मामले से मिले सुधार के सबक

आर्यन खान के खिलाफ मामला रफा-दफा होने की अंदरूनी कहानी, और क्यों मादक द्रव्य कानून में संशोधन की है जरूरत.

बिना जुर्म कैद : आर्यन खान नवंबर 2021 में मुंबई के एनसीबी दफ्तर में
बिना जुर्म कैद : आर्यन खान नवंबर 2021 में मुंबई के एनसीबी दफ्तर में

अगर आर्यन खान के मामले में कोई मोड़ आया, तो वह पिछले साल 12 नवंबर को उनका 24वां जन्मदिन था. बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख खान के बड़े बेटे को उस दिन नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के विशेष जांच दल (एसआइटी) ने पूछताछ के लिए बुलाया. एसआइटी का गठन आर्यन और दूसरे 19 लोगों के खिलाफ अवैध मादक पदार्थ रखने और सेवन करने के आरोप की स्वतंत्र जांच के लिए किया गया था.

यह मामला एनसीबी के क्षेत्रीय निदेशालय ने बनाया था, जिसके मुखिया तब मनमौजी समीर वानखेड़े थे. तकरीबन महीने भर पहले वानखेड़े ने छापा मारा था और आर्यन की सनसनीखेज गिरफ्तारी की खबर सुर्खियों में छा गई. 2 अक्तूबर को वे अपने पांच दोस्तों के साथ मुंबई बंदरगाह पर खड़े क्रूज शिप कॉर्डेलिया में चढ़ने जा रहे थे.

एनसीबी की क्षेत्रीय टीम ने दावा किया था कि उनसे और क्रूज शिप में चढ़ने जा रहे दूसरे लोगों से अवैध मादक पदार्थ की अच्छी-खासी मात्रा बरामद हुई और आर्यन के रिश्ते अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स गिरोहों से हैं. आरोप अगर साबित हो जाते तो खान को नार्कोटिक ड्रग्स ऐंड साइकोट्रोपिक सब्सटांसेज (एनडीपीएस) ऐक्ट, 1985 के तहत छह महीने से लेकर 20 साल तक की सजा हो सकती थी.

हालांकि वानखेड़े की ईमानदारी और आर्यन मामले में प्रक्रियागत खामियों पर विवाद उछलने लगे, तो एनसीबी प्रमुख एस.एन. प्रधान ने तय किया कि सच्चाई जानने के लिए स्वतंत्र जांच की जरूरत है. जैसा कि वे बताते हैं, ''वानखेड़े विवाद आर्यन खान पर भारी पड़ रहे थे और दोनों ही मामलों में एनसीबी की साख दांव पर लगी थी. इसलिए मैंने तय किया कि आर्यन मामले में एसआइटी का गठन किया जाए और वानखेड़े पर आरोपों की जांच के लिए विशेष सतर्कता जांच शुरू की जाए.’’ 

प्रधान के इन दो फैसलों ने उस बड़ी प्रक्रिया का आगाज किया, जिससे एनसीबी ने गलती कबूल करने का विरला और साहसी फैसला दिखाया. एजेंसी ने कहा कि उसने कॉर्डेलिया क्रूज मामले में आर्यन और पांच अन्य को लिप्त बताकर और पकड़े गए 14 दूसरे लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करके भूल हुई.

एनसीबी ने कबूल किया कि उसकी मुंबई शाखा ने जांच-पड़ताल में भारी गलतियां कीं और वानखेड़े सहित सभी गड़बड़ अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. इस कदम से एनसीबी की साख पर बट्टा लगेगा, मगर इससे उसके कामकाज में बेहद जरूरी सुधार भी होगा, जो आखिरकार उसकी साख बहाल करेगा.

प्रधान ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ''इससे छोटे-मोटे मामलों के पीछे भागने के बदले मादक पदार्थों के धंधे की बड़ी मछलियों पर फोकस के प्रति हमारा संकल्प मजबूत होगा और ड्रग तस्करी के खिलाफ हमारी लड़ाई के अच्छे नतीजे निकलेंगे.’’ (देखें, 'छोटे-मोटे में न फंसो, बड़ी मछलियां पकड़ो’).

