बच्चों के शिकारियों का शिकार
इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े अपराधों की रोकथाम और अपराधियों की धर-पकड़ के लिए सीबीआइ की विशेष इकाई कैसे काम करती है

दृश्य 1
चंदौली, उत्तर प्रदेश
उस दिन होली थी. 17 मार्च, 2022 का दिन. उत्तर प्रदेश में ठेठ पूरब का यह कोना भी रंगों की मस्ती और उल्लास के उसी रोमांच में डूबा था. चंदौली में 35 वर्षीय अजय कुमार गुप्ता तमाम दूसरे आम लोगों की तरह दिखता था—दीपू और पवन (बदले हुए नाम) सरीखे पड़ोस के बच्चों का सीधा-सादा 'अंकलजी'. 15 बरस के दोनों बच्चे अच्छे खाने और होली की मिठाइयों के लालच में उसके घर के अंदर चले गए. फिर बिना बताए नशा मिला ड्रिंक या शायद बियर उन्हें पिलाई गई. जब वे नशे में धुत हो गए, गुप्ता ने उन्हें कपड़े उतारने का हुक्म दिया; फिर एक दूसरे को सहलाने का... और धीरे-धीरे इसे हर मुमकिन यौन क्रियाओं तक बढ़ाने का. उन्हें भनक तक नहीं थी कि उनकी सारी हरकतें रिकॉर्ड की जा रही थीं. वीडियोग्राफी होने के बाद गुप्ता ने लड़कों के साथ जबरदस्ती की और वे दर्द से चीखते-चिल्लाते रहे. वे काफी डरे हुए थे. यह शोषण तीन साल से चल रहा था. हर बार इसका अंत खौफनाक धमकियों और मामूली तोहफों से होता. बाद में गुप्ता ने ये वीडियो व्हाट्सऐप और टेलीग्राम के जरिए अपने दोस्त अजित कुमार को भेजे, जो ओडिशा के राउरकेला में असिस्टेंट लोको पायलट और 35 की उम्र का ही था. इस तरह उन्होंने, डिजिटल महासागरों में बाल यौन शोषण के साथ फलने-फूलने वाली अर्थव्यवस्था से जुड़कर इस चक्र पूरा कर दिया.
दृश्य 2
तंजावुर, तमिलनाडु
इस जनवरी में गूगल ने चंदौली से काफी दूर दक्षिण भारत में एक ईमेल एकाउंट पर एक संदेश भेजा. इसमें कहा गया था, ''लगता है इस एकाउंट पर यौन दुर्व्यवहार या शोषण का शिकार हो रहे बच्चे से जुड़ी सामग्री है. यह गूगल की नीतियों का गंभीर उल्लंघन है और गैरकानूनी हो सकता है. अगर आपको लगता है कि आपका एकाउंट गलती से डिसएबल हो गया था, तो जल्द से जल्द अपील पेश करें.'' बेशक यह गलती नहीं थी. सिवाय इसके कि 35 वर्षीय पीएचडी स्कॉलर जे. विक्टर जेम्स आम तौर पर इंटरनेट के ज्यादा धुंधले इलाकों में समान झुकाव वाले लोगों की तलाश में घूमना पसंद करता था. हालांकि ग्रिंडर और ब्लूड सरीखे खास सोशल मीडिया ऐप भी उसकी इस सैर से बाहर नहीं थे. इस बार उसने अंतरराष्ट्रीय गिरोह के हाथों चलाई जा रही वेबसाइट पर ऐसा वीडियो अपलोड कर दिया. मगर यह गूगल क्लाउड पर पहुंच गया, क्योंकि उसने इसे अपने निजी जीमेल एकाउंट से जोड़ा था—उसने छोटी-मोटी लाइब्रेरी बना ली थी जो बीते सालों में बढ़ती गई. जिस वीडियो से उसकी कहानी पर विराम लगा, उसमें उसने संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी थी. यह वीडियो क्लिप उसने खुद बनाई थी और इसमें वह 10 साल की लड़की पर यौन हमला करते दिख रहा था.
