डिप्टी सीएम बनकर भी क्या हैं अजीत पवार की उलझनें?

सही मायने में अजित पवार का सियासी भाग्य 2024 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन के प्रदर्शन से तय होगा

जुलाई में विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान अजीत पवार
जुलाई में विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान अजीत पवार

जुलाई के अंत में, महाराष्ट्र सरकार ने एक निर्देश जारी किया कि उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अजित पवार की ओर से अप्रूव्ड कोई भी प्रस्ताव अंतिम मंजूरी के लिए, दूसरे उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की टेबल से होकर ही मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यालय में जाना चाहिए. इस आदेश को अजित के पर कतरने के प्रयास के रूप में देखा गया.

इससे कुछ हफ्ते पहले ही अजित तख्तापलट करते हुए अपने चाचा और पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को तोड़कर भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) सरकार में शामिल हो गए थे. अजित को महत्वपूर्ण वित्त विभाग मिला, वहीं उनके सहयोगियों को कोऑपरेटिव और कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी मिले. जून 2022 में शिंदे के शिवसेना से अलग होने के बाद, अजित ने शरद पवार की जगह खुद को एनसीपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया और भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा ठोक दिया.

चार महीने बाद भी अजित तीन दलों के गठबंधन में अपनी माकूल जगह तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी एनसीपी, भाजपा और शिंदे की सेना के बीच अभी भी मनमुटाव है और बताया जाता है कि प्रशासन से जुड़े फैसले मुख्य रूप से फडणवीस ही ले रहे हैं (यह पहली बार है कि महाराष्ट्र में दो डिप्टी सीएम बने हैं). एनसीपी गुट के नेता अपने अक्खड़ मिजाज के लिए जाने जाते हैं (जो कई बार बहुत कठोर होने की हद तक होता है) लेकिन सूत्रों का दावा है कि गठबंधन की राजनीति ने 'अजित दादा को नरम' बना दिया है.

दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि डिप्टी सीएम की भूमिका में अपने पिछले अवतारों के विपरीत, अजित इस बार 'नरम' थे और सरकार पर फडणवीस का प्रभाव अधिक था. दरअसल, मराठा आरक्षण आंदोलन पर बढ़ती अशांति के बाद शिंदे और फडणवीस इस मुद्दे पर चर्चा के लिए हाल ही में नई दिल्ली पहुंचे थे. अजित ने बाद में दावा किया कि उन्हें इस यात्रा की जानकारी नहीं थी. लेकिन जहां शिंदे मराठा कार्यकर्ता मनोज जारांगे-पाटिल का उपवास खत्म कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे, अजित पूरे परिदृश्य में कहीं नजर नहीं आए (उनके सहयोगियों का कहना है कि वे डेंगू से पीड़ित थे).

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री का कहना है कि शिंदे और फडणवीस ने अपनी शुरुआती हिचक को दूर करके अच्छे आपसी कामकाजी संबंध स्थापित कर लिए थे, लेकिन अजित के प्रवेश से इसमें बाधा आ गई है. कांग्रेस नेता का दावा है कि अतीत में वित्त विभाग पर अजित का नियंत्रण होने के साथ ही सत्ता समीकरण उनके पक्ष में थे, "लेकिन फडणवीस के प्रभाव को देखते हुए अब वे ऐसा नहीं कर सकते."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मध्य प्रदेश की सभा में एनसीपी पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के कुछ ही दिनों बाद अजित को अचानक कैबिनेट में शामिल कर लिया गया तो शिंदे खेमा अचरज में पड़ गया क्योंकि इससे उन पर पर भाजपा की निर्भरता कम हो गई है. मंत्रिमंडल विस्तार में जगह मिलने का इंतजार कर रहे शिंदे के विधायकों को निराशा हाथ लगी. दूसरी ओर, इस धारणा ने भी अजित की रसूखदार नेता की छवि को नुक्सान पहुंचाया है कि वे 'ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की कार्रवाई' के डर से भाजपा की शरण में चले आए हैं.

