सवालों के घेरे में एनकाउंटर
पश्चिम बंगाल में रेप और मर्डर के मामले में पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत ने तीखी राजनैतिक और सार्वजनिक बहस छेड़ दी है

अराजक कानून-व्यवस्था तृणमूल कांग्रेस के लिए इतना बड़ा सिरदर्द थी कि उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा. इसलिए इस मसले पर शुभेंदु अधिकारी सरकार के कदमों पर सबकी नजर होती है.
पश्चिम बंगाल में पुलिस की सख्ती के ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें सिर्फ अंडरवियर में और कमर पर रस्सी बांधकर गिरफ्तार अपराधियों की परेड कराना भी शामिल है. इस पर अदालत ने फटकार भी लगाई. लेकिन बरुईपुर में एक नाबालिग लड़की से रेप और उसकी हत्या के मुख्य आरोपी प्रभास मंडल की मुठभेड़ में मौत के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया.
सवाल है कि क्या यही इंसाफ है? खासकर ऐसा न्याय जिसमें न तो देर है और न ही अंधेर, बल्कि हाथोहाथ इंसाफ कर दिया जाता है? क्या इसके नई और अलिखित कानूनी प्रक्रिया बन जाने का खतरा है?
कहानी वही पुरानी
बरुईपुर मामले में पुलिस का बयान देश में हुई इस तरह की कई घटनाओं की याद दिलाता है. पुलिस का कहना है कि आठ जुलाई को तड़के मंडल की मौत हो गई जब उसने कथित तौर पर पुलिस का हथियार छीन लिया और भागने की कोशिश में गोली चलाई. पुलिस ने अपने बचाव में गोली चलाई, जिससे वह घायल हो गया. बाद में उसकी अस्पताल में मौत हो गई. इस घटना ने मुठभेड़ की बहस को और तेज कर दिया है और इसकी तुलना उत्तर प्रदेश की आक्रामक एनकाउंटर पॉलिसी से की जा रही है.
तृणमूल कांग्रेस ने तुरंत प्रतिक्रिया की और जिन हालात में मुठभेड़ हुई, उन पर सवाल उठाए. वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने कहा, ‘‘यह पुलिस बर्बरता का सबसे क्रूर तरीका है.’’ उन्होंने घटना के समय को लेकर गंभीर सवाल उठाएः मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक एक दिन पहले ही बरुईपुर आए थे और 72 घंटे के भीतर इस मामले में अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था. उनका आरोप था कि बंगाल ‘योगी मॉडल’ अपनाकर जवाबदेही से पल्ला झाड़ रहा है.
भाजपा ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया और कहा कि सरकार महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपना रही है. राज्य में पार्टी के प्रमुख समिक भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘किसी भी अपराधी या बलात्कारी को बख्शा नहीं जाएगा. भाजपा ने पश्चिम बंगाल की महिलाओं से वादा किया थाः ‘भय आउट, भरोसा इन’. यह पीएम का संदेश था. हम वही कर रहे हैं जो हमने अपने घोषणापत्र में कहा था.’’ जो लोग इस सोच का समर्थन करते हैं, वे पुराने मामलों का हवाला देते हैं: कि इससे एक सख्त और प्रतिरोधक संदेश जाता है. बरुईपुर की घटना के बाद इस तरह की सोच बढ़ी है जिससे जघन्य अपराधों में कानून की देरी के कारण बढ़ती निराशा जाहिर होती है. ‘एनकाउंटर वाली पुलिस’ को अक्सर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कारगर रणनीति के तौर पर प्रचारित किया जाता है. यूपी में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2017 से पुलिस ने 17,004 एनकाउंटर किए हैं, जिनमें 289 कथित अपराधी मारे गए और 11,834 घायल हुए.
आलोचक इसे पुलिस के असली काम का अक्षम शॉर्टकट कहते हैं जिसमें कानून के दायरे से बाहर जाकर न्याय करने को सामान्य बना दिया गया है. किसी आरोपी की मौत से उसके गुनहगार साबित होने या बेगुनाह होने की संभावना ही खत्म हो जाती है.
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक अहम फैसले में एनकाउंटर में होने वाली मौतों को रोकने के लिए 16 अनिवार्य गाइडलाइंस तय की थीं. तय सुरक्षा उपायों के अलावा उसने यह भी आदेश दिया कि अगर फोर्स का इस्तेमाल गैर-कानूनी पाया जाए तो पुलिस वालों पर मुकदमा चलाया जाए. उसने इस बात पर भी जोर दिया कि अनुच्छेद 21 जीने के अधिकार की गारंटी देता है और पुलिस के हाथों हुई हर हत्या की, यह पता लगाने के लिए स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए कि वह कानूनी तौर पर सही है या नहीं.