पहली नजर में ये दृश्य हाशिये के गुमराह लोगों और उनकी पथभ्रष्ट जिंदगियों पर केंद्रित किसी ओटीटी सीरीज के ट्रेलर की तरह मालूम पड़ सकते हैं. मगर ये भूगोल और वर्ग के प्रति किसी खास पक्षपात के बगैर पूरे भारत में घटित हो रहे हैं—और शायद इतने नियमित कि ये अनजान, अनाम या अनदेखे नहीं रह गए हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2021 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,49,404 मामले दर्ज किए, जो 2020 के मुकाबले 16 फीसद ज्यादा थे. इनमें से 53,874 या 36 फीसद यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉक्सो) अधिनियम 2012 के तहत दर्ज किए गए. इनमें 33,348 जितने ज्यादा मामले इस कानून की धारा 4 और 6 तहत के आते थे, जो पेनिट्रेटिव यौन हमले और ज्यादा गंभीर पेनिट्रेटिव यौन हमले से जुड़ी धाराएं हैं. जैसा कि अक्सर होता है, असली आंकड़े काफी ज्यादा होंगे, क्योंकि निजी सदमे, डर और लोक लाज के कारण शिकार लोगों की बहुत बड़ी तादाद कभी पुलिस के पास नहीं जाती.
निजी अपराध का यह काफी अंधकारमय लेकिन छोटे पैमाने पर चल रहा और सीमित भूभागों तक का पसरा यह इलाका इंटरनेट की बदौलत इस तरह बढ़ गया है कि उसे मापा नहीं जा सकता. नतीजा है बदले हुए रूप में ऑनलाइन चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज (ओसीएसए) यानी बच्चों के साथ ऑनलाइन यौन बदसुलूकी, जो देश के काले-अंधेरे कोनों में तेजी से फैलती दिख रही है. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) की चार साल पुरानी विशेष ऑनलाइन चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज ऐंड एक्प्लॉइटेशन (ओसीएसएई) रोकथाम/जांच इकाई इस चोरी-छिपे अवैध संसार पर गिद्ध की तरह पैनी नजर रखती है. जांच एजेंसी इस अपराध को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आइसीटी) के साधनों का इस्तेमाल करके नाबालिगों के साथ यौन बदसुलूकी या शोषण के रूप में परिभाषित करती है. इसमें ऑनलाइन चाइल्ड पोर्नोग्राफी तैयार करना और साझा करना शामिल है.
इसे दुनिया भर में चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज मटीरियल (सीएसएएम) या बाल यौन दुर्व्यवहार सामग्री का नया नाम दिया गया है. एजेंसी ऑनलाइन बाल यौन बदसुलूकी के तीन बुनियादी रूपों की पहचान करती है—बच्चों के अश्लील वीडियो या तस्वीरें साझा करना, जो सबसे ज्यादा प्रचलित प्रकार है; ऑनलाइन ग्रूमिंग, जिसमें कोई वयस्क किसी बच्चे को यौन क्रियाओं से जुड़ी चैट में शामिल करता है; और बच्चे से लाइव स्ट्रीमिंग के लिए कपड़े उतारने या यौन कृत्य करने को कहना, या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर यौन तस्वीर या वीडियो साझा करना. सीबीआइ की जांच के जो नतीजे इंडिया टुडे के हाथ लगे, वे देश भर में हो रहे यौन बदसुलूकी और शोषण के ऐसे कृत्यों का चौंकाने वाला खुलासा करते हैं.