अंदरूनी कहानी
आर्यन खान सुधार की प्रेरणा बन गए तो वजह यह कि उनका मामला उन मुकदमों और दुश्वारियों का प्रतीक बन गया है, जिनसे उन जैसे हजारों नौजवानों को गुजरना पड़ता है, जब उन्हें अवैध ड्रग्स लेने के आरोप में एनडीपीएस के तहत पकड़ लिया जाता है. खान एसआइटी टीम से मिलने जब पहुंचे तो 26 दिन पहले ही जेल में काट चुके थे. उनकी जमानत की अर्जी दो निचली अदालतें खारिज कर चुकी थीं.

सिर्फ बॉम्बे हाइकोर्ट से उन्हें राहत मिली. एसआइटी के मुखिया एनसीबी के डिप्टी डायरेक्टर जनरल (ऑपरेशंस) संजय सिंह नामचीन लोगों को लेकर मीडिया वालों की हायतौबा से वाकिफ थे. सो, उन्होंने खान से थोड़ा छुप-छुपाकर नवी मुंबई में बेहद सुरक्षित केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की कमांडो यूनिट के गेस्ट हाउस में पहुंचने को कहा. एनसीबी से पहले केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) में रह चुके अनुभवी पुलिस अफसर संजय सिंह ने कबूल किया कि उन्हें खान से दिल को छूने वाले सवालों की उम्मीद नहीं थी. 

संजय सिंह ने खान को यह कहकर दिलासा दिया कि वे ''खुले दिमाग’’ के साथ आए हैं और खान उनसे खुलकर बोल सकते हैं. तब खान ने हिंदी में उनके सामने कुछ असहज सवाल रखे. उन्होंने उनसे पूछा, ''सर, आपने मुझे अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स तस्कर बताया और कि मैं ड्रग तस्करी के लिए पैसा देता हूं, क्या ये आरोप बेतुके नहीं हैं? उन्हें उस दिन मेरे पास से कोई ड्रग्स नहीं मिली, फिर भी मुझे पकड़ लिया गया.

सर, आपने मेरे साथ बहुत गलत किया है और मेरी साख मिट्टी में मिला दी है. मुझे क्यों इतने हफ्ते जेल में बिताने पड़े, क्या वाकई उस काबिल था?’’ जवाब में संजय सिंह ने सिर्फ इतना कहा कि मैंने अभी-अभी जांच शुरू की है और सब कुछ की दोबारा जांच करूंगा. बाद में, संजय सिंह ने अपने साथियों से कबूल किया कि खान के एनसीबी पर इस आरोप ने उनके विवेक को झकझोरा कि उन्हें बिना किसी वाजिब वजह के बर्बाद कर दिया गया. 

उसके बाद खान ने एसआइटी को एनडीपीएस कानून और उन धाराओं की जानकारियों से चौंका दिया, जिनका उनके मामले से लेनादेना था. खान ने कहा कि उन्होंने एनसीबी की हिरासत में कानून की एक प्रति मांगी और उसे पूरा पढ़ा. फिर, उन्होंने अफसर से पूछा कि उन पर उस धारा के तहत आरोप क्यों लगाए गए, जो अवैध ड्रग्स में पैसा लगाने और तस्करी से जुड़ी है, जबकि उन्होंने ऐसा कुछ किया ही नहीं.

खान ने यह भी दावा किया कि हिरासत के दौरान उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि एनसीबी अफसर अपनी मर्जी से ड्रग्स की मात्रा बढ़ा दे रहे थे, जिसे कथित तौर पर उन्होंने एक गिरफ्तार आदमी के पास से जब्त किया था. क्यों जब्त की गई ड्रग्स की मात्रा अहमियत रखती है? इस सवाल पर खान ने उन्हें बताया कि एनडीपीएस कानून के तहत, ड्रग्स रखने के तीन पैमाने हैं—निजी इस्तेमाल के लिए थोड़ी, निजी और छोटीमोटी लेनदेन के लिए थोड़ी ज्यादा, और व्यावसायिक तस्करी के लिए बड़ी खेप.

कानून में जब्त ड्रग्स की मात्रा और पैमाने के हिसाब से सजा अलग-अलग है. हिरासत के दौरान खान ने बताया कि उन्होंने एनसीबी अधिकारियों को दूसरे अभियुक्तों से बुरा बर्ताव करते देखा. हालांकि उन्होंने यह भी सफाई दी कि उन्हें सिर्फ धमकियां दी गईं, और कुछ नहीं किया गया.

