खून से रंग गईं अदालतें
कुख्यात अपराधी संजीव माहेश्वरी की लखनऊ कोर्ट के भीतर सनसनीखेज हत्या ने खोली प्रदेश में न्यायालयों की सुरक्षा की पोल. कागजों पर सुरक्षा चाक-चौबंद लेकिन जमीन पर उपाय नदारद. वकीलों पर भी उठी उंगली

लखनऊ सिविल कोर्ट के सीनियर वकील आर.के. यादव 7 जून को एससी-एसटी कोर्ट में हुए हत्याकांड को याद करके सिहर उठते हैं. करीब पौने चार का वक्त था. यादव अपने साथी वकील के साथ एक मुकदमे की सुनवाई के सिलसिले में कैसरबाग के पुराने हाइकोर्ट परिसर से होते हुए सिविल कोर्ट जा रहे थे. वे बीच में पड़ने वाले एससी-एसटी कोर्ट के गेट के सामने से गुजर ही रहे थे कि इसी बीच पुलिस की कस्टडी में एक युवक को बाहर निकलते देखा. उस युवक से यादव करीब दस कदम ही दूर थे कि कोर्ट की बगल की सीढ़ियों से वकील की वेशभूषा में एक युवक अचानक आया और ताबड़तोड़ गोलियां चलाने लगा. यादव कुछ समझ पाते, तब तक पुलिस कस्टडी में युवक को गोली लगी और वह कोर्ट के भीतर भागा. हाथ में पिस्टल लिए दूसरा युवक भी गोलियां दागते हुए उसके पीछे दौड़ा. कुछ ही देर में लहूलुहान युवक कोर्ट में बने कठघरे के करीब जमीन पर मुंह के बल गिर गया. युवक के साथ पेशी में आए पुलिसकर्मी भी डर के मारे इधर-उधर भागने लगे. यह मंजर देख बदहवास हुए यादव पास के एक चैंबर में घुस गए. यादव बताते हैं, ''कुछ देर बाद मैंने देखा कि वकीलों ने फायरिंग कर रहे युवक को दबोच कर पीटना शुरू कर दिया था.'' करीब दस मिनट के इस घटनाक्रम से जब धुंधलका छंटा तो पता चला कि माफिया मुख्तार अंसारी के बेहद करीबी कुख्यात अपराधी संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा की कोर्ट रूम में सरेआम हत्या कर दी गई है.
भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा पाने वाला मुजफ्फरनगर के शाहपुर आदमपुर का निवासी जीवा पिछले 20 वर्षों से जेल में बंद था. उस पर हत्या, रंगदारी, लूट जैसे 25 मुकदमे दर्ज थे. जीवा की हत्या के प्रयास और एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मुकदमे में 7 जून को लखनऊ के कैसरबाग स्थिरत एससी-एसटी कोर्ट में पेशी पर लाया गया था. इस दौरान वहां पहले से घात लगाए जौनपुर निवासी शूटर विजय यादव ने जीवा की हत्या कर दी. कोर्ट रूम में जज की कुर्सी के ठीक सामने हुए इस हत्याकांड की गूंज कुछ ही देर में देश-विदेश तक पहुंच गई. प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार विपक्षी दलों के निशाने पर आ गई. मुख्यमंत्री योगी ने 'डैमेज कंट्रोल' की कमान खुद संभाली. छुट्टी पर गए लखनऊ के पुलिस कमिशनर एस.बी. शिरोडकर फौरन वापस बुलाए गए. दो घंटे के भीतर इस हत्याकांड की जांच के लिए तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआइटी) का गठन कर उसे फौरन घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया गया. लखनऊ में कोर्ट की सुरक्षा में तैनात छह पुलिसकर्मियों को लापरवाही बरतने के आरोप में निलंबित कर दिया गया, जिसमें एक महिला सिपाही भी है.
