इसे कहते हैं अल्प‌संख्यक शिक्षा में सुधार

उत्तराखंड ने मदरसा बोर्ड खत्म करके सभी स्कूलों को नए बोर्ड के तहत ला दिया

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी

यह क्या बेहद जरूरी सुधार है? या यह पूरी तरह राजनैतिक कदम है जो संवैधानिक गारंटियों से मेल नहीं खाता? सांविधानिक मदरसा बोर्ड को खत्म करने वाला पहला राज्य बन गया है उत्तराखंड. इसी के साथ इसके पक्ष और विपक्ष में जोरदार बहस छिड़ गई है.

सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के हाथों चलाई जा रही शैक्षिक संस्थाओं का संचालन एक नया प्राधिकरण करेगा. पुष्कर सिंह धामी की सरकार इसे मुख्यधारा में लाना कह रही है.

यह न केवल सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विचारधारा बल्कि एक समान शिक्षा के तकाजे के भी अनुरूप है. पैरों के नीचे से रातोरात कानूनी जमीन गंवा बैठी अल्पसंख्यक संस्थाओं का कहना है कि इतना बड़ा फैसला लिए बिना भी उन मानदंडों को इतनी ही अच्छी तरह पूरा किया जा सकता था.

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के बाद जगहों के नाम बदलने और सख्त से सख्त होते जाते धर्मांतरण विरोधी कानूनों ने उत्तराखंड के हिंदुत्व की अव्वल प्रयोगशाला बनने का रास्ता साफ कर दिया, जहां पहचान और एकरूपता पर केंद्रित नीतियां लागू की जा रही हैं. मदरसों का खात्मा एक और मील का पत्थर है, जो फरवरी 2027 में अगले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भगवा छवि को पुख्ता करता है.

नई व्यवस्था में उत्तराखंड मदरसा एजुकेशन बोर्ड को खत्म कर दिया गया है. यह 2016 में पारित इसी नाम के कानून के तहत काम करता था. इसके अलावा उत्तराखंड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता नियम 2019 भी खत्म कर दिए गए हैं.

दोनों की जगह पिछले साल के उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम (यूएमईए) 2025 और उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाएं मान्यता नियम 2026 ने ले ली है. पहला कानून मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक विशेष समिति ने तैयार किया था. इसी समिति के कई सदस्यों ने यूसीसी बनाने में भूमिका निभाई थी.

नई नीति एक मदरसे के छात्र

इस बदलाव का असर राज्य के सभी 452 मान्यता प्राप्त मदरसों पर पड़ेगा. वे अब नए उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (यूएसएएमई) के मातहत आ जाएंगे. हालांकि इस्लामिक स्कूल आम तौर पर सबसे कम मुख्यधारा के अनुरूप चलने वाले माने जाते हैं, लेकिन यूएसएएमई के फैसले ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी संस्थाओं के लिए भी पत्थर की लकीर होंगे.

उत्तराखंड स्कूल शिक्षा बोर्ड के साथ संबद्ध होने के बाद इन सभी को यूएसएएमई से नए सिरे से मान्यता लेनी होगी. 12 सदस्यों का प्राधिकरण उनके आवेदनों की जांच करेगा. मंजूरी देने से पहले वह भौतिक निरीक्षण भी कर सकता है. इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और उसके राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे से जोड़ा जाएगा. धार्मिक शिक्षा के अलावा छात्र गणित, विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान, सामाजिक विज्ञान सरीखे एनसीईआरटी-आधारित विषय पढ़ेंगे. धामी इसे दूरगामी सुधार बताते हैं.

जबरदस्त कार्रवाई करते हुए 2025 में 200 से ज्यादा ‘गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों’ को सील कर दिया गया. हाल के महीनों में एक जनसांख्यिकी सर्वे भी किया गया और जमीनों पर कथित अतिक्रमण और खाद्य सुरक्षा के उल्लंघनों के खिलाफ बहुत कड़े कदम भी उठाए गए. मुख्यमंत्री ने इन अभियानों को बार-बार ‘लैंड जिहाद’, ‘लव जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ सरीखे शब्दों से नवाजा. मुसलमानों को निशाना बनाने वाले इन अभियानों को आलोचक पहचान-आधारित अभियान कहते हैं. वे नाम बदलने के जरिए पहचान मिटाने और अब मदरसे के खात्मे का हवाला देते हैं.

कानूनी उलटफेर
यह ऐसा राज्य भी नहीं है जहां दुख-तकलीफें न हों. ऋषिकेश हवाई अड्डे के आसपास शिवालिक के 4,000 पेड़ काटे जाने को लेकर ‘दूसरा चिपको आंदोलन’ चरम पर पहुंच रहा है. देवप्रयाग में स्थानीय रहवासी हाल ही पेयजल की कमी को लेकर विरोध कर रहे थे. नाराज छात्रों ने पिछले साल पेपर लीक को लेकर विरोध प्रदर्शन किए, और अंकिता भंडारी उन मामलों की महज एक कड़ी भर है. गुस्से का ताजातरीन संकेत मई में देखने को मिला जो चंपावत मामले में राजनैतिक इरादों से बरी कर दिए जाने को लेकर फूटा था.

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