गुप्ता और विक्टर दोनों के मामले उन 52 मामलों में हैं जिनकी जांच ओसीएसएई अब तक कर सकी है. इनमें 60 नाबालिग पीड़ितों की पहचान करके सीधे बदसुलूकी करने वाले 14 लोगों सहित 133 दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है. एजेंसी ने पाया कि वे काफी अलहदा लोग थे. उसकी पकड़ में आए सबसे गंभीर अपराधियों में से एक रामभवन उत्तर प्रदेश के सिंचाई और जल संसाधन महकमे में मामूली जूनियर इंजीनियर था, तो जांच एजेंसी ने पाया कि इन अपराधियों की सामाजिक हैसियत निम्न-मध्यम तबके से लेकर कुलीन तबके की सीमा तक जाती है. सीएसएएम आइआइटी के छात्र, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, रेडियो फ्रीक्वेंसी इंजीनियर, दवा वितरक, रेस्तरां मालिक, एकाउंटेंट, स्टील फर्म में मेकैनिकल असिस्टेंट, मनोविज्ञान के मास्टर्स छात्र, विभिन्न बैचलर्स डिग्री की पढ़ाई करने वाले छात्र और यहां तक कि नर्सिंग डिप्लोमा के छात्रों के फोन/इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों पर पाए गए. अगर सीबीआइ सूंघती हुई नहीं आती तो वे सब अपनी आरामगाह में सुरक्षित छिपे बैठे सीधे बच्चों का शोषण कर रहे होते या दूसरों को ऐसा करते देखकर सुख पा रहे होते.
सीएसएएम के ऑनलाइन बाजारों और जिस दमघोंटू असल दुनिया में यह सब वाकई होता है, दोनों के किनारे एक दूसरे से मिलते हैं. विक्टर ने अपराध में संभावित भागीदार के साथ, जो तमिलनाडु का ही था, संपर्क ब्लूड ऐप के जरिए किया. खुद को करण बताते हुए विक्टर ने उसे कुछ वीडियो भेजे और कहा कि ये उसने ही रिकॉर्ड किए थे. फिर उसने एक चुग्गा भी डाला —उसने कहा कि सभी बच्चे उसके गांव के थे और वह वहां जाता तो उनके साथ सेक्स कर सकता था. विक्टर अभी रंगरूट ही था जबकि गुप्ता विस्तार के दूसरे चरण में पहुंच गया था. शुरुआत में वह पैसे के बदले अपने दोस्त अजित को वीडियो और फोटो भेजता था. महज उपभोक्ता होने से थक चुके अजित ने जल्द खुद इस कृत्य में शामिल होने की इच्छा जाहिर की, और वह भी चंदौली आ गया. दीपू और पवन के साथ सत्र चले और उनके वीडियो बना लिए गए. यह गुप्ता के लिए नशे की तरह हो गया—और यही मुश्किल पैदा कर सकता था. वह इसे कारोबार के साथ मिलाते हुए सुख भी हासिल कर रहा था. फिर यह होना ही था कि कारोबार की ललक ने जोर मारा. गुप्ता ने दायरा बढ़ाकर ज्यादा धन कमाने का फैसला किया. 2021 में उसने चंदौली में निजी संस्था चलाने वाले अवनीश कुमार सिंह से संपर्क किया. अवनीश आया और गुप्ता ने दीपू और पवन को उसके सामने परोस दिया. कई और संगतों के दौर चले. हरेक में बर्बरता होती, जो नशे मिले ड्रिंक्स, जबरन प्यार-दुलार, सहलाने और कई किस्म के मुख और गुदा हमलों की जानी-पहचानी पराकाष्ठा तक जाती.