मुख्यमंत्री ने त्वरित कार्रवाई कर अपनी सरकार पर लग रहे आरोपों को कमजोर करने की कोशिश की. लेकिन कोर्ट परिसर में जीवा की हत्या ने न्यायालयों की सुरक्षा के सरकारी दावों की पोल खोल दी है. बीते वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जिन्होंने कानून-व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा किया है (देखें बॉक्स). इलाहाबाद हाइकोर्ट में वरिष्ठ वकील राम प्रताप राय बताते हैं, ''2019 में बिजनौर सीजेएस कोर्ट में पेशी पर आए एक अभियुक्त की सनसनीखेज हत्या का इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था. कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को तलब कर अदालत की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी थी.'' इसके बाद हरकत में आई योगी आदित्यनाथ सरकार ने कोर्ट की सुरक्षा के लिए 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (एसओपी) तैयार कराकर सभी जिलों को इस पर सख्ती के साथ अमल करने के आदेश दिए थे. क्विक रेस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) तैनात हुई और अदालत परिसर को सीसीटीवी कैमरों से लैस भी किया गया (देखें बॉक्स).
लखनऊ में जीवा को जिस तरह मार दिया गया, उससे न्यायालय सुरक्षा की एसओपी की खामियां उजागर हो गईं. इस मामले में जांच कर रही पुलिस ने एक किलोमीटर की परिधि में आए 65 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली. पता चला कि इनमें 27 कैमरे काम ही नहीं कर रहे थे. कोर्ट परिसर में जहां पर हत्याकांड को अंजाम दिया गया था, वहां का कैमरा भी पुलिस को खराब मिला. इससे जीवा हत्याकांड की जांच पर असर पड़ा है. अब पुलिस घटना के 'रिक्रिएशन' की वीडियोग्राफी कराकर अपनी पड़ताल को आगे बढ़ा रही है. लखनऊ कोर्ट में हुई इस हत्या से वकील खासे गुस्से में हैं. लखनऊ सेंट्रल बार के अध्यक्ष सुनील कुमार द्विवेदी बताते हैं, ''कोर्ट के गेट पर मेटल डिटेक्टर मशीनें लगी हैं. इसके बावजूद जीवा का हत्यारा विजय यादव असलहा लेकर कोर्ट परिसर के भीतर आ गया. यह बहुत बड़ी चूक है.'' बाद में पता चला कि गेट पर लगी मेटल डिटेक्टर मशीनें खराब हैं. नाम न छापने की शर्त पर लखनऊ स्थित पुलिस मुख्यालय में तैनात एक अधिकारी कोर्ट की सुरक्षा में गड़बडी के लिए वकीलों को ही जिम्मेदार ठहराते हैं. उनका कहना है, ''कोर्ट परिसर में जांच के लिए वकील तैयार नहीं होते. पिछले दिनों कानपुर समेत कई जिलों में वकील और पुलिस के बीच टकराव की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. इन घटनाओं में पुलिस को ही पीछे हटना पड़ा.''
जीवा के हत्यारे विजय ने वकीलों की इसी 'धमक' का फायदा उठाया. वह वकील की ड्रेस पहनकर असलहा समेत कोर्ट परिसर में बगैर किसी जांच के पहुंच गया. इलाहाबाद हाइकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रवींद्र सिंह बताते हैं, ''प्रदेश की करीब सभी जिला अदालतों की बाउंड्री टूटी पड़ी है. परिसर में आने-जाने के लिए कोई निर्धारित गेट नहीं है. अपराधी इसी कमी का फायदा उठाकर कोर्ट परिसर में हत्या को अंजाम दे रहे हैं.'' यही नहीं, इसी कमी का फायदा उठाकर अपराधी कोर्ट में सरेंडर कर रहे हैं और पुलिस तमाशबीन बनी रहती है. लखनऊ में जीवा हत्याकांड के बाद प्रदेश की सभी अदालतें हाइ अलर्ट पर थीं तभी गाजियाबाद में एक इनामी बदमाश ने पुलिस की नजरों से बचते हुए कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. मुरादनगर, गाजियाबाद के मोबाइल शोरूम मालिक मुकेश गोयल की हत्या में वांछित अंकित शर्मा पर 50,000 रुपए का इनाम था. 8 जून को गाजियाबाद का सीजेएम न्यायालय परिसर पुलिस की छावनी बना हुआ था. भारी सुरक्षा और जांच के बावजूद अंकित ने वकील की ड्रेस में सीजेएम कोर्ट के भीतर पहुंचकर सरेंडर कर दिया. गाजियाबाद में तैनात रहे सेवानिवृत्त आइपीएस अफसर नागेंद्रनाथ श्रीवास्तव बताते हैं, ''जब अपराधी पुलिस की पकड़ में न आकर कोर्ट में पहुंचकर सरेंडर कर सकते हैं तो उसी तरह से कोर्ट के भीतर हत्याकांड को भी अंजाम दिया जा रहा है.''