संजय सिंह ने खान से कहा कि वे शुरू से घटना से जुड़ी अपनी बात बताएं. खान ने इस कबूलनामे से शुरू किया कि उन्हें चरस (वीड) पीने की आदत अमेरिका में पढ़ाई के दौरान पड़ गई. कहा कि कुछ भावनात्मक मुद्दों की वजह से इसकी लत लगी. हालांकि फौरन खान ने यह भी बताया कि उनकी पढ़ाई की जगह कैलिफोर्निया में गांजा पीना कानूनी है. उन्होंने कुछ हिचक के साथ अमेरिका में अपनी लत के बारे में बताया, लेकिन वे देश में अपने साथ हुई घटनाओं को लेकर एकदम साफ थे कि उन्होंने कोई गलती नहीं की.

उनकी अपने दोस्त अचित कुमार के साथ वॉट्सऐप चैट एनसीबी अधिकारियों के पास है. उसमें कथित तौर पर वे अचित को लिखते हैं कि 80,000 रु. जो उसे उनको देने हैं, उसका कुछ हिस्सा वह किसी सामान के रूप में दे दे. इसे ही वीड मान लिया गया. खान ने इसका खंडन किया. उन्होंने सबूत पेश किया कि अचित उसे नकदी किस्तों में लौटा रहा था. उनके दोस्त ने भी इसकी तस्दीक की.

इस बीच, बॉलीवुड के सुपरस्टार और आर्यन के पिता शाहरुख खान ने भी कहा कि वे संजय सिंह से मिलना चाहते हैं. संजय सिंह ने अपने स्टाफ से कहा कि शाहरुख उनसे आकर मिल सकते हैं क्योंकि वे बाकी अभियुक्तों के मां-बाप से भी मिल चुके हैं. फिर, जूनियर खान की मुलाकात खत्म हुई तो शाहरुख खान गेस्ट हाउस पहुंचे और संजय सिंह से कहा कि वे अपने बेटे की दिमागी और भावनात्मक हालत से बेहद चिंतित हैं.

आर्यन ठीक से सो नहीं पाते और कई बार शाहरुख को उनके बेडरूम में जाकर सारी रात उनके साथ बितानी पड़ती है. शाहरुख ने पूरे मामले में एनसीबी की भूमिका पर सवाल उठाए और कहा कि उनके बेटे को दोषी ठहरा दिया गया, जबकि उसके पास से कुछ भी ठोस नहीं मिला था. नम आंखों के साथ उन्होंने संजय सिंह से कहा, ''हमें बड़े अपराधियों या राक्षसों जैसा बताया गया, जो समाज को तबाह करने पर तुला है और हमारा हर रोज काम पर जाना मुश्किल हो गया है.’’

बातचीत के अंत में उन्होंने बताया कि आज मेरे बेटे का जन्मदिन है. संजय सिंह ने माफी मांगी और कहा कि वे जानते तो किसी और दिन बुलाते. उन्होंने एक केक भी ले जाने की पेशकश की, मगर शाहरुख ने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं और कि आर्यन इसी से खुश है कि उसकी बात ध्यान से सुनी गई. उन्होंने संजय सिंह से कहा, ''इन दिनों इससे बेहतर तोहफा और कोई क्या चाह सकता है.’’

खुलती परतें
फिर संजय सिंह और उनकी टीम ने मामले के दूसरे आरोपियों से पूछताछ की. इसके अलावा उन्होंने वानखेड़े की अगुआई वाली एनसीबी की मुंबई टीम के साथ बैठकर जमा किए गए तमाम सबूतों की छानबीन भी की. जो पैटर्न उभरकर आया, उसने एसआइटी को हैरत में डाल दिया, क्योंकि हरेक कदम पर उन्हें गंभीर और अबूझ खामियां मिलीं जिनसे मामला काफी कमजोर हो गया.

छापा मारते वक्त एनसीबी को निजी तौर पर आर्यन के पास कोई नशीले पदार्थ नहीं मिले, लेकिन अरबाज मर्चेंट के मोजों से 6 ग्राम चरस जरूर मिली. मर्चेंट आर्यन का वही दोस्त है जिसके साथ वे क्रूज पर एक ही कमरे में ठहरने वाले थे. एनसीबी ने इस मामले में 'कॉन्शस पजेशन’ के सिद्धांत का इस्तेमाल किया, जिसका मतलब था कि आर्यन को पता था कि मर्चेंट चरस लेकर आया है और इसलिए वह भी कानूनी कार्रवाई का पात्र है.

