भगवा वंशवाद की दुविधा

भाजपा नेताओं ने विपक्ष को परिवारवाद का जमावड़ा बता-बताकर उनकी नाक में दम कर दिया, जबकि उनकी खुद की पार्टी सियासी भाई-भतीजावाद का गढ़ बन गई.

ये भी सवार, वे भी सवार : अमरिंदर सिंह (एकदम बाएं) और उनकी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के दूसरे नेताओं का भाजपा में स्वागत करते केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (बीच में) और किरण रिजिजू
ये भी सवार, वे भी सवार : अमरिंदर सिंह (एकदम बाएं) और उनकी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के दूसरे नेताओं का भाजपा में स्वागत करते केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (बीच में) और किरण रिजिजू

45 है उन भाजपा सांसदों की संख्या जो सियासी परिवार से आते हैं और 2019 में जीते पार्टी के 303 सांसदों में शामिल हैं. वे पार्टी के कुल सांसदों का 15 फीसद हैं
15 मंत्री मोदी की कैबिनेट में ऐसे हैं जो सीधे-सीधे सियासी खानदान से ताल्लुक रखते हैं

2 मुख्ययमंत्री (और एक उप-मुख्यमंत्री) ऐसे हैं भाजपा के, जो सियासी परिवार से हैं भगवा वंशवाद की  दुविधा

यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े विरोधाभासों में से एक है और जिसे व्यापक रूप से स्वीकार्यता मिल चुकी है. एक ताकतवर अभिजात वर्ग जिसके पास सबसे अच्छा कौशल है, उसका राजनीति पर कब्जा रहता है, ठीक वैसे ही जैसे प्रकृति की कोई भी ताकतवर प्रजाति अपनी वंशवृद्धि करती जाती है. आम बोलचाल में हम इसे वंशवादी राजनीति कहते हैं. इसके कई कवेलर देखने को मिल जाते हैं. पहले तो 1947 से पहले के देश के राजघराने हैं.

उसके बाद राजनीति के नवश्रीमंत भी हैं, जिनका आचरण भी उन शाही परिवारों से कुछ अलग नहीं है. इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन के दौरान कहा कि वे विशेष रूप से देश के सामने दिख रही दो प्रमुख चुनौतियों—परिवारवाद और भ्रष्टाचार से दुखी हैं—तो वे व्यापक रूप से इस मुद्दे को लेकर जनता के रोष को भुनाने का प्रयास कर रहे थे. 

मोदी ने यह भी कहा कि दोनों आपस में जुड़े हुए हैं—परिवारवाद, भ्रष्टाचार को जन्म देता है. सत्तारूढ़ भाजपा खुद को इस संस्कृति से मुक्त दर्शाने की कोशिश करती है, और इस तरह वह मानती है कि उसे इस विषय पर अन्य दलों के उपहास का नैतिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन वास्तव में पार्टी खुद परिवारवाद से कितनी मुक्त है?

खैर, पीएम के भाषण के दो महीने से भी कम समय में 8 अक्तूबर को, पार्टी ने हरियाणा की आदमपुर, तेलंगाना की मुनुगोड और उत्तर प्रदेश की गोला गोकर्णनाथ सीटों पर नवंबर में होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की. और, आदमपुर से कांग्रेस के दलबदलू कुलदीप बिश्नोई के बेटे और दिवंगत सीएम भजनलाल के पोते भव्य बिश्नोई समेत तीनों उम्मीदवार उसी परिवारवाद के पोषक थे जिसका पार्टी विरोध करती है.

14 सितंबर को, गोवा के विधायक माइकल लोबो की अगुआई में कांग्रेस के सात विधायक सत्तारूढ़ भाजपा में शामिल हुए. वास्तव में, फरवरी 2022 के चुनाव के लिए लोबो अपनी पत्नी डेलिला के लिए भाजपा से टिकट मांग रहे थे लेकिन पार्टी ने इनकार कर दिया तो लोबो ने जनवरी में भाजपा छोड़ दी थी.

