मुश्किल में मोहन

सीएम मोहन यादव के परिवार पर जमीन सौदों के गहराते आरोपों से उनकी वह राजनैतिक प्रतिष्ठा खतरे की जद में, जिसे उन्होंने अपने अब तक के मुख्यमंत्रित्व काल में बड़ी मेहनत से बनाया

सीएम मोहन यादव 15 मई को उज्जैन के एक आश्रम में

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए 23 जून किसी आम मंगलवार की तरह ही शुरू हुआ. मंगलवार मंत्रालय में होने वाली साप्ताहिक कैबिनेट बैठक के लिए तय होता है. मनोरम श्यामला हिल्स पर मुख्यमंत्री आवास पर अधिकारी दिन के एजेंडे को अंतिम रूप दे रहे थे, तभी यादव के भरोसेमंद राजनैतिक सहयोगी ने एक सहायक के फोन पर कॉल किया.

सहयोगी ने यादव से कहा, ''मुझे दिल्ली से भाजपा के एक केंद्रीय नेता का फोन आया था. उन्होंने आज के इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट भेजी है. यह रिपोर्ट उज्जैन और उसके आस-पास आपके और आपके परिजनों की जमीन की मिल्कियत से जुड़ी है.'' यादव ने पूरी बात सुनकर एक लंबे मौन के बाद फोन रखा.

कुछ ही घंटों में उस रिपोर्ट ने यादव के कार्यकाल की सबसे बड़ी राजनैतिक चुनौती खड़ी कर दी. दिसंबर 2023 में पद संभालने के बाद करीब ढाई साल तक मुख्यमंत्री लगातार होने वाले राजनैतिक हमलों से काफी हद तक बचे रहे थे. मीडिया रिपोर्ट से पता चला कि मंत्री से मुख्यमंत्री बनने के दौरान यादव और उनके करीबी तथा विस्तारित परिवार के सदस्यों के पास मौजूद जमीन कई गुना बढ़ गई. रिपोर्ट में दावा किया गया कि परिवार के सदस्यों ने जो जमीन खरीदी, उसमें कई ऐसे इलाकों में है, जहां उनके कार्यकाल में सरकारी विकास परियोजनाएं लाई गईं और इससे परिजनों को फायदा हुआ.

कांग्रेस ने फौरन रिपोर्ट को मुद्दा बनाया और यादव के इस्तीफे की मांग की. पार्टी का आरोप है कि वे ऊंची कुर्सी पर पहुंचे तो उनके परिवार ने भारी मुनाफा कमाया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र (जीतू) पटवारी ने सीएम यादव से मीडिया के समक्ष आकर स्पष्टीकरण देने की मांग की. दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश से कराने की मांग की है. 

इस पर यादव ने तो चुप्पी साधे रखी और तय कार्यक्रम के तहत सरकारी बैठकें और जिलों के दौरे करते रहे. लेकिन भाजपा बचाव में उतरी. पार्टी के करीब आधा दर्जन नेता और पार्टी के आइटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने मुख्यमंत्री के समर्थन में बयान जारी किया. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उज्जैन में यादव और उनकी पत्नी सीमा के पास मौजूद जमीन में उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले से लेकर अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि यादव के विस्तारित परिवार के सदस्य वर्षों से रियल एस्टेट के धंधे में हैं. उन्होंने यह भी बताया कि उज्जैन का विकास प्लान मई 2023 में यानी यादव के मुख्यमंत्री बनने से पहले ही घोषित कर दिया गया था.

खंडेलवाल ने उन आरोपों पर कोई बात नहीं की कि यादव और उनकी पत्नी की कुल 73 फीसद हिस्सेदारी वाली कंपनी सिद्धि विनायक देवकॉन ने उनके सीएम बनने के बाद 2.6 एकड़ जमीन खरीदी थी, उनके कार्यकाल के दौरान चचेरे भाई नीलेश की कंपनी को 12 एकड़ जमीन बेची थी, या फिर मुख्यमंत्री की पुत्रवधू ने 2025 के मध्य में 10 एकड़ और जमीन हासिल की थी.