सीबीआइ का धावा
ये अपराधी कानून से बचे रहकर अपने इन कामों में अब भी लगे होते, अगर सीबीआइ उस मामले के पीछे न पड़ती जिसने तपे-तपाए अफसरों को भी चौंका दिया. यह ऐसा मामला था जिसमें जांचकर्ता उन्नत टेक्नोलॉजी और इलाके के मुखबिरों के जाल के जरिए रास्ता साफ करते हुए ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते, मामला बड़ा और बुराई का फैलाव चौड़ा होता जाता. नवबंर, 2021 में उन्होंने इसे औपचारिक नाम दिया—ऑपरेशन कार्बन. यह मुजरिमों के हाथों फैलाई जा रही कालिख को देखते हुए उचित ही था. यह देशव्यापी कार्रवाई में बदल गया—14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 55 जिलों में 77 जगहों पर छापे मारे गए. नतीजा था 17 तत्काल गिरफ्तारियां और कुल 55 संदिग्धों के खिलाफ 23 अलग-अलग मामले. सीबीआइ को विदेशी नागरिकों का भी पता चला और दूसरे देशों को एमएलएटी (म्यूचुअल लीगल असिस्टेंट ट्रीटीज) यानी आपसी कानूनी सहयोग संधियों के तहत 46 अनुरोध और इंटरपोल के 269 संदर्भ भेजे गए. कुल मिलाकर एजेंसी ने सीएसएएम बांटने में शामिल 5,707 लोगों की पहचान की, जिनमें 2,920 विदेशी (127 देशों के) और 2,787 भारतीय (24 राज्यों में फैले) थे.
मगर यह सब 2020 में पुराने रंग-ढंग से शुरू हुआ—एक सूत्र से मिला छोटा-सुराग और लिप्तता के सबूतों से भरी पेन ड्राइव. तब सीबीआइ को सीएसएएम से जुड़े मामलों की जांच के लिए ओसीएसएई इकाई बनाए एक साल ही हुआ था और पेन ड्राइव उसे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में जूनियर इंजीनियर रामभवन की निशानदेही तक ले गई. इसमें सीएसएएम के 34 वीडियो और 679 फोटो थे, जो साफ तौर पर डार्क वेब या विशिष्ट प्लेटफॉर्मों पर बेचे या साझा किए जाने थे. जो चीज उनके हाथ लगी, वह पूरा शैतान का कारखाना था—10 मोबाइल फोन, दो लैपटॉप, एक डिजिटल रिकॉर्डिंग कैमरा, सेक्स खिलौने, छह मेमोरी कार्ड, छह पेन ड्राइव और 8 लाख रुपए से ज्यादा की नकदी.
मूलत: बांदा का रहने वाला रामभवन सीबीआइ के जाल में फंसी सबसे बड़ी मछलियों में से एक निकला. उसकी शैतानी करतूतों का कच्चा चिट्ठा धीरे-धीरे खुला. वह 2012 से इस गोरखधंधे में लगा था. उसके सारे शिकार लड़के थे, जिनमें से ज्यादातर की उम्र 4 से 16 साल के बीच थी. नौ 12 साल से कम के थे, एक 22 साल का, पर दशक भर से उसकी छाया में बड़ा हुआ था. रामभवन की भूख असामान्य थी, इसलिए पीड़ितों से नजदीकी और उनकी सुलभता अहम थी. एक जानकारी से सीबीआइ को सबसे ज्यादा झटका लगा—उसकी पत्नी दुर्गावती अपराध में शामिल और सहयोगी थी. वे नि:संतान दंपति थे. उनकी बांझ जिंदगी के प्रति दुख से भरे करीबी रिश्तेदार अपने बच्चों को उनके साथ दिन गुजारने के लिए बेहिचक छोड़ जाते. घरेलू सहायक के बच्चे भी आसान शिकार थे, क्योंकि उन्हें वित्तीय निर्भरता के चिमटे से पकड़कर रखा जा सकता था. गरीब रिश्तेदारों के बच्चों की तरह ही, जिनके लिए रामभवन दयालु परोपकारी की तरह था. पिताहीन बच्चे खास तौर पर उपयोगी थे, और उनकी स्कूल फीस सरीखी जरूरतें उसने पूरी कीं.