जीवा हत्याकांड ने पेशी पर आने वाले कैदियों की सुरक्षा की खामी को एक बार फिर उजागर किया है. करीब डेढ़ महीने पहले माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की पुलिस अभिरक्षा में हुई हत्या ने योगी सरकार की खासी किरकिरी कराई थी. कोर्ट परिसर में जेल से लाकर पेश किए जाने वाले आरोपियों की संख्या बढ़ाने और कई अभियुक्तों के पुलिस कस्टडी से भाग जाने की घटना के बाद 2020 में प्रदेश सरकार ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई की व्यवस्था की थी. अभियुक्तों की पेशी कराने के लिए लखनऊ में पुराने जिला जज कोर्ट की बगल में एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूम बनाया गया है, जिसे सुनवाई के समय जेल में बने कोर्ट से इंटरनेट के जरिए जोड़ दिया जाता है.
कोर्ट रूम में जीवा की हत्या के बाद यह चर्चा आम है कि अगर उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया जाता तो उसकी हत्या को टाला जा सकता था. लेकिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी की अपनी सीमाएं हैं. लखनऊ हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील शिव शक्ति वर्मा बताते हैं, ''जेल में बंद उन आरोपियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई कराई जाती है जिनके खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट नहीं दाखिल की गई होती है. चार्जशीट दाखिल किए बिना गवाही नहीं हो सकती. दूसरी ओर, चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपियों की पेशी व्यक्तिगत रूप से आवश्यक होती है.'' पेशी पर आने वाले कैदियों की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण पर भी उंगलियां उठ रही हैं. जीवा पर फायरिंग शुरू होते ही उसके साथ कोर्ट आए सभी 10 पुलिसकर्मी भाग खड़े हुए. किसी ने भी हत्यारे का कोई प्रतिरोध नहीं किया. वर्मा बताते हैं, ''दुर्दांत अपराधियों के साथ पेशी में आने वाले पुलिसकर्मियों को कैदी को छुड़ाने और गोलीबारी जैसी घटनाओं से निबटने का पर्याप्त प्रशिक्षण देने का प्रावधान है. अतीक-अशरफ हत्याकांड और जीवा हत्यकांड के वक्त पुलिस जिस तरह बेबस दिखी, उससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं.''
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा सरकार की इमेज को लेकर कोई जोखिम नहीं मोल लेना चाहते. इसीलिए मुख्यमंत्री ने कोर्ट की सुरक्षा के लिए बनी एसओपी का कड़ाई के साथ पालन करने का आदेश दिया है. यह आदेश कितना कारगर साबित होगा, यह वक्त ही बताएगा.
''भाजपा सरकार ने अपराधियों को खुली छूट दे रखी है. पुलिस हिरासत, कोर्ट में हत्याएं हो रही हैं. सवाल यह नहीं कि कौन मारा गया बल्कि अहम सवाल यह है कि कहां मारा गया''
—अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
नहीं थम रहा कोर्ट में हत्याओं का सिलसिला
शाहजहांपुर जिला न्यायालय:
19 अक्तूबर, 2021 की सुबह शाहजहांपुर जिला अदालत की दूसरी मंजिल पर अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के दफ्तर में वकील भूपेंद्र प्रताप सिंह की सिर में गोली मार कर हत्या कर दी गई. इस वारदात के बाद दारोगा समेत चार पुलिसकर्मी निलंबित किए गए
बिजनौर सीजेएम कोर्ट: बिजनौर में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की अदालत में 17 दिसंबर, 2019 को तिहाड़ जेल से पेशी पर लाए गए दो अभियुक्तों पर फायरिंग की गई. एक अभियुक्त शाहनवाज की मौत हो गई. अदालत परिसर में मौजूद पुलिस चौकी के सभी 18 पुलिसकर्मी निलंबित