मुख्यमंत्री मोहन यादव के बचाव में पार्टी ने लगाए अपने नेता

राजकाज की परीक्षा
भाजपा ने 2023 के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद यादव को मुख्यमंत्री चुना, तो पार्टी के पुराने जानकार भी हैरान रह गए थे. 2013 में उज्जैन दक्षिण से पहली बार चुने गए यादव लगातार तीसरी बार जीते थे और 2020 से 2023 के बीच शिवराज सिंह चौहान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री थे लेकिन वे किसी भी हिसाब से ऊंची कुर्सी के मुख्य दावेदारों में नहीं थे. किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले यादव ने अपने भाइयों के साथ उज्जैन के आसपास रियल एस्टेट के धंधे में उतरने से पहले परिवार के रेस्तरां के काम में भी हाथ बंटाया था.

बतौर मुख्यमंत्री यादव ने अपने पूर्ववर्ती शिवराज चौहान से अलग छाप छोड़ने की कोशिश की. उनकी सरकार ने नई औद्योगिक नीति पेश की, शहर-केंद्रित योजना के बजाए भोपाल, इंदौर और उज्जैन के आसपास मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों के विकास पर ध्यान दिया और किसानों की आय बढ़ाने के लिए डेयरी उद्योग को प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चुना. हालांकि, सरकार की महत्वाकांक्षाओं पर खजाने की तंगी भारी पड़ी. 'लाडली बहना' जैसी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं पर सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपए और मुख्यमंत्री किसान सम्मान योजना पर खर्च की वजह से नए बड़े निवेश के लिए बहुत कम गुंजाइश बची है.

यादव के करीबी अधिकारी उन्हें दो-टूक फैसले लेने वाला शख्स मानते हैं. एक प्रमुख सचिव स्तर के आइएएस अधिकारी कहते हैं, ''मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी ताकत उनकी फैसले लेने की क्षमता है. वे जिस बात से मुतमइन हो जाते हैं, तो उम्मीद यही रहती है कि उसे जल्द मंजूरी मिल जाएगी.'' मसलन, लगभग एक दशक से अटके पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे का यादव ने मन बनाने के बाद हल निकाला.

हालांकि, फौरन फैसले लेने की क्षमता का मतलब यह नहीं रहा है कि अफसरशाही के साथ उनके रिश्ते हमेशा अच्छे रहे. भोपाल में सबको पता है कि यादव और अच्छी साख वाले मुख्य सचिव अनुराग जैन के बीच कुछ मुद्दों, खासकर अफसरों की तैनाती पर अनबन रही है. मुख्यमंत्री के सचिवालय में भी ऊंचे पदों पर बार-बार बदलाव हुए हैं. हालांकि समय के साथ यादव ने भरोसेमंद कोर टीम बना ली है, जिसमें अतिरिक्त मुख्य सचिव नीरज मंडलोई और राजेश राजौरा, जन संपर्क आयुक्त मनीष सिंह और उनके गृहनगर में तैनात कई अफसर शामिल हैं.

इसके बावजूद भाजपा के कई विधायक निजी तौर पर मानते हैं कि पिछले कुछ महीनों में अफसरशाही ज्यादा मुखर और ताकतवर हो गई है. हाल ही में खत्म हुए 'ट्रांसफर सीजन' को इसका उदाहरण माना जा सकता है. महाकौशल क्षेत्र के भाजपा के एक नए विधायक कहते हैं, ''किसी विधायक की किसी विभाग के सचिव या जिला कलेक्टर के साथ अच्छी जान-पहचान है, तो उसकी सिफारिश माने जाने की संभावना ज्यादा होती है.

चाहे कोई मंत्री किसी प्रस्ताव को मंजूरी दे दे और उसे विभाग को भेज दे, फिर भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि वह प्रस्ताव पास हो ही जाएगा.'' वे वरिष्ठ अधिकारियों के साथ होने वाली नियमित विभागीय समीक्षा बैठकों के बंद होने को भी हाल के महीनों में फैसले लेने की प्रक्रिया धीमी होने की एक वजह बताते हैं. कुछ छोटी पहलकदमियों जैसे पीएम श्री एअर एंबुलेंस सर्विस और पीएम श्री हेली पर्यटन सेवा में भी रुकावटों का सामना करना पड़ा है.

सियासी तलवार की धार
राजकाज के मामले में यादव को परीक्षा देनी पड़ी, लेकिन राजनीति तो और कठिन परीक्षा लेती रही है. उन्हें ऐसी सरकार मिली जिसमें सत्ता के कई केंद्र थे. लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने कैबिनेट में पुराने नेताओं की हिस्सेदारी कम करके सत्ता के बदलाव को आसान बनाने की कोशिश की. यह जगजाहिर है कि कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल और विजय शाह जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ यादव के संबंध असहज हैं.

यादव के सबसे अहम फैसलों में एक है अपने पास 11 विभाग रखना, जबकि उनकी 30 सदस्यीय कैबिनेट के ज्यादातर वरिष्ठ मंत्रियों को सिर्फ एक अहम विभाग ही मिला है. सरकार का मुखिया होने के अलावा यादव के पास गृह, उद्योग, खनन, वन, जनसंपर्क और नर्मदा घाटी विकास जैसे विभाग भी हैं. मध्य प्रदेश की हाल की राजनीति में सत्ता का ऐसा केंद्रीकरण पहले कभी नहीं देखा गया. शिवराज सिंह चौहान ने कार्यकाल के दौरान बहुत कम विभाग अपने पास रखे थे जबकि दिग्विजय सिंह ने आखिरी कार्यकाल में लगभग कोई विभाग अपने पास नहीं रखा था. भोपाल के एक राजनैतिक जानकार कहते हैं, ''इतने सारे विभाग अपने पास रखने से अलग-अलग विभागों के कामकाज पर असर पड़ता है. लेकिन ऐसा इसलिए किया गया है ताकि सीएम को कैबिनेट के अपने सहयोगियों से स्पष्ट तौर पर ऊपर रखा जा सके.''

इसके अलावा, यादव ने अपनी राजनैतिक टोली भी तैयार की है. राव उदय प्रताप सिंह, राकेश सिंह, चैतन्य कश्यप और नरेंद्र पटेल जैसे मंत्री उनके करीबी माने जाते हैं. हालांकि कैबिनेट में फेरबदल को लेकर अटकलें जारी हैं. शायद उससे मुख्यमंत्री को सरकार पर अपनी पकड़ बनाने का एक और मौका मिले.

यादव को पूर्व आरएसएस सह-सरकार्यवाह सुरेश सोनी का करीबी माना जाता है: उन्होंने सरकार और आरएसएस की विचारधारा से जुड़ी प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बैठाने की कोशिश भी की है. उनकी सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है जबकि धार्मिक महत्व वाले 19 कस्बों में शराब की बिक्री पर रोक को संघ के पक्ष में एक और कदम के तौर पर देखा गया. हालांकि व्यवहार में इसका असर बहुत कम दिखा है. शराब म्युनिसिपल सीमा के बाहर उपलब्ध है और शराब पीने पर कोई रोक नहीं है, सिर्फ तय इलाके में उसकी बिक्री पर रोक है. लेकिन संघ के कुछ लोग निजी तौर पर संस्कृत शिक्षा के विस्तार पर कम जोर दिए जाने को लेकर निराशा भी जाहिर करते हैं.

अलबत्ता, भाजपा संगठन में अब यादव की पकड़ बढ़ गई है. बैतूल के विधायक खंडेलवाल का प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चुना जाना, राज्य कार्यकारिणी का पुनर्गठन और निगमों तथा बोर्डों में राजनैतिक प्रमुखों की नियुक्ति वगैरह को मुख्यमंत्री के बढ़ते असर के तौर पर देखा जा रहा है. पर्याप्त विधायक न होने के बावजूद मध्य प्रदेश से भाजपा को तीसरी राज्यसभा सीट दिलाने में मदद करके उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा भी जीता.

अब उस राजनैतिक साख की परीक्षा हो रही है. अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर इस्तीफे की बातें अब काफी हद तक पुरानी हो चुकी हैं, ऐसे में यादव का ध्यान अपने राज्य की चुनौतियों पर केंद्रित दिख रहा है. दतिया में होने वाला आगामी उपचुनाव भाजपा की चुनावी मशीनरी की परीक्षा लेगा. बेशक, अगर उन्हें 2028 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करना है तो वरिष्ठ नेताओं से संबंध सुधारना भी अहम होगा.

मोहन यादव के सबसे अहम फैसलों में से एक है अपने पास 11 विभाग रखना, जबकि उनकी 30 सदस्यीय कैबिनेट के ज्यादातर वरिष्ठ मंत्रियों को सिर्फ एक प्रमुख विभाग ही मिला है. 

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