सीबीआइ ने बांदा, चित्रकूट और नजदीकी इलाकों में ऐसे 25 पीड़ितों का पता लगाया जिनसे रामभवन के आखेट का लंबा-चौड़ा मैदान बना था. उसके कुबूलनामे से उसकी कारीगरी के और भी औजारों का खुलासा हुआ. उसने अपनी प्रयोगशाला को बड़े जतन से संजोया था. इसमें प्ले स्टेशन सरीखे वीडियो गेम कंसोल थे, जिनकी खातिर लड़के खिंचे चले आते. बहुत-से मोबाइल फोन भी काफी काम आए; बड़ी उम्र के लड़कों को वे तोहफों में दिए गए. लोभ-लालच की यह कतार शिकारी के शिकंजे पर जाकर खत्म हुई—स्पाइकैम, वेबकैम, सोनी साइबरशॉट यानी हर वह चीज जो चाहिए.
सीबीआइ की चार्जशीट कहती है, ''उसने ऑनलाइन सेक्स खिलौने भी खरीदे, जिनका इस्तेमाल अपने यौन सुख के अलावा बच्चों पर भी किया.'' इस सबको फिल्माया गया...पेन ड्राइव के उस गुप्त भंडार को याद कीजिए. पूछताछ के दौरान रामभवन ने यह भी कुबूल किया कि वह अपनी मेहनत के फल ''जीमेल और मेगा.एनजेड, बॉक्स.कॉम सरीखी क्लाउड-आधारित डेटा स्टोरेज सेवाओं'' पर भी साझा करता था.
सबसे बढ़कर यह कि ये एकाकी हिंसक और लालची भेड़िये भेड़ के बाने में शिकार करते थे. युवा विद्वतापूर्ण शख्सियत होने के नाते विक्टर मुहल्ले में प्रिय और भरोसेमंद था. बच्चों के उसके घर जाने को लेकर किसी माता-पिता ने दोबारा नहीं सोचा. थोड़े-से पैसे, चॉकलेट और टॉफी उनके छोटे-छोटे राजमार्गों को नरक में ले गए. उसके ज्ञात शिकारों की संख्या—पास-पड़ोस के पांच बच्चे. सबसे छोटा पांच बरस का था, तो सबसे बड़ा 18 से भी कम. अन्य तीन 16, नौ और आठ साल के थे—यह आखिरी उसके करीबी परिवार की लड़की थी, जो छह साल की उम्र से उसका शिकार थी. वह उनमें से हरेक पर अपने दोस्तों को लेकर आने के लिए दबाव डालता, उन्हें एक दूसरे के साथ यौन गतिविधियां करने को मजबूर करता, और बारी-बारी से उनके साथ जबरदस्ती करता, इस तरह कि दूसरा सारे समय देखता रहता और एक हाथ में उसका फौन कैमरा घूमता रहता. तत्काल संतुष्टि हासिल करने के अलावा उसने फोटो और वीडियो का अंबार जमा कर लिया जो वह फुरसत में दोबारा देख सकता था, या बच्चों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता था और साथ ही इंटरनेट से जुड़ी दुनिया के पाताललोकों में बिकने वाली चीज में भी बदल सकता था. मगर गूगल के नोटिफिकेशन की बदौलत सीबीआइ उस तक पहुंच गई.
