मेट्रो: हजारों करोड़ खर्च, कहां हैं सवारियां

सफेद हाथी? भोपाल और इंदौर मेट्रो को नाममात्र की सवारियां मिलने से कोच शादियों और पार्टियों के लिए किराए पर चढ़ाए जाने लगे

भोपाल में किराए पर दिए गए मेट्रो कोच में पार्टी करते लोग

मेट्रो है तो महानगर होना चाहिए. इस उलटे तर्क पर थोड़ी देर अपनी खोपड़ी खुजाइए. आपको पिछले दशक में एक के बाद एक दूसरे पायदान के कई भारतीय शहरों को मेट्रो की कतार में लाने की महत्वाकांक्षा साफ दिखाई देगी.

मगर देखिए जरा! भोपाल और इंदौर में क्या हो रहा है. गर्मियां आने के साथ मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमपीएमआरसीएल) ने ऐलान किया कि वह इन दो शहरों में जन्मदिन की पार्टियों, शादियों, किटी पार्टियों और दूसरे कार्यक्रमों के फोटो शूट के लिए मेट्रो कोच किराए पर देगा.

बिल्कुल बुरी पेशकश नहीं. खड़े कोच में घंटे भर के फोटो शूट के लिए 5,000 रुपए. चलती मेट्रो के कोच में शूट के लिए 7,000 रुपए. अधिकारियों का कहना है कि इसका मकसद नागरिकों को मेट्रो से अच्छी तरह परिचित करवाना है. बस यह बात गले नहीं उतरती.

खाली दौड़ रही यूं ही
असल में पिछले साल जिन दो मेट्रो का संचालन शुरू हुआ, उन्हें औसत सवारियां भी नहीं मिल पा रहीं. भोपाल में सवारियों की औसत संख्या प्रति दिन 250-300 है. इंदौर में तो और भी कम रोज महज 100. जब बिल्कुल बुनियादी जन सुविधाओं के लिए भी पैसे की मारामारी है, ऐसे में इस सफेद हाथी की सवारी की व्यवाहारिकता के बारे में लोगों का सवाल करना लाजिमी ही है.

सिविक एजेंसियों का कहना है कि अभी कोई निर्णय देना बहुत जल्दबाजी होगी. उनकी दलील है कि जनयातायात की परियोजनाएं बिरले ही जल्द—या कभी भी—वित्तीय रूप से व्यावहारिक और सफल हो पाती हैं, यहां तक कि दुनिया भर की सबसे अच्छी संचालित परियोजनाओं में भी ऐसा हुआ है. मगर सुर बदलते साफ तौर पर देखे जा सकते हैं. धूमधाम के शुरुआती दिनों में भाजपा और कांग्रेस दोनों इसका श्रेय लेने को मचल रही थीं, अब बचाव की मुद्रा में हैं.

कुल 31.2 किमी की इंदौर मेट्रो परियोजना के पहले छह किमी के हिस्से का उद्घाटन 31 मई, 2025 को हुआ. भोपाल मेट्रो परियोजना कुल 30.8 किमी की है और इसका पहला सात किमी का हिस्सा 20 दिसंबर, 2025 को शुरू हुआ. मगर शुरुआत के बाद से ही लोगों की प्रतिक्रिया बेहद उदासी भरी रही. भोपाल ने एम्स से सुभाष नगर के बीच मेट्रो की फ्रीक्वेंसी नौ से घटाकर पांच करने में भलाई समझी. इसी तरह इंदौर में पहले 'जॉयराइड' हफ्ते के दौरान 1,50,000 बाशिंदों ने सवारी की.

बाद के हफ्तों में छूट ज्यों-ज्यों पहले 75 फीसद और फिर आधी कम की गई, इंदौरियों का उत्साह भी उसी अनुपात में घटता गया. इन हफ्तों में केवल 35,000 और 15,000 लोगों ने सवारी की. पूरी कीमत पर जब सवारियों की संख्या बहुत कम हो गई, तो वह मेट्रो जो शुरुआत में पहले हर 15 मिनट पर चलाई जा रही थी, घटाकर हर घंटे, फिर हर दो घंटे में और फिर दिन में महज दो बार आने-जाने के लिए चलाई जाने लगी. दोनों शहरों में 250 सवारियों की क्षमता वाले तीन कोच हर ट्रिप पर चलाए जाते हैं.

लागत में बढ़ोतरी भी उल्लेखनीय है. भोपाल मेट्रो की 2018 में तैयार विस्तृत परियाजना रिपोर्ट (डीपीआर) में लागत 6,941 करोड़ रुपए बताई गई थी. उसे बढ़ाकर 10,000 करोड़ रुपए कर दिया गया है. इंदौर की 7,500 करोड़ रुपए की योजना छलांग भरकर 12,800 करोड़ रुपए पर पहुंच गई है. जमीन पर निर्माण की लागत करीब 100 करोड़ रुपए प्रति किमी पड़ती है, ऊपर यह 300 करोड़ रुपए प्रति किमी पर पहुंच जाती है, और सुरंग बनाने में और बढ़कर 800 करोड़ रुपए प्रति किमी हो जाती है.

दोनों प्रोजेक्ट में 60 फीसद धन विदेशी निवेशकों ने लगाया है: इंदौर के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक और न्यू डेवलपमेंट बैंक ने और भोपाल के लिए यूरोपियन इनवेस्टमेंट बैंक ने. बाकी 40 फीसद में से आधा केंद्र और आधा राज्य सरकार लगा रही है.

एमपीएमआरसीएल के एमडी कृष्ण चैतन्य कहते हैं, ''दिल्ली मेट्रो को भी अपनी मौजूदा 40 लाख की यात्री संख्या तक पहुंचने में 20 साल लगे. इंदौर और भोपाल की मेट्रो परियोजनाओं को बमुश्किल अभी एक साल हुआ है और उनका फैलाव भी अभी इतना ज्यादा नहीं कि यात्रियों को आकर्षित कर सके.'' उनका कहना है कि जब तक इन परियोजनाओं के कम से कम 17-18 किमी के हिस्से चालू नहीं हो जाते, और वे इन शहरों के मुख्य कार्यस्थलों को उन बाहरी इलाकों से नहीं जोड़ देते जहां कामकाजी आबादी रहती है, यात्रियों की संख्या कम रहेगी. योजनाकारों के मुताबिक, निचोड़ यह है कि मेट्रो में सवारियों को लाने के लिए उसके बड़े और बेहद अहम हिस्से का चालू होना जरूरी है.

परियोजनाओं की व्यवहार्यता की पड़ताल कई स्तरों पर की गई थी. चैतन्य कहते हैं, ''भोपाल में 2035-36 तक परियोजना के पूरा होने पर सवारियों की संख्या चार लाख रोजाना होगी. डीपीआर के मुताबिक, इंदौर में यह पांच लाख होगी. तब इसकी कामयाबी को आंका जाना चाहिए.'' बात इतनी-सी है कि ठहरे हुए ट्रैफिक में इंतजार बहुत लंबा लगने लगता है. 

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