यहां तक कि फडणवीस भी मानते हैं कि एनसीपी एक स्वाभाविक सहयोगी नहीं थी. उन्होंने कहा, "शिवसेना हमारी स्वाभाविक सहयोगी है. एनसीपी हमारी राजनैतिक सहयोगी है. यह अब तक हमारी स्वाभाविक सहयोगी नहीं बन पाई है क्योंकि हम वर्षों तक एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहे हैं. अगर हम अगले 10-20 साल तक साथ रहें तो एनसीपी हमारी स्वाभाविक सहयोगी बन सकती है." उन्होंने यह बात हाल में हुए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कही. एनसीपी नेता भी मानते हैं कि यह व्यवस्था गठबंधन से ज्यादा एक 'शांति समझौता' है.

गौरतलब है कि भाजपा की ओर से शिंदे की जगह पवार को सीएम बनाने की खबरें नियमित रूप से सामने आती रहती हैं, लेकिन फडणवीस जोर देकर कहते हैं कि चुनाव में गठबंधन का नेतृत्व शिंदे ही करेंगे. यह बताते हुए कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव शिंदे के नेतृत्व में लड़े जाएंगे, फडणवीस ने कहा, "जब अजित दादा को (सीएम) बनाना होगा, तो हम उन्हें पूरे पांच साल के लिए बनाएंगे, फिलहाल तो मैं आपको स्पष्ट रूप से बता दूं, शिंदेजी मुख्यमंत्री हैं और वही रहेंगे." शिंदे और उनके विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के पास लंबित हैं. 20 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने नार्वेकर को निर्देश दिया था कि वे इन याचिकाओं पर 31 दिसंबर तक फैसला कर लें. उन्हें 24 जनवरी, 2024 तक एनसीपी खेमे की ओर से दायर अयोग्यता याचिकाओं पर भी फैसला देने का निर्देश दिया गया है.

शिंदे के इस दावे के बावजूद कि अजित के शामिल होने से 'डबल-इंजन' सरकार 'ट्रिपल इंजन' सरकार में बदल गई है, राजनीति के साथ नीतिगत विषयों पर भी सहयोगियों में मतभेद दिख रहे हैं. जबकि सीएम कार्यालय में बड़ी परियोजनाओं की प्रगति की निगरानी के लिए एक वॉर रूम है, अजित ने एक समानांतर परियोजना प्रबंधन इकाई (पीएमयू) स्थापित की है. उन्होंने संवाददाताओं को बताया कि उनकी इस समीक्षा व्यवस्था का मकसद परियोजनाओं पर चल रहे काम में तेजी लाना है.

अगस्त में, राज्य सरकार ने उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) से 539 करोड़ रुपए का मार्जिन मनी ऋण हासिल करने के लिए भाजपा नेताओं के नियंत्रण वाली छह चीनी सहकारी मिलों पर कड़ी शर्तें लगाई गई थीं. निदेशकों पर पुनर्भुगतान की जिम्मेदारी तय करने वाली अतिरिक्त शर्तें अजित द्वारा लगाई गई थीं. शर्मनाक बात यह है कि सरकार को कई नीतिगत फैसले भी वापस लेने पड़े हैं. इसमें सरकारी नौकरियों में संविदा आधारित भर्ती (अक्टूबर), किसानों की ओर से अन्य राज्यों की मिलों को गन्ना बेचने पर प्रतिबंध (सितंबर), और राज्य संचालित स्कूलों में 64 लाख छात्रों के लिए मानकीकृत वर्दी (मई) जैसे फैसले शामिल है.

जिलों के संरक्षक मंत्रियों के पदों का बंटवारा टकराव का एक अन्य मुद्दा है. शिंदे के विधायक और यहां तक कि भाजपा के विधायक भी महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे को रायगढ़ जिले की संरक्षक मंत्री नियुक्त करने की योजना का विरोध कर रहे हैं. अदिति, अजित के विश्वासपात्र और रायगढ़ सांसद सुनील तटकरे की बेटी हैं. शिंदे के वफादार और महाड़ विधायक भरतसेठ गोगावले का अदिति के साथ मतभेद था, जो पिछली एमवीए (महाविकास अघाड़ी) गठबंधन सरकार में राज्य मंत्री भी थीं. नासिक में एनसीपी के कोटे से खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री छगन भुजबल, शिंदे की शिवसेना के दादाजी भुसे की जगह लेने के इच्छुक बताए जा रहे हैं. 

