ऐसी सुस्त जांच कब पहुंचेगी ठिकाने?

लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट घोटाले में साढ़े पांच साल बाद भी सीबीआइ जांच सुस्त. दो पूर्व मुख्य सचिवों से पूछताछ की कवायद के बाद ठहरी जांच के आगे बढ़ने की उम्मीद. रिवर फ्रंट के अधूरे पड़े काम पैदा कर रहे मुश्किलें.

जस का तस:  रिवर फ्रंट का अधूरा पड़ा रबर डैम; (नीचे) बंद पड़ा परियोजना का दफ्तर
जस का तस:  रिवर फ्रंट का अधूरा पड़ा रबर डैम; (नीचे) बंद पड़ा परियोजना का दफ्तर

लखनऊ के हजरतगंज इलाके में सिकंदरनगर फेज टू नई बस्ती के रहने वाले संतोष सोनकर की पत्नी पार्वती अपने नौ वर्षीय बेटे राज को याद करके रोने लगती हैं. बारबार अपने को कोसती हैं कि वे बच्चों को लेकर गोमती रिवर फ्रंट क्यों गई थीं? 4 अप्रैल की दोपहर दो बजे पार्वती बेटे राज, युगराज और बेटी राशि को लेकर कपड़े धोने गोमती रिवर फ्रंट गई थीं. पार्वती कपड़े धोने में लग गईं और बच्चे बगल में ही खेलने लगे.

खेलते-खेलते राज नदी के एकदम किनारे आ पहुंचा. वहीं अचानक उसका पैर फिसला और वह टूटी पड़ी रेलिंग को पकड़ने की कोशिश करते हुए नदी में गिर गया. पार्वती बचाने दौड़ीं लेकिन उनके सामने राज नदी की गहराई में समा गया. बदहवास पार्वती ने आसपास के लोगों को आवाज लगाई. पुलिस को सूचना मिली लेकिन राज का कोई अता-पता न लगा. स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एसडीआरएफ) भी नाकाम रही. करीब 22 घंटे बाद दो गोताखोरों ने राज का शव नदी से निकाला. पार्वती कहती हैं, ''अगर रिवर फ्रंट की रेलिंग टूटी न होती तो मेरा बेटा जिंदा होता.’’

गोमती रिवर फ्रंट की बदहाली ने पार्वती को कभी न भूलने वाला गम दे दिया. इसी तरह पिछले वर्ष 20 दिसंबर की रात गोमती रिवर फ्रंट पर खुले पड़े नाले के पानी से होकर गुजरते वक्त एक कार अनियंत्रित हो गई थी. यहां रेलिंग न होने की वजह से कार नदी में समा गई. इस घटना में एक युवक और एक महिला की मौत हो गई थी. साफ है कि बदहाल और अधूरा पड़ा गोमती रिवर फ्रंट इस तरह से जानलेवा हादसों का सबब बनता जा रहा है.

समाजवार्दी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा यह रिवर फ्रंट भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर कर भाजपा सरकार की उपेक्षा का शिकार हो गया है. प्रोजेक्ट की सीबीआइ जांच शुरू हुए साढ़े पांच साल का समय हो गया है लेकिन यह अभी तक अपने अंजाम तक बढ़ता नहीं दिखाई दे रहा.

रिवर फ्रंट से जुड़ी सीबीआइ जांच ने उस वक्त एकाएक सुर्खियां बटोरीं जब पहली मई को यूपी के दो पूर्व मुख्य सचिवों आलोक रंजन और दीपक सिंघल से पूछताछ करने की अनुमति से जुड़ी सीबीआइ की चिट्ठी को यूपी के गृह विभाग ने नियुक्ति विभाग को भेजा. इससे पहले सीबीआइ ने जून 2022 में इन दोनों अफसरों से पूछताछ की इजाजत मांगी थी. सपा सराकार के दौरान लखनऊ में गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण के दौरान आलोक रंजन मुख्य सचिव थे और दीपक सिंघल सिंचाई महकमे के प्रमुख सचिव के पद पर तैनात थे.

इन दोनों पर रिवर फ्रंट की गड़बड़ियों की अनदेखी का आरोप है. उत्तर प्रदेश योजना आयोग के पूर्व सदस्य और लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सुधीर पंवार कहते हैं, ''दूसरी कई विकास योजनाओं की तरह लखनऊ का गोमती रिवर फ्रंट भी राजनीति का शिकार हुआ है. अगर रिवर फ्रंट में कोई भ्रष्टाचार हुआ है तो जांच एजेंसियों के लिए जांच पूरी करने की समयसीमा तय की जानी चाहिए. जांच में देरी से यह संकेत मिलता है कि सरकार इस प्रोजेक्ट को केवल मुद्दा बनाए रखने के लिए लटकाना चाहती है.’’