डिजिटल फॉरेंसिक
पहचान और खोजबीन का यह खेल तब ज्यादा बड़े दायरे में प्रवेश करता है जब डिजिटल सामग्री ही सुराग मुहैया कराती है. उत्तर प्रदेश के मुफस्सिल इलाकों के लाखों लोगों के बीच रामभवन के अनजान पीड़ितों का पता लगाना भूसे के ढेर में सुई खोजने की तरह था. इसके लिए पुराने ढर्रे का बहुत सारा ऊबाऊ काम करने की जरूरत थी. मुश्किल और बेसुराग मामलों में जांचकर्ता पहले वीडियो से निकली भाषा या बोली हिज्जे-हिज्जे समझने की कोशिश करते हैं. फिर कई-कई घंटे और दिन वीडियो में दिखी चीजों की बारीकी से जांच करते हैं. इस सबका व्यापक साइबर फॉरेंसिक विश्लेषण किया जाता है. मसलन, हाल में सीबीआइ को इंटरपोल के जरिए कुछ तस्वीरें मिलीं जिनमें यौन बदसुलूकी का शिकार होती एक लड़की दिख रही थी. उन्नत साइबर फॉरेंसिक टूल्स से विश्लेषण करने पर अपराध की तारीख व समय के साथ जगह की सटीक जीपीएस लोकेशन का पता चला.
यह चमत्कार से कम नहीं है. आम बोलचाल के शब्दों में कहें तो सीबीआइ घटनास्थल के 10 मीटर के दायरे के भीतर पहुंच रही थी. इमेज के डेटा के आधार पर सीबीआइ ने पीड़ित की पहचान की और बाद में अपराधी रवि कुमार पटेल को धर दबोचा. वह कई भारतीय और विदेशी सदस्यों वाले व्हाट्सऐप ग्रुप का एडमिन था, जिसमें वह खुद के बनाए सीएसएएम साझा करता था. यह जानकारी 26 देशों को भेजी गई. समानांतर तकनीक डिजिटल स्लिपस्ट्रीम है, जिसमें मेटाडेटा और ओएसआइएनटी (ओपन सोर्स इंटेलिजेंस) के औजारों के जरिए वीडियो के रहस्यों को बलपूर्वक खोला जाता है. इसमें सीबीआइ को सबसे बड़ी कामयाबी उस तलाश में मिली जिसे ऑपरेशन मेघ चक्र नाम दिया गया और जिसके लिए दुनिया भर में उसकी पीठ थपथपाई गई (देखें: अपराधियों तक कैसी पहुंची सीबीआइ).
अगर अपराध डिजिटल से कई गुना बढ़कर ताकतवर हो गया है, तो उसका पता लगाने का काम भी तुर्शी-ब-तुर्शी उसके पीछे-पीछे चल रहा है. यह नई दुनिया तमाम डिजिटल राहों की सतत जासूसी और निगरानी की मांग करती है. संदिग्ध लोग क्रिप्टोकरेंसी या पेपाल सरीखे मोबाइल वॉलेट, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, आइएमओ और वाइबर सरीखी मेसेजिंग सेवाओं, एसप्लेयर और एमएक्सप्लेयर सरीखे लाइव स्ट्रीमिंग एप्लिकेशन, और पीडिस्क, एक्सडिस्क, एमडिस्क और मेगा.एनजेड सरीखी क्लाउड सेवाओं के जरिए लेनदेन करते हैं. डार्क वेब की तो बात ही छोड़ दें. मगर इस सारी भटकाने वाली टेक्नोलॉजी के बीच मानवीय कारक टिका रहता है—शायद जिंदगी की खातिर भयभीत लाचार बच्चा, और वह जो शिकार करता है. रामभवन का मनोवैज्ञानिक परीक्षण करने वाले डॉ. सुधीर गुप्ता ने कहा, ''उसके जैसे सामाजिक रूप से भटके हुए लोग कभी नहीं मानते कि वे जो कर रहे थे, वह अपराध है. रामभवन ने जरा भी सहयोग नहीं किया. उसके सरीखे लोगों का कभी इलाज नहीं किया जा सकता और सबसे अच्छा यही है कि उन्हें हमेशा सीखचों के पीछे रखा जाए.''
मगर इन अपराधियों को सजा दिलाने के लिए सीबीआइ को कई प्रक्रियागत बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. ऑनलाइन सीएसएएम के मामले इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आइटी) कानून की धारा 67बी और पॉक्सो कानून की धारा 14/15 के अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 293 के तहत दर्ज किए जाते हैं (देखें: जुर्म और सजा). मगर केवल 10 राज्यों ने सीबीआइ को आइटी कानून के तहत मामलों की जांच करने की सामान्य अनुमति दी है. पॉक्सो कानून के तहत मामलों की जांच की अनुमति तो किसी भी राज्य ने नहीं दी है. इसका मतलब यह है कि सामान्य अनुमति के न होने से केंद्रीय एजेंसी को एफआइआर दर्ज करने के लिए हर अलग-अलग मामले में राज्यों की मंजूरी लेनी होती है, जिसमें वक्त लगता है और जांच में देरी होती है. जब मुकदमा चलाने की बात आती है, तो सीएसएएम की सत्यता साबित करना अहम चुनौती होता है.
भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत किसी भी द्वितीयक इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण के साथ '65बी प्रमाणपत्र'—यह नाम उस धारा के नाम पर रखा गया है जिसमें इसका जिक्र है—साथ में होना चाहिए. मगर विदेश स्थित इंटरनेट सेवा प्रदाताओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से यह प्रमाणपत्र हासिल करना टेढ़ी खीर है, सामग्री की प्रामाणिकता की तस्दीक के लिए उनके प्रतिनिधियों की निजी तौर पर अदालत में मौजूदगी पक्का करने की तो बात ही छोड़ दें. इन मुश्किलों के बावजूद सीबीआइ अब पर्याप्त साधन और सबूत तैयार कर रही है ताकि बच्चों का यौन शोषण करने वाले गुप्ता, विक्टर और रामभवन सरीखे दरिंदे पकड़े जाएं और उन्हें उनके जघन्य अपराधों की सजा दिलाई जा सके.
52
बाल यौनशोषण सामग्री से जुड़े मामलों की जांच की गई
60
पीड़ितों की पहचान की गई
133
अपराधियों की धर-पकड़ हुई
14
सीधे अपराध में शामिल लोग पकड़े गए
इन मामलों की जांच 2019 में गठित सीबीआइ की विशेष शाखा ने की है
अपराध और सजा
इंटरनेट के अंधेरे कोनों में ऑनलाइन चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज की दुनिया और इसको चलाने वाले अपराधियों की धरपकड़ के लिए बने कानून
ऑनलाइन चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज क्या है?
चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज मटीरियल (सीएसएएम) को इंटरनेट पर शेयर करना
किसी बच्चे को ऑनलाइन सेक्शुअल ऐक्ट की बातचीत में शामिल करना
किसी बच्चे को ऑनलाइन अपने शरीर के हिस्सों को दिखाने या सेक्शुअल ऐक्ट के लिए कहना
अपराधियों पर कौन से कानूनों के तहत कार्रवाई होती है?
यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉक्सो) अधिनियम 2012
सेक्शन 14: पोर्नोग्राफी में बच्चों का इस्तेमाल; कम से कम 5 साल की जेल; पहले से ऐसे अपराधों के आरोपियों को कम से कम 7 साल की सजा
सेक्शन 15: बच्चों से जुड़ी पोर्नोग्राफिक मटीरियल का स्टोरेज; 3-5 साल की जेल; बार-बार ऐसे अपराध करने वालों को 5-7 साल की जेल
सूचना प्रोद्यौगिकी अधिनियम 2000
सेक्शन 67बी: बच्चों को सेक्शुअल ऐक्ट करते हुए दिखाने वाली या उन्हें ऑनलाइन सेक्स संबंध बनाने से जुड़ी सामग्री को पब्लिश/शेयर करना; 5 साल तक की जेल; बार-बार ऐसे अपराध करने वालों को 7 साल की जेल
जुर्म का फैलाव*
536
मामले
540
पीड़ित
जुर्म का फैलाव*
969
मामले
भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) 1860
सेक्शन 293: किसी भी 20 साल से कम उम्र के व्यक्ति को अश्लील सामग्री दिखाना या बिक्री करना; तीन साल तक की जेल; बार-बार ऐसे अपराध करने वालों को सात साल की जेल
* एनसीआरबी की 'क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट'; यह आंकड़ा 2021 में सबंधित सेक्शन के तहत दर्ज एफआइआर की संख्या पर आधरित है
अपराधियों तक कैसे पहुंची सीबीआइ
बाल यौन दुर्व्यवहार सामग्री (सीएसएएम) के खिलाफ सीबीआइ ने सितंबर 2022 में मेघ चक्र नाम से अपना सबसे सफल अभियान चलाया था. इस दौरान कैसे 66 अपराधियों को पकड़ा गया
न्यूजीलैंड की डिजिटल चाइल्ड एक्सप्लॉयटेशन टीम मेगा.एनजेड से संबंधित एक क्लाउड स्टोरेज लिंक से जुड़ी शिकायत की जांच कर रही थी. इसमें उसे एक सब फोल्डर मिला जिसमें सीएसएएम की पांच वीडियो क्लिप मिलीं
इंटरपोल की क्राइम अगेन्स्ट चिल्ड्रन की सिंगापुर स्थित यूनिट ने यह लिंक सीबीआइ को भेजी
सीबीआइ ने 141 ईमेल आइडी की पहचान की. इनमें से 102 गूगल/याहू के आइडी थे बाकी 39 भारत स्थित प्रोटोनमेल जैसे दूसरे डोमेन पर थे, जिनसे लिंक को एक्सेस किया गया था और क्लिप डाउनलोड की गई थीं
इन ईमेल आइडी या आइपी एड्रेस से जुड़े मोबाइल नंबर के जरिए सीबीआइ ने 66 लोगों की निशानदेही की
सीबीआइ ने 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 61 लोकेशन पर छापामारी की. इन 66 लोगों में से 33 के मोबाइल या दूसरी डिवाइसों पर सीएसएएम वीडियो पाए गए
पीड़ितों की पहचान
सीबीआइ की ऑनलाइन चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज ऐंड एक्सप्लायटेशन (ओसीएसएई) प्रिवेंशन /इन्वेस्टिगेशन यूनिट कैसे काम करती है
ओसीएसएई यूनिट सीएसएएम के लिए मैसेजिंग सर्विस, लाइवस्ट्रीमिंग ऐप, क्लाउड सर्विस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नजर रखती है. इसके साथ ही क्रिप्टो और ई-वॉलेट के जरिए होने वाले संदिग्ध लेनदेन पर भी नजर रखी जाती है
इस यूनिट की इंटरपोल के इंटरनेशनल चाइल्ड सेक्शुअल एक्सप्लॉयटेशन (आइसीएसई) डेटाबेस तक एक्सेस है. इसमें दुनियाभर से जब्त किए गए 43 लाख सीएसएएम मौजूद हैं
मुश्किल और बेसुराग मामलों में जांचकर्ता पहले वीडियो से निकली भाषा या बोली हिज्जे-हिज्जे समझने की कोशिश करते हैं. फिर कई-कई घंटे और दिन वीडियो में दिखी चीजों की बारीकी से जांच करके मौका-ए-वारदात को पहचाना जाता है
उन्नत साइबर फॉरेंसिक औजारों से विश्लेषण करने पर अपराध की जगह और साथ ही तारीख व समय के सटीक जीपीएस निर्देशकों का भी पता लग जाता है
अगर इंटरनेट ने चाइल्ड पोर्न को कई गुना बढ़ा दिया है तो दूसरी तरफ इसको पकड़ना और पहचानना भी ठीक उसके पीछे-पीछे ही चल रहा है. इसके लिए जरूरी होता है कि डिजिटल दुनिया के रास्तों पर सतर्क नजर बनी रहे
(मुनीश चंद्र पांडे आज तक में डिप्टी एडिटर हैं)