मगर अगले दिन मर्चेंट ने साफ कहा कि ड्रग उसके अपने इस्तेमाल के लिए थी और आर्यन को पता था कि वह कभी-कभार चरस फूंकता है और उन्होंने उसे क्रूज पर नशीला पदार्थ रखने के लिए आगाह भी किया था, क्योंकि ''एनसीबी के अफसर इन दिनों खासे सक्रिय हैं.’’ एनसीबी की टीम की जांच में एसआइटी ने कई प्रक्रियागत खामियां भी पाईं, खासकर उन्होंने वे जूते और मोजे जब्त नहीं किए जिनमें मर्चेंट ने कथित तौर पर चरस छिपाई थी.

न ही उन्होंने आर्यन की मेडिकल जांच करवाई और यह पता लगाए बिना कि उन्होंने वाकई नाजायज नशीले पदार्थ का सेवन किया था या नहीं, सेवन की कानूनी धाराएं लगा दीं. एनसीबी की टीम ने मर्चेंट और गिरफ्तार किए गए दूसरे लोगों से जब्ती के वक्त वीडियोग्राफी भी नहीं की, जबकि नियमों के तहत ऐसा करना अनिवार्य है.

मर्चेंट के बयान ने जब आर्यन के खिलाफ एनसीबी के मामले की हवा निकाल दी, तो वानखेड़े और उनकी टीम उसे फंसाने के लिए दूसरे सबूत तलाशने लगी और उनका सेलफोन कब्जे में ले लिया. संजय सिंह कहते हैं, ''मुझे यह अजीब लगा कि नशीले पदार्थ खरीदने और रखने में आर्यन के शामिल होने से अरबाज के साफ-साफ इनकार करने के बावजूद जांच अधिकारी आर्यन की व्हॉट्सऐप चैट खंगालने लगे और ऐसा करने के लिए उन्होंने तय प्रक्रिया के अनुसार आर्यन का मोबाइल औपचारिक रूप से जब्त भी नहीं किया.’’

एसआइटी का कहना है कि वानखेड़े ने चैट में आए नामों को पूछताछ के लिए बुलाना भी शुरू कर दिया, जबकि अदालतों में साक्ष्य के तौर पर चैट की तब तक कोई अहमियत नहीं थी जब तक प्राथमिक प्रमाणों से उनकी पुष्टि न हो. एसआइटी इस नतीजे पर पहुंची कि आर्यन के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए कोई सबूत नहीं था और आरोपपत्र से उनका नाम हटा दिया. उसने उन पांच दूसरों के नाम भी हटा दिए जिन पर पहले ऐसे ही आधारों पर एनडीपीएस कानून के तहत आरोप लगाए गए थे.

वानखेड़े को दोहरा झटका झेलना पड़ा. न केवल आर्यन खान मामले में खराब जांच के लिए उनकी खिंचाई की गई बल्कि उनके खिलाफ अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए विशेष पूछताछ टीम (एसईटी) गठित कर दी गई. आरोप के मुताबिक, उनकी तरफ से शाहरुख खान से रकम ऐंठने की कोशिश का तो कोई सबूत नहीं है, पर एसईटी ने उनकी संपत्तियों के बारे में सवाल उठाए हैं.

जो जाहिरा तौर पर उनकी आमदनी के ज्ञात स्रोतों से मेल नहीं खातीं (देखें: शिकारी खुद हुआ शिकार). आर्यन के मामले से पहले वानखेड़े को एनसीबी के सबसे मेधावी अफसरों में गिना जाता था. वे आक्रामक, महत्वाकांक्षी, मेहनती थे और दो साल पहले कमान संभालने के बाद उन्होंने ड्रग तस्करों और विक्रेताओं के खिलाफ कड़े रुख से मुंबई ब्यूरो की इज्जत बढ़ा दी थी. आर्यन खान विवाद के बीच वानखेड़े ने एनसीबी में स्थायी तैनाती के लिए आवेदन किया और यूपीएससी ने इजाजत भी दे दी.

मगर जब कॉर्डेलिया मामले में चूक और खामियों को लेकर प्रतिकूल रिपोर्ट आईं साथ ही उनकी निजी शुचिता और ईमानदारी पर सवाल भी खड़े हो गए, तो मोदी सरकार ने उनके मूल काडर में चेन्नै के एक पद पर उनका तबादला कर दिया. इस बीच उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं, यह देखने के लिए विभागीय जांच जारी है.

कॉर्डेलिया कांड के नतीजतन एनसीबी के भीतर जारी सुधारों का काम तेज हो गया. प्रधान ने अपनी टीम को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि ग्राहकों के पीछे भागने के बजाए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों बड़े ड्रग कार्टेल पर कार्रवाई करें. प्रधान ने कहा, ''हमने पाया कि 10 ग्राम चरस और एक टन चरस की जांच करने में हमारा निवेश तकरीबन बराबर है, इसलिए मैंने कहा है कि बड़ी मछलियों पर ध्यान दें.’’

इससे पहले प्रधान ने सरकार से अपने कर्मचारियों की संख्या मौजूदा 1,200 से बढ़ाकर 2,000 करने का निवेदन किया था. इससे उनके पास इतने पर्याप्त आदमी होंगे जो नशीले पदार्थों की तस्करी पर लगाम कसने के भारी-भरकम काम को संभाल सकें, खासकर जब अफगानिस्तान के कार्टेल के कारोबार में लौटने के साथ यह खास तौर पर गंभीर हो गया है. भारत अब अवैध पदार्थों का बड़ा बाजार और दूसरे देशों में ले जाने का रास्ता भी है.

देश में इसकी बढ़ती लत भी चिंता की बात है. एनएफएचएस (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) के हालिया सर्वे से पता चला कि 8 से 10 करोड़ लोग अवैध नशीली दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनमें से कई लती होने की वजह से कानून के हत्थे चढ़ेंगे और भारतीय जेलों में भीड़ बढ़ाएंगे.

आर्यन के वकील सतीश मानशिंदे इसे अहम मुद्दा बताते हुए कहते हैं, ''आर्यन खान का मामला महज एक मामला था जिसमें आपको देश के एक जाने-माने परिवार का व्यक्ति मिल गया और जिसमें सारी ताकत, सारी दौलत और सबसे अच्छी कानूनी टीम को खड़ा कर देने के बाद भी उन्हें 26 दिन यंत्रणा झेलनी पड़ी. किसी भी दूसरे देश में ऐसे दुरुपयोग के लिए भारी हर्जाना चुकाना पड़ता.’’ भारत में नशीले पदार्थों के अवैध सेवन के लिए हर साल करीब 70,000 लोग गिरफ्तार किए जाते हैं और हजारों न्यायिक सहायता के बगैर जेल में सड़ते रहते हैं.

गैर-आपराधिक बनाने की दलीलें
केंद्रीय सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय ने प्रस्ताव रखा है कि एनडीपीएस कानून में संशोधन करके कुछ निश्चित अवैध नशीले पदार्थों और खासकर भांग और अफीम से बने नशीले पदार्थों के इस्तेमाल को गैर-आपराधिक बना दिया जाए. कई विशेषज्ञों ने इसका समर्थन किया है. दिल्ली के एक्वस में राष्ट्रीय औषध निर्भरता उपचार केंद्र में प्रोफेसर डॉ. अतुल आंबेकर कहते हैं, ''मेरा रुख डब्ल्यूएचओ और यूएन सहित विशाल वैज्ञानिक समुदाय के रुख से अलग नहीं है.

नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले लोगों को अपराधियों की तरह न देखा जाए. इसे आपराधिक कृत्य बनाना न केवल पूरी तरह बेअसर बल्कि समाज के लिए नुक्सानदायक भी है. एक तो इससे कानून लागू करने वाली और ड्रग सप्लाइ को नियंत्रित करने वाली तमाम एजेंसियों का ध्यान ऐसे पदार्थ लेने वाले लाखों लोगों से निपटने पर केंद्रित हो जाता है, क्योंकि उन्हें आसानी से पकड़ा जा सकता है.

इससे वे बड़ी मछलियों को पकड़ने में अपनी कोशिशें और संसाधन लगाने का मौका गंवा देते हैं.’’ आंबेकर नशीले पदार्थों के सेवन को गैर-आपराधिक बनाने की एक और दलील देते हैं, ''लोगों ने अब मानवाधिकारों की भी ज्यादा बुनियादी समझ हासिल कर ली है और ऐसी चीज को दंडित करने का कोई मतलब नहीं है जो महज एक अस्वस्थ व्यवहार है.’’