रंजन और सिंघल से सीबीआइ की पूछताछ से जुड़ी चिट्ठी के यूपी के नियुक्ति महकमे में पहुंचने पर वहां मंथन शुरू हो गया है. जानकारी के मुताबिक सरकार जल्दबाजी में कोई ऐसा निर्णय नहीं लेना चाहती जिससे बाद में उसकी किरकिरी हो. इसलिए नौकरशाही के शीर्ष पद पर रहे दोनों पूर्व अफसरों के बारे में किसी भी प्रकार के फैसले पर सरकार इसके तकनीकी पहलुओं को लेकर हर तरफ से आश्वस्त होना चाहती है.

ये दोनों आइएएस अफसर उस टास्क फोर्स का अहम हिस्सा थे जो रिवर फ्रंट के कार्यों की निगरानी के लिए 2015 में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित की गई थी. रंजन सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बेहद करीबी अधिकारी थे. रिटायरमेंट के बाद भी अखिलेश से उनकी नजदीकियां बनी रहीं. 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान सपा का घोषणा पत्र तैयार करने में भी उनकी बड़ी भूमिका थी.

इसी तरह सिंघल सपा सरकार में सिंचाई मंत्री रहे शिवपाल यादव के बेहद नजदीकी अधिकारी थे. रंजन और सिंघल से पूछताछ के जरिए सीबीआइ इस घोटाले में अखिलेश और शिवपाल की भूमिका की भी पड़ताल करेगी. लखनऊ के विद्यांत कालेज में अर्थशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मनीष हिंदवी बताते हैं, ''अखिलेश और शिवपाल के इन करीबी अफसरों से सीबीआइ पूछताछ की दिशा में शुरू हुई कवायद की टाइमिंग इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक ढंग से सोचने को विवश कर देती है. लोग इसे अखिलेश और शिवपाल के बीच बढ़ी नजदीकियों की प्रतिक्रिया के रूप में भी देख रहे हैं.’’

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद जब शिवपाल और अखिलेश के रिश्ते सामान्य हुए तो उसी दौरान भाजपा सरकार ने शिवपाल की सुरक्षा घटाकर जेड से वाइ श्रेणी की कर दी थी. हालांकि सीबीआइ रिवर फ्रंट में गड़बड़ी के आरोप में शिवपाल के करीबी अधिकारियों में शुमार रहे सिंचाई विभाग के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता रूप सिंह यादव को गिरफ्तार कर चुकी है.

सीबीआइ जांच में जकड़ा रिवर फ्रंट जनता के पैसे की बदहाली की तस्वीर पेश कर रहा है. सिंचाई विभाग के तत्कालीन इंजीनियरों ने प्रोजेक्ट पर 1,437 करोड़ रुपए खर्च किए, बावजूद इसके फ्रंट से जुड़ा एक भी काम पूरा नहीं हुआ था. गोमती में नालों का पानी रोकने का काम पहले चरण में किया जाना था. इसके लिए इंजीनियरों ने 270 करोड़ रुपए पहले ही खर्च कर दिए. बावजूद इसके न तो पाइप लाइन डल पाई और न ही नालों को जोड़ा जा सका.

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने गोमती रिवर फ्रंट में म्यूजिकल फाउंटेन लगाने की आड़ में वित्तीय अनियमितता पकड़ी है. यूपी विधानसभा के बजट सत्र के दौरान 28 फरवरी को सदन में रखी गई सीएजी रिपोर्ट के अनुसार गोमती नदी के तट पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का म्यूजिकल फाउंटेन स्थापित करने का निर्णय अप्रैल 2016 में लिया गया था. व्यय वित्त समिति ने इसके लिए 45 करोड़ रुपए की राशि इस आधार पर स्वीकृत की कि ऐसे फाउंटेन भारत में निर्मित नहीं होते हैं तो इसे किसी विदेशी कंपनी से खरीदना होगा. वैश्विक कोटेशन अखबारों में प्रकाशित कराया गया लेकिन उसकी प्रक्रिया नहीं पूरी की गई.

जगह-जगह पर टूटी पड़ी रेलिंग, जलकुंभी और कूड़े से पटी जेट्टी (नाव पर चढ़ने  के लिए तैरता हुआ प्लेटफार्म), बंद पड़ा म्यूजिकल फाउंटेन, अधूरा पड़ा एसटीपी, प्लेटफार्म से होकर बहता नाले का पानी जैसी कई समस्याएं रिवर फ्रंट की बदहाली को बयान कर रही हैं. शौचालय, जनसुविधा परिसर, वाटर कूलर तक बिना उपयोग के कंडम हो चुके हैं. गोमती रिवर फ्रंट के तहत नदी के डाउनस्ट्रीम में ला मार्टिनियर कॉलेज के पास रबर डैम का निर्माण भ्रष्टाचार में उलझ कर रह गया है. केवल इसी डैम पर 49.61 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए जबकि डैम का 60 फीसदी काम अधूरा था.

लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) और सिंचाई विभाग गोमती रिवर फ्रंट के अधूरे काम को पूरा कराने के लिए सीबीआइ की विशेष अनुमति लेने की तैयारी कर रहे हैं. इसके लिए सिंचाई विभाग और एलडीए की एक टीम रिवर फ्रंट का संयुक्त सर्वे पूरा कर चुकी है. एलडीए के सचिव पवन गंगवार बताते हैं, ''गोमती रिवर फ्रंट में सुंदरीकरण से जुड़े कार्य प्राथमिकता पर पूरे कराए जाएंगे.’’ फिलहाल तो गोमती अपने 'भगीरथ’ का इंतजार कर रही है.

नदी संवारने को धोते रहे हाथ

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 7 अप्रैल 2015 को गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया. लंदन की टेम्स नदी की तरह गोमती के दोनों तरफ किनारों का सौंदर्यीकरण किया गया था. नदी में गिरने वाले नालों को टैप करते हुए एसटीपी का निर्माण और दूसरी सुविधाओं को ''ईको फ्रेंडली ग्रीन थीम’’ के आधार पर विकसित किया गया था

सपा सरकार के दौरान 2014-15 में गोमती चैनेलाइजेशन प्रोजेक्ट के लिए 656 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की गई जो बढ़कर 1,513 करोड़ हो गई थी. इसमें 1,437 करोड़ रुपए जारी भी कर दिए गए थे. मार्च, 2017 तक इस राशि का 95 फीसदी हिस्सा खर्च होने के बावजूद 60 फीसदी काम ही पूरा हो सका था

2017 में सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रोजेक्ट पर खर्च रकम की जांच कराने के लिए न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में समिति गठित की. समिति ने भी गड़बड़ी की तरफ इशारा करते हुए अपनी रिपोर्ट 16 मई, 2017 को राज्य सरकार को सौंपते हुए दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी

लखनऊ के गोमती नगर थाने में 30 नवंबर, 2017 को सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता अनुज द्विवेदी ने तत्कालीन मुख्य अभियंता गोलेश चंद्र, एस.एन. शर्मा, काजिम अली और अधीक्षण अभियंता शिव मंगल यादव, अखिल रमन, कामेश्वर सिंह, रूप सिंह यादव और अधिशासी अभियंता सुरेश यादव के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई

सीबीआइ ने 30 नवंबर, 2017 को केस दर्ज कर इसकी जांच शुरू की. सीबीआइ की ऐंटी करप्शन ब्रांच ने सिंचाई विभाग के आठ अभियंताओं समेत अन्य अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया. 20 नवंबर, 2020 को एजेंसी ने सिंचाई विभाग के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता रूप सिंह यादव और वरिष्ठ सहायक राजकुमार यादव को गिरफ्तार किया

सीबीआइ के केस को आधार मानकर ईडी ने भी इस मामले में फरवरी 2018 को केस दर्ज किया. जांच में सामने आया था कि बिना विज्ञापन छपवाए ट्रंक ड्रेन, रबर डैम, डायाफ्राम वॉल और कुछ दूसरे काम फर्जी दस्तावेजों के जरिए चहेते ठेकेदारों और दागी कंपनियों को आवंटित किए गए थे.

बाहर निकला सीबीआइ जांच का जिन्न

बहुचर्चित ताज कॉरिडोर घोटाले के सामने आने के 20 साल बाद सीबीआइ को मिली अभियोजन स्वीकृति. बढ़ सकती हैं बसपा सुप्रीमो मायावती की मुश्किलें.

आगरा के बहुचर्चित ताज कॉरिडोर घोटाले में जांच एजेंसी सीबीआइ को पहली बार अभियोजन स्वीकृति मिली है. पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की निर्माण एजेंसी ''नेशनल प्रोजेक्ट्सि कॉन्स्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन’’ (एनपीसीसी) के सेवानिवृत्त हो चुके तत्कालीन एजीएम महेंद्र शर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सीबीआइ कोर्ट ने 23 अप्रैल को अभियोजन स्वीकृति प्रदान कर दी है.

सीबीआइ में इस मामले के पैरवी अफसर अमित कुमार ने 28 नवंबर, 2022 को एनपीसीसी को चिट्ठी भेजकर महेंद्र के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मांगी थी जिसे 2 मार्च 2023 को मंजूर कर लिया गया. कुमार ने कोर्ट में दी गई अर्जी में शर्मा के खिलाफ मिली अभियोजन स्वीकृति की जानकारी देते हुए आगे सुनवाइ की मांग की थी.

