दरअसल, मंत्रिमंडल में शामिल होने के महीने भर बाद 45 वर्षीय निशांत औचक निरीक्षण के लिए पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (पीएमसीएच) पहुंचे. यह एक सुनियोजित कदम था और शुरुआत में हालात उनके पक्ष में रहे.
संयोग से अस्पताल के प्राचार्य उस समय गैरहाजिर मिले. यह मौका पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की छवि एक सक्रिय और अनुशासनप्रिय मंत्री के रूप में स्थापित करने के लिए अनुकूल प्रतीत हुआ. फिर प्राचार्य के तबादले के आदेश जारी किए गए और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई.
इस प्रकरण को सकारात्मक सुर्खियां मिलनी थीं मगर यह निशांत के शुरुआती सियासी जीवन के पहले असल विवाद में बदल गया. पीएमसीएच के कथित लापरवाह प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने खुलकर मोर्चा खोल दिया. उनका दावा था कि न तो उनकी अनुपस्थिति का उनसे कोई स्पष्टीकरण मांगा गया और न ही पक्ष रखने का मौका दिया गया. उन्होंने यह तक कह दिया कि उन्हें स्वास्थ्य मंत्री पर ‘‘भरोसा नहीं है.’’
ऐसे में जिस घटना से निशांत की सशक्त छवि बनने की उम्मीद थी, वही असहज स्थिति का कारण बन गई. यह उन कुछ असहज घटनाक्रमों की कड़ी में एक और प्रकरण साबित हुआ, जिनकी भरपाई करने के मकसद से अस्पताल निरीक्षण कराया गया था.
दरअसल, जद (यू) के वरिष्ठ नेताओं ने निशांत की सियासी छवि को नए सिरे से गढ़ने की कवायद शुरू की है. निशांत के युवा कंधों पर पार्टी का अगला नेतृत्वकर्ता बनने का भार है. मगर अब तक पार्टी के इस उत्तराधिकारी की सियासी पारी की शुरुआत कुछ खास असरदार नहीं रही है. उनकी शुरुआती सार्वजनिक उपस्थितियों का सोशल मीडिया पर उपहास हुआ.
आलोचकों ने उनकी बातचीत के कौशल, सार्वजनिक आत्मविश्वास और बड़ी सियासी भूमिका निभाने की तैयारी पर सवाल उठाए. सोशल मीडिया के दौर में निशांत के भाषणों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के ऐसे वीडियो प्रसारित हुए जो असहज करने वाले थे. तब पार्टी को एहसास हुआ कि एक प्रतिष्ठित उपनाम को प्रभावी सियासी पूंजी में तब्दील करना आसान नहीं.
कुछ करना जरूरी था और वह भी तुरंत. तभी निशांत की छवि को व्यवस्थित ढंग से नया रूप देने की योजना पर अमल शुरू हुआ. उन्हें केवल नीतीश के बेटे के रूप में नहीं, बल्कि प्रशासनिक कामकाज में सक्रिय और तल्लीन मंत्री के रूप में पेश करने की रणनीति बनाई गई. संदेश स्पष्ट था—मंचीय राजनीति कम, प्रशासनिक जिम्मेदारी ज्यादा. इससे चर्चा को उनकी सियासी विरासत के बजाए सुशासन और कामकाज की ओर मोड़ा जा सकता था. पीएमसीएच का प्रयास भले अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा मगर पार्टी की रणनीति में कोई बदलाव नहीं आया.
7 जुलाई को निशांत ने पटना के एक अन्य सरकारी अस्पताल का औचक निरीक्षण किया. इस दौरान उन्होंने ओपीडी का दौरा किया, मरीजों से बात और स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा की.
झिझक को झटकते हुए
मई में सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद से निशांत ने खुद को लगातार चर्चा में बनाए रखने की जुगत करने वाले महत्वाकांक्षी नेताओं की तरह सार्वजनिक कदम नहीं उठाए. फिर भी अपनी पुरानी संकोची और एकांतप्रिय छवि से वे बाहर निकलते नजर आ रहे हैं. क्या इससे उनकी छवि में वास्तव में बदलाव आया है? क्या जद (यू) बिहार की संशयग्रस्त जनता को भरोसा दिला पाएगा?
इन सवालों के जवाब केवल निशांत ही नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के बाद के दौर की तैयारी कर रही पार्टी के भविष्य को भी तय कर सकते हैं. जद (यू) इस दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ रहा. निशांत अब अपने पिता नीतीश कुमार की पार्टी की राजनीति के केंद्र में हैं और उसके सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बन चुके हैं.
सम्राट चौधरी की सरकार ने भी इस प्रयास को संस्थागत स्तर पर मजबूती देने की कोशिश की है. 7 मई को निशांत के मंत्रिमंडल में शामिल होने के मात्र दो दिन बाद बिहार के सबसे सम्मानित आइएएस अधिकारियों में गिने जाने वाले कुमार रवि को स्वास्थ्य विभाग का सचिव नियुक्त किया गया. नौकरशाही के गलियारों में इसे पहली बार मंत्री बने निशांत को एक मजबूत प्रशासनिक सहारा दिए जाने का संकेत माना गया. रवि नीतीश के भरोसेमंद अधिकारियों में गिने जाते रहे हैं और मुख्यमंत्री सचिवालय में उनके कार्यकाल के दौरान भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं.
21 जुलाई को निशांत ने पहली बार बिहार विधान परिषद को संबोधित किया. करीब दो मिनट के अपने भाषण में उन्होंने मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया कि ‘‘पिताजी’’ का मार्गदर्शन उन्हें हमेशा मिलता रहेगा. माना जा रहा है कि उनके इस वक्तव्य ने कुछ हद तक पार्टी कार्यकर्ताओं को आश्वस्त किया है.
नीतीश की खाली जगह
सरकार के बाहर भी इस संदेश को सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाया जा रहा है. पटना में जगह-जगह ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं, जिनमें निशांत को नीतीश कुमार की सियासी विरासत का उत्तराधिकारी बताया गया है. जून के अंतिम हफ्ते में आयोजित जद (यू) की राष्ट्रीय काउंसिल की बैठक में भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें नीतीश कुमार का स्वाभाविक उत्तराधिकारी बताया. पार्टी की यह निर्भरता अस्वाभाविक नहीं. नीतीश के राज्यसभा में जाने और बिहार की रोजमर्रा की राजनीति से धीरे-धीरे दूरी बनाने के साथ ही जद (यू) एक कठिन संक्रमण काल से गुजर रहा है.
दरअसल, विधानसभा में 85 विधायकों के साथ और एनडीए सरकार का एक अपरिहार्य स्तंभ होने के बावजूद, जद (यू) अब तक दूसरी पंक्ति का ऐसा नेता तैयार नहीं कर पाया है जिसकी पूरे राज्य में नीतीश कुमार जैसी स्वीकार्यता और जनाधार हो.
पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा प्रभावशाली रणनीतिकार माने जाते हैं मगर उनकी भूमिका मुख्यतः संगठन तक ही सीमित है. जद (यू) के दोनों उपमुख्यमंत्री, 69 वर्षीय विजय चौधरी और 79 वर्षीय बिजेंद्र प्रसाद यादव भी अनुभवी प्रशासक हैं. मगर उनका भी पूरे बिहार में वैसा प्रभाव नहीं, जो नीतीश के तैयार किए गए विविध सामाजिक गठबंधन को एकजुट रख सके. इसी कारण पार्टी की उम्मीदें अब निशांत पर आ टिकी हैं, जिन्होंने अभी-अभी सियासत में कदम रखा है और अभी सार्वजनिक जीवन की बुनियादी सियासी समझ ही सीख रहे हैं. यहां से एक सफल सियासी नेतृत्व की कहानी लिखना उनके लिए लंबी और कठिन यात्रा होगी.