आगरा सिविल कोर्ट: आगरा सिविल कोर्ट परिसर में 12 जून, 2019 को अधिवक्ता अरविंद मिश्र के चैंबर में यूपी बार काउंसिल की अध्यक्ष दरवेश सिंह यादव की साथी अधिवक्ता ने गोली मार कर हत्या कर दी. कोर्ट की सुरक्षा में तैनात तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया
बस्ती जिला न्यायालय: बस्ती जिला न्यायालय परिसर में 28 फरवरी, 2019 को वकील जगनारायण यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. दो अभियुक्तों को मौके से गिरफ्तार करने के बाद कोर्ट की सुरक्षा में तैनात चार पुलिसकर्मियों को लापरवाही बरतने पर निलंबित किया गया
इलाहाबाद जिला न्यायालय: इलाहाबाद जिला न्यायालय परिसर में 11 मार्च, 2015 को बर्खास्त दारोगा शैलेंद्र सिंह ने वकील नबी अहमद को गोली मार दी. अहमद की मौके पर ही मौत हो गई. हाइकोर्ट के आदेश से जून 2015 के बाद इस हत्या का मुकदमा रायबरेली न्यायालय में स्थानांतरित हुआ
मुरादाबाद एसीजेएम कोर्ट: जेल से पेशी पर आए पूर्व ब्लॉक प्रमुख योगेंद्र सिंह उर्फ भूरा की 23 फरवरी, 2015 को मुरादाबाद अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने हमलावरों ने अंधाधुंध फायरिंग करके हत्या कर दी. इस प्रकरण में चार लोगों पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया था
...लेकिन कागज पर चाक-चौबंद सुरक्षा
सुरक्षा समिति प्रत्येक जिला न्यायालय की सुरक्षा के लिए जिला जज या कम से कम अतिरिक्त जिला जज की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है. इसमें जिलाधिकारी या उनकी ओर से नामित अधिकारी, पुलिस अधीक्षक या उनकी ओर से नामित अधिकारी को शामिल किया गया है
सुरक्षा अमला 10 नवंबर, 1994 को सरकारी आदेश के जरिए कोर्ट की सुरक्षा में लगे 'मैनपावर' का निर्धारण किया गया है. इसमें एक सशस्त्र सुरक्षा गार्ड, एक दारोगा, डेढ़ सेक्शन पीएसी, एक क्विक रेस्पॉन्स टीम की तैनाती जरूरी है. इंस्पेक्टर रैंक के अफसर को सुरक्षा का प्रभारी बनाया गया है
बायोमीट्रिक कार्ड जिला जज या उनकी ओर से नामित अफसर कोर्ट में आने वाले सभी वकीलों और कर्मचारियों के लिए बायोमीट्रिक पहचान पत्र जारी करेगा. इसी तरह कोर्ट परिसर में आने वाली सभी गाड़ियों के लिए विशेष पास जारी करने का प्रावधान है
सीसीटीवी सिस्टम न्यायालय परिसर में सीसीटीवी कैमरों को इस तरह स्थापित किया जाएगा कि कोई भी 'ब्लाइंड स्पॉट' न रहे. ये कैमरे परिसर में एक कंट्रोल रूम से जुड़े रहेंगे. कंट्रोल रूम के जरिए न्यायालय परिसर की सभी गतिविधियों पर नजर रखे जाने का प्रावधान भी है
पेशी व्यवस्था न्यायिक हिरासत में पेशी पर आने वाले अभियुक्त, वकील और पैरोकार के लिए कोर्ट के भीतर एक खास 'प्लान ऑफ मूवमेंट' होगा. कोर्ट में पेशी पर आने वाले अभियुक्त के परिसर में प्रवेश और निकासी के लिए विशेष गेट का इंतजाम होगा
प्रशिक्षण सत्र न्यायालय सुरक्षा में लगी पुलिस और पीएसी बलों के लिए नियमित प्रशिक्षण सत्र का आयोजन होगा. सुरक्षा के तंत्र की दक्षता का मूल्यांकन करने के लिए नियमित तौर पर मॉकड्रिल आयोजित की जाएगी. इसकी रिपोर्ट जिला जज के साथ शासन को भी भेजी जाएगी
''सरकार ने कोर्ट में हुई घटना का बेहद गंभीरता से संज्ञान लिया है. ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रदेश सरकार और ताकत लगाएगी. जो भी हत्या करेगा वह बचेगा नहीं''
—केशव प्रसाद मौर्य, उप-मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश