सियासत के 'धैर्यवान बाबा' को मिलेगी मुख्यमंत्री की कुर्सी?

2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत में टी.एस. सिंह देव की बड़ी भूमिका थी लेकिन पार्टी ने सीएम के लिए भूपेश बघेल को चुना

मुंगोली में चुनाव प्रचार के दौरान टी.एस. सिंह देव (फोटो: उबेश मंसूरी)
मुंगोली में चुनाव प्रचार के दौरान टी.एस. सिंह देव

छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री, 71 साल के त्रिभुवनेश्वर शरण सिंह देव उस दौर को याद करते हैं. वे अपने पिता के साथ शिकार पर जाते थे और जंगल के भीतर बने पानी के छोटे-छोटे गड्ढों के पास शिकार के इंतजार में ताक लगाकर बैठते थे, जहां जानवर पानी पीने के लिए आते थे. पूर्ववती सरगुजा रियासत के 'महाराजा' सिंह देव जिन्हें लोग प्यार से बाबा भी पुकारते हैं, बताते हैं कि बचपन के इस अनुभव ने उनके भीतर धैर्य पैदा करने में मदद की.

कई दशक बाद, यह धैर्य ही था जिसने उन्हें उस कठिन दौर का खामोशी से सामना करने की हिम्मत दी जब उनकी पार्टी कांग्रेस ने कथित तौर पर बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद देने का अपना वादा नहीं निभाया और यहां तक कि सीएम भूपेश बघेल के साथ उनके तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने भी उन्हें तवज्जो देना बंद कर दिया. आखिरकार इस साल जून में सिंह देव को डिप्टी सीएम के रूप में पदोन्नत किया गया क्योंकि कांग्रेस प्रदेश में आंतरिक गतिरोध को दूर कर एकजुट होकर चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही थी.

छत्तीसगढ़ में चुनावी मौसम है. सिंह देव एक हेलिकॉप्टर से राज्य में घूम रहे हैं, एक के बाद एक जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं. पूर्ववर्ती सरगुजा राज्य की राजधानी अंबिकापुर के बाहरी इलाके में बने दरिमा हवाई पट्टी पर उतरने के बाद, टर्मिनल से बाहर निकलते ही वे खुद कार चलाने लगते हैं. सिंह देव ने अंबिकापुर विधानसभा सीट से 2008 चुनावों से लगातार तीन बार जीत हासिल की है. वे याद करते हैं, "पहले ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र के रूप में हम केवल छुट्टियों के दौरान अंबिकापुर आते थे और हमारा अधिकांश समय बाहर ही बीतता था. भले ही मेरी मां दिवंगत देवेंद्र कुमारी, 1970 के दशक में अविभाजित मध्य प्रदेश में मंत्री थीं लेकिन राजनीति में मेरा प्रवेश बहुत बाद में हुआ."

अपनी शाही पृष्ठभूमि को ज्यादा महत्व न देते हुए, सिंह देव का कहना है कि कांग्रेस का दृष्टिकोण हमेशा से समाजवादी रहा है. वे कहते हैं, "हम इसे अच्छी तरह जानते-समझते हैं और इसमें शामिल हुए हैं क्योंकि यह एक बहुत ही मिलनसार पार्टी है जो हर पृष्ठभूमि के लोगों को साथ लेकर चलती है." सिंह देव ने अपनी पार्टी के लोगों को साथ लेकर 2018 में कांग्रेस की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन आलाकमान ने राज्य की बागडोर संभालने के लिए उनके बजाए बघेल को चुना. चूंकि कांग्रेस ने उन्हें सीएम बनाने का कोई संकेत नहीं दिया है.

उनका दावा है कि बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया गया था, जिसे पार्टी ने कभी खारिज भी नहीं किया है. लगभग एक साल पहले एक समय ऐसा भी आया था, जब उन्होंने वास्तव में राजनीति से संन्यास लेने का फैसला कर लिया था. वे साफ तौर पर कहते हैं, "अगर मैं सरकार में हूं तो मैं एक ऐसा व्यक्ति बनना चाहता हूं जिसकी कुछ उपयोगिता हो. मैं सिर्फ पद पर बने रहने के लिए सरकार में नहीं रहना चाहता."

जब पार्टियां बदलने का मौसम चल रहा हो, क्या किसी अन्य पार्टी में शामिल होना उनके लिए भी एक विकल्प हो सकता है? उत्तर में सिंह देव कांग्रेस के साथ अपने लंबे जुड़ाव की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं, "आप जानते हैं, जनता पार्टी सरकार के दौरान जब कांग्रेस (आई) का गठन हुआ था तो अंबिकापुर में छह लोग इसमें शामिल हुए थे. यहां के भर्ती प्रभारी की शिकायत थी कि कोई भी आगे नहीं आ रहा है. मैंने उस समय सदस्यता फॉर्म भरा और पार्टी में शामिल हो गया." वे यह स्पष्ट करते हैं कि कभी भी कांग्रेस छोड़ने का ख्याल तक उनके मन में नहीं आया.

सिंह देव चुनाव प्रचार कर रहे हैं, जनता से वादे कर रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निशाना साध रहे हैं लेकिन इसके बीच एक चीज गायब है, वह है बघेल के साथ उनका सौहार्द, जो 2018 की ऐतिहासिक जीत से पहले दिखता था. अगर कांग्रेस को एक बार फिर सरकार बनाने का मौका मिलता है, तो दोनों ही नेताओं का कहना है कि नेतृत्व का फैसला आलाकमान करेगा. क्या सिंह देव का धैर्य आखिरकार रंग लाएगा?

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