अजित पुणे के संरक्षक मंत्री का पद भाजपा नेता और उच्च शिक्षा मंत्री चंद्रकांत पाटिल से छीनने में कामयाब रहे हैं. एक वरिष्ठ भाजपा नेता का कहना है कि शिंदे ने सरकार में अजित की भूमिका सीमित कर दी है, जो उनकी तब की भूमिका के मुकाबले बहुत कम है जब वे (एमवीए सरकार में, नवंबर 2019-जून 2022 में) उद्धव ठाकरे के डिप्टी हुआ करते थे. भाजपा नेता कहते हैं, "कुल मिलाकर देखें तो अजित का एनसीपी गुट हमारे लिए फायदेमंद पार्टी है. उनके मंत्री अनुभवी हैं और उनके निर्वाचन क्षेत्रों और जिलों में मजबूत समर्थन है, जो हमें लोकसभा चुनाव में मदद करेगा."

अजित के एक विश्वासपात्र का कहना है कि शिंदे और उनके लोगों के विपरीत, जिन्हें कट्टर शिवसैनिक गद्दार मानते थे, अजित के खिलाफ एनसीपी काडर में ऐसी कोई भावना नहीं है. उनकी छवि एक ऐसे कुशल नेता की रही है जो काम करवाता है और प्रशासन पर अंकुश भी रखता है. इसके बावजूद शरद पवार के प्रति वफादार एक एनसीपी नेता का कहना है कि पार्टी के कुछ विधायक जो अजित के साथ चले गए थे, वे अब खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं. वास्तव में अजित ने पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल पटेल और तटकरे जैसे सहयोगियों को संगठनात्मक भूमिकाएं सौंपी हैं, वे भी सहज नहीं महसूस कर रहे हैं. लेकिन अजित के करीबी एक एनसीपी नेता जोर देकर कहते हैं कि सब कुछ ठीक है.

उन्होंने कहा, "तीनों पार्टियों के बीच समन्वय अच्छा है" लेकिन यह भी स्वीकार किया कि भाजपा और एनसीपी दोनों के ही मध्य स्तर के नेता और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में मतभेद था, जिसका एक कारण उनकी अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि थी—एनसीपी मुख्य रूप से मराठाओं की पार्टी थी जबकि भाजपा की ओबीसी के बीच मजबूत पैठ है. धनगर (चरवाहा) जाति के बीच मजबूत समर्थन आधार रखने वाले नेताओं में से एक भाजपा एमएलसी गोपीचंद पड़ालकर ने पवार परिवार के खिलाफ अपने तीखे हमले जारी रखे हैं.

अजित खेमे के एक सूत्र ने भी माना कि अजित के लिए अपने चाचा की छाया से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था. वे कहते हैं, "परंपरागत रूप से, मराठा मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की ओर है. यहां तक कि जब 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस तोड़कर एनसीपी बनाई थी, तब भी वे वृहत कांग्रेस परिवार से ज्यादा दूर नहीं गए. एनसीपी अपने जीवनकाल में अधिकांश समय कांग्रेस के साथ गठबंधन में रही है. अजित के लिए इन मराठा मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी जिनका शरद पवार के साथ भावनात्मक जुड़ाव है."

हालांकि, सूत्र ने इस बात को रेखांकित किया कि एक तरफ जहां शिंदे और उनकी पार्टी की पहचान भाजपा के आगे बौनी पड़ गई है, वहीं अजित भाजपा के सहयोगी होने के बावजूद कैसे अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहे हैं. मुख्यमंत्री शिंदे भी मराठा हैं लेकिन प्रशासन पर उनकी पकड़ पवार जैसी नहीं है. इससे पवार को एक दमदार नेता और सफल प्रशासक के तौर पर अपनी छवि मजबूत करने में मदद मिल सकती है. आगे चलकर वह संभावित सीएम उम्मीदवार बन सकते हैं. सूत्र ने बताया, "लेकिन यहां उन्हें फडणवीस से चुनौती मिल रही है. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि फडणवीस और भाजपा ने ओबीसी का एक ऐसा सामाजिक समीकरण बनाया है, जिससे राज्य की राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर मराठाओं की पकड़ पहले की तरह मजबूत नहीं रह गई है."

सही मायने में अजित का सियासी भाग्य तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इस महागठबंधन के प्रदर्शन से तय होगा. शानदार प्रदर्शन उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा सकता है. लंबे समय तक एनसीपी कवर करने वाले एक अनुभवी पत्रकार कहते हैं, "लाख टके का सवाल यह है कि क्या भाजपा उन्हें बारामती लोकसभा सीट पर चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ अपने बेटे पार्थ या पत्नी सुनेत्रा को मैदान में उतारने पर राजी कर लेगी. अगर ऐसा हुआ तो बड़ा पवार कुनबा पूरी तरह दो-फाड़ हो जाएगा. हालांकि, ऐसे में सीनियर पवार व्यापक सहानुभूति बटोरने में सफल हो सकते हैं."

केंद्रीय जांच एजेंसियों के साये ने अजित की आक्रामक छवि को धूमिल कर दिया है. उन्होंने कहा, "किसी नेता की छवि उसके डटकर लड़ने अथवा किसी स्थिति से भाग खड़े होने पर निर्भर करती है. पवार सीनियर को फाइटर के तौर पर देखा जाता है. वहीं, अजित की साख को बट्टा लग चुका है." हालांकि, अजित गुट के एक वरिष्ठ नेता इससे इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "भाजपा से हाथ मिलाने का एक कारण यह था कि हमारे अधिकांश विधायक पहली बार चुने गए हैं और दोबारा निर्वाचन के लिए उन्हें अपने क्षेत्रों में विकास कार्यों के मामले में कुछ करके दिखाना होगा. सत्ता में होने से इसमें मदद मिलती है. उनका पूरा भविष्य दांव पर लगा है."

एक अन्य एनसीपी नेता का कहना है कि भाजपा और शिंदे की सेना के बीच मतभेद अधिक स्पष्ट दिखते रहे हैं. उनके मुताबिक, "एनसीपी का जनाधार और इन दोनों पार्टियों का मतदाता वर्ग अलग-अलग है. लेकिन भाजपा और सेना की प्रतिस्पर्धा एक समान ही मतदाता वर्ग के लिए होती है." एनसीपी को साथ लाने का फैसला भाजपा ने विधानसभा में उनके संख्या बल (जिसमें गठबंधन के बाद पर्याप्त बहुमत था) के आधार पर नहीं किया था, बल्कि इसके पीछे इरादा लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन सुनिश्चित करना था. 2019 में भाजपा और अविभाजित शिवसेना ने 48 में से 41 सीटों पर जीत हासिल की थी; 2024 में तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के लिए महाराष्ट्र में इसी तरह का प्रदर्शन दोहराना बेहद अहम होगा.

वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान कहते हैं, "एनसीपी को साथ लेना दर्शाता है कि भाजपा यह मान चुकी है कि शिंदे लोकसभा चुनाव में गठबंधन के लिए कुछ खास नहीं कर पाएंगे." क्या शिंदे को बदला जाएगा, जैसी अटकलें लगाई जा रही हैं. प्रधान भाजपा को तीन दलों के गठबंधन में सबसे ज्यादा नुक्सान में रहने वाली पार्टी के तौर पर देखते हैं क्योंकि सबसे अधिक संख्या के बाद भी वह तीसरे स्थान पर नजर आती है. इसका भाजपा कैडर के मनोबल पर जो प्रभाव पड़ा है, वही इसके लिए सबसे बड़ा खामियाजा है.

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