धनगर आरक्षण पर रार
गोवा में एसटी आरक्षण को लेकर चुनौतियों से घिरी भाजपा सरकार

यह मुद्दा चुनावी तैयारियों में जुटे गोवा में भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकता है. गौली-धनगर समुदाय ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) के दर्जे के लिए आंदोलन तेज कर दिया है. इस समुदाय ने डॉ. प्रमोद सावंत की अगुआई वाली राज्य सरकार को 15 अगस्त तक मांग स्वीकार करने का अल्टीमेटम दिया है. भारत के रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआइ) और केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने गौली-धनगर समुदाय को एसटी श्रेणी में शामिल करने की मांग खारिज कर दी है.
ऑफिस ऑफ द रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (ओआरजीआइ) ने मार्च 2026 में कहा कि यह समुदाय अब भी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की केंद्रीय सूची में ‘धनगर’ के रूप में दर्ज है. उसने जोर दिया कि इस मांग पर पुनर्विचार का औचित्य साबित करने के लिए कोई नया डेटा पेश नहीं किया गया है.
गोवा में एसटी की आबादी 1,49,275 है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 10.23 फीसद है. गोवा में गौली-धनगर समुदाय की आबादी लगभग 25,000 मानी जाती है. विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के कारण यह समुदाय चुनाव नतीजे प्रभावित करने की स्थिति में माना जाता है. मसलन, 2022 के गोवा विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सांक्वेलिम सीट पर कांग्रेस के धर्मेश सगलानी को महज 666 मतों के बेहद कम अंतर से हराया था.
1980 के दशक में गौड़ा, वेलिप, कुनबी और धनगर समुदायों ने ‘मुल गोयंकारांचो एकवोट’ नामक आंदोलन शुरू किया और खुद को एसटी दर्जा देने की मांग उठाई. साल 2003 में गौड़ा, वेलिप और कुनबी को एसटी सूची में शामिल कर लिया गया. मगर पारंपरिक रूप से पशुपालक और वनवासी धनगर समुदाय बाहर रह गया. समुदाय के नेताओं ने अब इस मांग के समर्थन में गांव-गांव जनसंपर्क अभियान शुरू किया है.
यूनाइटेड ट्राइबल एसोसिएशंस एलायंस (यूटीएए) के उपाध्यक्ष रवींद्र वेलिप कहते हैं, ‘‘गौली-धनगर समुदाय की मांग जायज है और यह 1980 के दशक से उठाई जा रही.’’ यूटीएए के संयोजक और आदिवासी कार्यकर्ता गोविंद शिरोडकर कहते हैं कि भाजपा गोवा में इस मुद्दे पर असमंजस में है. वजह यह है कि भाजपा शासित महाराष्ट्र में भी धनगर समुदाय एसटी दर्जा की मांग कर रहा है, जिसका वहां के एसटी विरोध कर रहे हैं. शिरोडकर के अनुसार, गोवा में गौली-धनगर समुदाय को एसटी दर्जा मिलने से महाराष्ट्र में भी धनगर समुदाय की मांग को बल मिलेगा.
दूसरी ओर, गोवा के एसटी वोटर पहले ही उन्हें राजनैतिक आरक्षण मिलने में हो रही देरी को लेकर नाराज हैं. अगर राजनैतिक आरक्षण लागू होता है तो 40 सदस्यीय गोवा विधानसभा की चार सीटें एसटी के लिए आरक्षित हो सकती हैं. माना जाता है कि इस नाराजगी का खामियाजा भाजपा को दक्षिण गोवा लोकसभा सीट पर भुगतना पड़ा, जहां पार्टी उम्मीदवार पल्लवी डेम्पो को कांग्रेस के कैप्टन विरियातो फर्नांडीस ने हरा दिया था.
एसटी और अनुसूचित जातियों (एससी) को क्रमशः 12.5 फीसदी और दो फीसद आरक्षण शिक्षा और सरकारी नौकरियों में हासिल है, मगर एसटी समुदाय को अब तक विधानसभा में राजनैतिक आरक्षण नहीं दिया गया है. विधानसभा में एससी के लिए सिर्फ एक सीट आरक्षित है—उत्तर गोवा में पेरनेम विधानसभा क्षेत्र, जिसका प्रतिनिधित्व सत्तारूढ़ भाजपा के प्रवीण आर्लेकर करते हैं. गोवा में एसटी को राजनैतिक आरक्षण देने संबंधी विधेयक अगस्त 2025 में संसद से पारित हो गया था. मगर साल भर बीतने के बावजूद केंद्र सरकार ने इस कानून को लागू करने के लिए जरूरी कदम अब तक नहीं उठाए हैं.
राज्य सरकार गौली-धनगर मुद्दे पर अब डैमेज कंट्रोल में जुट गई है. एसटी विकास मंत्री रमेश तवडकर कहते हैं कि ‘‘एसटी समुदाय ने कभी भी धनगरों को एसटी श्रेणी में शामिल करने का विरोध नहीं किया और धनगर समुदाय को आरक्षण की ज्यादा जरूरत है.’’
वहीं सावंत ने जून में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओरांव को चिट्ठी लिखकर उस फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया. उन्होंने लिखा, ‘‘मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूं कि 1963 में गोवा सरकार ने एसटी सूची में शामिल करने के लिए सबसे पहले गौली-धनगर समुदाय की सिफारिश की थी. 1992 में भी सरकार ने केवल गौली-धनगर समुदाय को एसटी घोषित करने का आग्रह किया था. फिर, 1993 में गौड़ा, कुनबी और वेलिप समुदायों को एसटी का दर्जा देने का
प्रस्ताव भेजा गया.’’
सावंत ने कहा कि यह अस्वीकृति इस समुदाय के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को और लंबा खींचती है और उन्हें उनके वैध अधिकार से वंचित करती है.