19 सितंबर को, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमिरंदर सिंह ने अपनी नवगठित पंजाब लोक कांग्रेस (पीएलसी) का भगवा पार्टी के साथ विलय किया. पटियाला के महाराजा के साथ उनकी पत्नी और पटियाला से कांग्रेस सांसद परनीत कौर, बेटे रनिंदर, बेटी जय इंदर और पोते निर्वाण सिंह भी भाजपा में शामिल हो गए. इसे वंशवाद से दूरी बनाना तो कतई नहीं कहा जा सकता. 

व्यावहारिक राजनीति में चीजों को अपनी सुविधा के मुताबिक तोड़ना-मरोड़ना   न तो कोई नई चीज है और न ही इससे कोई बचा है. उदाहरण के लिए, पूर्व राजघरानों को ही लें, उनके लिए भाजपा का पुराना प्यार जगजाहिर है. पार्टी के गठन के बाद से ही कई राजघरानों के साथ इसकी बड़ी निकटता रही है और वास्तव में, ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया पार्टी के संस्थापकों में से एक थीं और इस सदी के अवसान पर बनी वाजपेयी सरकार की सदस्य भी.

उनकी बेटियां वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया हमेशा पार्टी में सत्ता के पदों पर रही हैं. वसुंधरा राजस्थान की ताकतवर पूर्व मुख्यमंत्री हैं और यशोधरा वर्तमान मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं. वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां से भाजपा सांसद हैं. भतीजे ज्योतिरादित्य निश्चित रूप से देर से भाजपा में शामिल हुए, लेकिन वे वर्तमान मोदी कैबिनेट में केंद्रीय मंत्री हैं. 

यह भाजपा में जड़ें जमाए भाई-भतीजावाद का बहुत छोटा-सा उदाहरण है. पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में 15 ऐसे मंत्री हैं जो या तो वंशवाद की राजनीति का उत्पाद हैं या फिर अपने वंश को राजनीति में आगे बढ़ा रहे हैं. भाजपा के 395 सांसदों (लोकसभा और राज्यसभा सहित) में से करीब 12 फीसद वंशवादी राजनीति के प्रतिनिधि हैं. दो मुख्यमंत्री, अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू और कर्नाटक में बसवराज बोम्मई, पूर्व मुख्यमंत्रियों के पुत्र हैं. महाराष्ट्र में, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के पिता गंगाधर पंत फड़नवीस महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य थे.

भगवा परिवारवाद

वंशवाद, किसी भी लिहाज से, लोकतंत्र की मूल आत्मा के विरुद्ध है. लेकिन दुविधा दरअसल राजनैतिक विरासत के वास्तविक प्रश्न और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले एक चेहरे को लेकर लगाव की है. भाजपा भी इससे अछूती नहीं है, इसलिए पार्टी नेताओं की दूसरी पीढ़ी को आगे बढ़ाने के प्रश्न पर वह भी घिरती है. इस साल की शुरुआत में, भाजपा ने गोवा के दिवंगत मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के बेटे उत्पल पर्रिकर को पणजी से 'परिवारवाद से दूरी’ का हवाला देते हुए टिकट देने से मना कर दिया था.

2019 में मृत्यु से पहले, मनोहर पर्रिकर ने 25 साल तक पणजी का प्रतिनिधित्व किया था. उत्पल को टिकट देने से मना करने वाली पार्टी ने एटेनेसियो मोनसेरात को चुनाव मैदान में उतारा जबकि उनकी पत्नी और प्रमोद सावंत सरकार में कैबिनेट मंत्री जेनिफर मोनसेरात, बगल की तालीगांव सीट से चुनाव लड़ रही थीं.

इसी तरह, स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे और पोरिम सीट से विधायक उनकी पत्नी देविया राणे का मामला है. विश्वजीत के पिता प्रतापसिंह राणे छह बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. तो क्या 'परिवारवाद को नहीं’  वाला नियम सबके लिए नहीं बल्कि कुछ खास लोगों के लिए लागू होना चाहिए? 

पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में, कांग्रेस नेता और शिरडी से सात बार विधायक राधाकृष्ण विखे-पाटिल 2019 में भाजपा में तब शामिल हुए, जब पार्टी ने अहमदनगर से लोकसभा चुनाव में उनके बेटे सुजय विखे-पाटिल की जीत सुनिश्चित कराई. राधाकृष्ण के पिता बालासाहेब विखे-पाटिल वाजपेयी सरकार में मंत्री थे.

राज्य में भाजपा के खुद के वंशवादी घराने भी हैं जो पार्टी में फले-फूले. पूनम महाजन (मुंबई उत्तर-मध्य लोकसभा सीट से सांसद), पंकजा मुंडे (भाजपा की राष्ट्रीय सचिव) और प्रीतम मुंडे (बीड लोकसभा सीट से सांसद) भाजपा के दिवंगत दिग्गजों प्रमोद महाजन और उनके बहनोई तथा पूर्व डिप्टीसीएम गोपीनाथ मुंडे की बेटियां हैं. 

यूपी में भी यही कहानी है. सूची में सबसे ऊपर बहुगुणा होंगे, जिनका परिवारवाद दो राज्यों (यूपी और उत्तराखंड) तक फैला हुआ है. उसी तरह नरेश अग्रवाल और उनके बेटे नितिन अग्रवाल और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह भी भाजपा में सक्रिय हैं. दक्षिण में भाजपा के एकमात्र गढ़ कर्नाटक में स्थिति बहुत अलग नहीं है.

पूर्व सीएम बी.एस. येदियुरप्पा (बीएसवाई) के परिवार से शुरू करते हुए कई अन्य उदाहरण भी  हैं. वर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी जनता पार्टी के दिवंगत सीएम एस.आर. बोम्मई के पुत्र हैं. बसवराज भी अब अपने बेटे भरत को भाजपा में आगे बढ़ा रहे हैं.

असफल प्रयोग

जब आप किसी सियासी परिवार के प्रति जनता के झुकाव की पूरी तरह अवहेलना करते हैं तो उसका क्या नतीजा होता है? अक्तूबर 2021 में, 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश दादर और नगर हवेली के 29 विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव हुए थे. भाजपा नेतृत्व ने 'परिवारवाद को नहीं’ नियम को एक सख्त प्रयोग के रूप में आजमाया और कई नेताओं के परिवार के सदस्यों को टिकट देने से मना कर दिया. चुनाव के नतीजे आए तो पार्टी को झटका लगा—इन सीटों पर भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार बुरी तरह हार गए.

उस वक्त पार्टी प्रमुख जे.पी. नड्डा बता रहे थे कि कैसे पार्टी नेतृत्व ने परिवारवाद को हतोत्साहित करने के लिए ''सावधानीपूर्वक और जान-बूझकर’’ राजनेताओं के परिजनों को टिकट नहीं देने के नियम का सख्ती से पालन किया. भाजपा के शीर्ष नेता ने वंशवाद से दूरी बनाने, मानदंडों को कड़ा करने और हर परिवार से सिर्फ एक व्यक्ति को टिकट देने जैसे नियम लाने की बात की. अक्तूबर 2021 के उपचुनाव में हार ने इस कड़वे सच से ऐसा अवगत कराया कि इस साल पार्टी ने इस मुद्दे पर पूरी तरह यू-टर्न ले लिया है. नवंबर के उपचुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवारों का चयन इसकी ताजा मिसाल है. 

नए मोर्चे

यह शायद पार्टी के लिए थोड़ा शर्मनाक भी हो सकता है, पार्टी का मानदंड में ढील देना उसके लिए फायदेमंद साबित हो रहा है. भाजपा नए क्षेत्रों में अपने पांव जमाने के लिए आक्रामक तरीके से काम कर रही है. उन क्षेत्रों में नए सियासी परिवारों को प्रोत्साहित करना पार्टी के हक में काम आ रहा है. नड्डा खुद मानते हैं, ''पार्टी विस्तार मोड में है...हम दलबदल को प्रोत्साहित कर रहे हैं या नए क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिए कुछ पार्टी नेताओं की ताकत पर भरोसा कर रहे हैं.’’