अब 22 मई को विशेष जज (ऐंटी करप्शन) सीबीआइ पश्चिम के कोर्ट में सुनवाई होगी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ताज कॉरिडोर मामले के विवेचक और पैरवी अफसर को भी कोर्ट में हाजिर रहने का आदेश दिया है. इस दौरान जांच एजेंसी को कोर्ट को यह भी बताना होगा कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर लंबित ''विशेष अनुमति याचिका’’ का क्या स्टेटस है?

ताज कॉरिडोर मामले में याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अजय अग्रवाल बताते हैं, ''यह भ्रष्टाचार का बड़ा मामला था जिसमें सरकार के शीर्ष लोग शामिल थे. देर से सही, कम से कम अभियोजन की शुरुआत तो हुई. इससे गड़बड़ी करने वालों पर कानून का शिकंजा कसेगा.’’

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की सरकार के दौरान 2002 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के निर्माण का जिम्मा एनपीसीसी को सौंपा गया था. मामले में गड़बड़ी सामने आने के बाद सीबीआइ ने 5 अक्तूबर, 2002 को मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी.

सीबीआइ की चार्जशीट में कहा गया है कि ताज कॉरिडोर को बनाने के लिए एनपीसीसी को ठेके का आवंटन किए बिना ही 17 करोड़ और उसके बाद 20 करोड़ रुपए की धनराशि जारी कर दी गई थी. भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 2003 में एनपीसीसी को दिए गए ताज कॉरिडोर के काम की जांच में पाया कि एनपीसीसी ने ''इक्ष्वाकु प्राइवेट लिमिटेड’’ को बिना किसी टेंडर के काम सौंप दिया था.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन मायावती सरकार पर भी सवाल खड़े किए थे. उसने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बिना डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) और ''एस्टिमेट’’ के यह काम पहले एनपीसीसी को सौंपा गया और एनपीसीसी ने भी बिना किसी डीपीआर के ''इक्ष्वाकु प्राइवेट लिमिटेड’’ को काम शुरू करने को कहा.

मामले की शुरुआती जांच से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं, ''एनपीसीसी ने ताज महल और आगरा किले के प्रतिबंधित 300 मीटर दायरे में यमुना में डीजल चालित बुलडोजर, ट्रैक्टर आदि से खनन शुरू किया और फर्जी बोर्ड लगाया कि यह काम सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से चालू है. इसी अनुमति को एनपीसीसी दिखा नहीं पाया और ताज कॉरिडोर प्रोजेक्ट का अवैध निर्माण मुद्दा बन गया.’’

ताज कॉरिडोर प्रोजेक्ट में आरोपियों के खिलाफ कड़ी घेराबंदी करने की मंशा से सीबीआइ महेंद्र शर्मा के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति देने वाले एनपीसीसी के सीएमडी रजनीकांत अग्रवाल को भी मामले का गवाह बनाने की तैयारी कर रही है. ऐसे में मायावती की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

क्या है ताज कॉरिडोर घोटाला

आगरा में ताज हेरिटेज कॉरिडोर प्रोजेक्ट नवंबर 2002 में बसपा अध्यक्ष मायावती की तत्कालीन सरकार में शुरू हुआ था

175 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट के तहत ताज महल से लेकर आगरा के किले तक के दो किमी के रास्ते में एक कॉरिडोर बनना था

इस गलियारे में शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, टूरिस्ट कॉम्प्लेक्स, एम्यूजमेंट पार्क और रेस्तरां बनाए जाने थे जिसके लिए 17 करोड़ रुपए जारी कर दिए गए थे

पर्यावरण विभाग की मंजूरी के बगैर शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के विरोध में दायर जनहित याचिका पर 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ को जांच के आदेश दिए थे

2007 में सीबीआइ ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती और तत्कालीन पर्यावरण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी सहित 11 अधिकारियों को घोटाले का आरोपी पाया था और चार्जशीट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी

सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ में मौजूद विशेष सीबीआइ अदालत में मुकदमा चलाने के आदेश दिए. सीबीआइ ने यूपी के तत्कालीन राज्यपाल टी.वी. राजेश्वर से अनुमति मांगी

राजेश्वर ने मायावती और सिद्दीकी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देने से इनकार कर दिया. विशेष अदालत ने 5 जून, 2007 को मुकदमे की कार्यवाही समाप्त कर दी

विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ सीबीआइ ने इलाहाबाद हाइकोर्ट में अपील की लेकिन हाइकोर्ट ने 2009 में भी गवर्नर के आदेश को सही ठहराया

हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. इसके बाद से मामला शीर्ष अदालत में लंबित है.

Read more!