भाजपा की यह रणनीति दक्षिण में काम कर रही है. ये वे राज्य हैं जहां वंशवाद की राजनीति बड़े पैमाने पर मौजूद है. इसलिए तेलंगाना में भाजपा ने उपाध्यक्ष पद के लिए डी.के. अरुणा को चुना. संयुक्त आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की एक पूर्व मंत्री, अरुणा की अपने पैतृक और ससुराल पक्ष दोनों ही तरफ की एक राजनैतिक वंशावली है.

अरुणा ने पार्टी को ग्रामीण तेलंगाना में पैठ बनाने में मदद की है. आंध्र प्रदेश में, पार्टी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री डी. पुरंदेश्वरी देवी पर दांव लगाया है जो दिवंगत सीएम और आंध्र राजनीति के आइकॉन एन.टी. रामा राव की पुत्री हैं. भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया और अब वे ओडिशा की प्रभारी भी हैं. 

वंशवाद का सहारा कई बार रणनीतिक वजहों से भी लिया जाता है. नड्डा बताते है, ''गोवा में, देविया राणे को उनके ससुर प्रतापसिंह राणे को रेस से बाहर रखने के लिए मैदान में उतारा गया था. इसी तरह, यूपी विधानसभा चुनाव में, हमने बिधूना से एक नौसिखुआ रिया शाक्य को मैदान में उतारकर एक प्रयोग किया, जब चुनाव से ठीक पहले उनके पिता और मौजूदा भाजपा विधायक विनय शाक्य समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. रिया बहुत कम अंतर से हारीं.’’ 

मगर कई दफा यह रणनीति महंगी पड़ सकती है. भाजपा के एक शीर्ष सूत्र कहते हैं कि ऐसे कई मामलों में जहां 'वंशवाद नहीं’ वाले नियम में ढील दी गई, विशेष रूप से अन्य दलों से आए नेताओं के लिए, वहां पार्टी में बड़ी नाराजगी पैदा हुई है. पर मोदी के बयान से विपरीत, पार्टी मौके की नजाकत के अनुसार लचीलापन दिखाते हुए एक तरह से 'जब जैसा तब तैसा’ की व्यावहारिक राजनीति के साथ टिकी हुई है.

भाजपा सूत्रों का कहना है कि अब हर सीट का विश्लेषण उसकी जमीनी सच्चाई के आधार पर होता है, और किसी सियासी परिवार के व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है. जाहिरा तौर पर, चयन प्रक्रिया में एक ही नियम का बोलबाला है वह है 'जीतने की क्षमता.’ प्रत्याशी जीतने में सक्षम है तो उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि पर ज्यादा विचार नहीं होता. 

दूसरी पीढ़ी के नेताओं के लिए यह अच्छी खबर है. मध्य प्रदेश में भाजपा दिग्गजों के बच्चे पहले से सियासी महत्वाकांक्षाएं जता रहे हैं. उनमें से 10 से ज्यादा राजनीति में सक्रिय हैं, जिनमें केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के बेटे देवेंद्र और गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र के बेटे सुकर्ण शामिल हैं. सीएम शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन भी जमीन तैयार कर रहे हैं.

राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में भी भाजपा नेताओं की लंबी कतार है जो अपने बच्चों के लिए पार्टी में पदों के जुगाड़ में हैं. यहां तक कि नड्डा के बेटे हरीश भी हिमाचल के बिलासपुर क्षेत्र में प्रचार में सक्रिय हैं, वैसे उनका कहना है कि वे परिवार से 'राजनीति में सिर्फ एक ही व्यक्ति के सिद्धांत का पालन करते हैं.

भाजपा में वंशवाद के पैरोकारों की कमी नहीं जिनका कहना है कि इसने भारत में कई पार्टियों को जड़ें जमाने में मदद की है. दिल्ली में एक नेता पूछते हैं, ''राजनेताओं के परिवार के सदस्य जो उतने ही मेहनती हैं—आखिर उन्हें क्या करना चाहिए. क्या वे किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाएं?’’ भाजपा आक्रामक रूप से चुनावी राजनीति में 75 की उम्र सीमा तय कर रही है, इसलिए कई नेताओं ने अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया है.

जैसा कि एक भाजपा नेता कहते हैं, ''यदि मैं अपनी विरासत आगे नहीं बढ़ा सकता तो चुनाव क्षेत्र को पार्टी के लिए उर्वर बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास क्यों करूंगा?’’ यही से सत्ता की साझेदारी में गैर-बराबरी की भावना पनपती है और जैसा कि मोदी ने कहा, ''यह भ्रष्टाचार को जन्म देता है.’’

बेशक, उस बड़ी बयानबाजी का मुख्य उद्देश्य अपने स्थापित सियासी विरोधियों को निशाने पर लेने के लिए उनके खिलाफ एक कथ्य गढ़ना है. गांधी परिवार-नियंत्रित कांग्रेस से लेकर कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती तक, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार के डीएमके तक, आप किसी भी गैर-भाजपाई पार्टी को  देखें, वह वंशवाद के आधार पर खड़ी दिखेगी.

उस मुद्दे पर उन्हें घेरना समझ में आता है. 2019 में, आम चुनाव में पहली बार 4.5 करोड़ लोग पहली दफा के वोटर थे; 2024 में इस संख्या के पांच करोड़ को पार करने की उम्मीद है. भाजपा थिंक-टैंक से जुड़े एक सियासी रणनीतिकार कहते हैं, ''सत्ता को अपना जन्मजात अधिकार मानने वाले वंशों से मोहभंग बढ़ रहा है. इस परिदृश्य में देखें तो राजवंशों की संख्या को कम करने और नए चेहरों को जगह देने का मोदी का विचार उचित लगता है.’’

मगर पार्टी को योजना को अमल में लाने में समस्या हो रही. इंडियास्पेंड के हाल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि 1999 से चुने गए कांग्रेस के 36 लोकसभा सांसद सियासी परिवारों से रहे हैं तो 31 सांसदों के साथ भाजपा भी बहुत पीछे नहीं है. पर नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एक फेलो राहुल वर्मा एक अहम अंतर बताते हैं, ''कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों में, संगठन एक ही परिवार से नियंत्रित होता है. भाजपा में ऐसा नहीं है.’’

फिर भी, भाजपा के लिए यहां निर्णायक आख्यान बनाना आसान नहीं है. इसके कई सहयोगी वंशवादी हैं—जैसे हरियाणा में चौथी पीढ़ी के राजनेता दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी और यूपी में सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल.

नीतीश कुमार के जद (यू) के एनडीए से बाहर होने के बाद, भाजपा ने बिहार में चिराग पासवान से उनके पिता रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की विरासत को पुन: प्राप्त करने के लिए संपर्क साधा है. लेकिन चिराग के बागी चाचा पशुपति पारस केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हैं. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि आखिर चिराग को वह अपनी विरासत वापस पाने में कैसी मदद कर सकेगी. 

बागियों की बात करें, तो पार्टी के नवीनतम सहयोगी, शिवसेना नेता और महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे अपना सियासी वंशवाद स्थापित करने के प्रयास में पहले से जुटे हैं. उनके बेटे श्रीकांत शिंदे कल्याण सीट से सांसद हैं. पार्टी आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू परिवार से नियंत्रित तेदेपा से भी तालमेल बिठा रही है. भाजपा इन्हें अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने के साधन का तर्क देते हुए इसे सही ठहराएगी, पर शायद यह वक्त उस मुखौटे को हटाने और एक ऐसी संस्कृति को अपनाने का है जो पूरे देश में काम करती है. 

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