मगर एनसीबी के प्रधान की चिंता यह है कि नशीले पदार्थों को सिरे से गैर-आपराधिक बनाने के नतीजतन युवाओं में बिना किसी रुकावट के नशीले पदार्थ लेने की बाढ़ आ जाएगी. वे कहते हैं कि कई माता-पिता सख्त एनडीपीएस कानून बनाए रखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि लत लग जाने के बाद बच्चों को कैसे संभालें. उन्हें लगता है कि कानून के डर से मदद मिल सकती है.

प्रधान चाहते हैं कि कानून में संशोधन इस बारीक फर्क के साथ किया जाए कि कुछ निश्चित नशीले पदार्थों के सेवन को गैर-आपराधिक बना दें लेकिन साथ ही बार-बार अपराध करने वालों को दंड देने की व्यवस्था कायम रखें. बहुत कुछ यातायात के उल्लंघनों की तरह ही, जिनमें पहले कुछ अपराधों के लिए आपको हल्का जुर्माना चुकाना होता है पर निश्चित संख्या में ज्यादा बार उल्लंघन करने पर लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है.

बेंगलूरू के निमहांस की डायरेक्टर डॉ. प्रतिमा मूर्ति इस मुद्दे को दूसरे नजरिए से देखती हैं. वे कहती हैं, ''मौजूदा एनडीपीएस कानून में अवैध दवाओं का सेवन करने के दोषी पाए गए लोगों को इलाज के लिए भेजने का प्रावधान है, पर इसकी इजाजत केवल एक बार दी गई है. नशे की लत अलबत्ता बेहद गंभीर और लाइलाज समस्या है और दोबारा इसके फेर में पड़ना अपवाद नहीं बल्कि नियम है.’’

वे सिफारिश करती हैं कि नौजवानों से कह दिया जाए कि वे जा सकते हैं, चिंता न करें, संपर्क में रहें, जेल में डालने के बजाए उनकी मदद की जाएगी. अपने तजुर्बे से वे कहती हैं कि युवा साथियों के दबाव में ड्रग आजमाते हैं. फिर वे इस्तेमाल जारी रखते हैं क्योंकि उन्हें तनावमुक्त होने में मदद मिलती है. मूर्ति कहती हैं, ''अक्सर यह रिश्ते टूटने, अकादमिक जिंदगी में अच्छा न कर पाने, अकेलेपन या अशांत पृष्ठभूमि के कारण शुरू होता है.’’

इस पर आंबेकर की राय भी वही है जो मूर्ति की है. वे कहते हैं, ''क्रोनिक डायबिटीज से ग्रस्त व्यक्ति एक और गुलाब जामुन खा ले तो क्या आप उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई पर जोर देंगे?’’ उनका कहना है कि नशे की लत उच्च रक्तचाप और दूसरी गैर-संक्रामक बीमारियों की तरह है, जिसका ''इलाज करना होता है, आपराधिक नहीं बनाना होता.’’ आंबेकर पुर्तगाल का उदाहरण देते हैं, जो नशीले पदार्थों को कामयाबी से गैर-आपराधिक बनाने वाले देशों में है.

यहां 2001 में ही यह कानूनी सुधार लाया गया कि अवैध ड्रग्स लेते पकड़े गए शख्स को पुनर्वास केंद्र पर ले जाया जाएगा और समझाया-बुझाया जाएगा. इससे पुर्तगाल में न केवल अवैध नशे के सेवन की दर में कमी आई बल्कि पुर्तगाल को उन कई यूरोपीय देशों से बेहतर होने में मदद मिली जहां नशे की लत अभी भी कानूनन अपराध है.

नशे के सेवन को गैर-आपराधिक बनाने के अलावा, आंबेकर कहते हैं, ''(पुर्तगाल की) सरकार ने रोकथाम और इलाज के उपायों और बेहतर स्वास्थ्य तथा कल्याण सहायता में भी काफी निवेश किया. हमारी खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया के कारण कानून लागू करने वाले अधिकारियों ने नशे पर नियंत्रण की समूची व्यवस्था का अपहरण कर लिया और स्वास्थ्य नेपथ्य में चला गया है.’’

राहत का स्पर्श
विशेषज्ञों का कहना है कि नशीली दवाओं की खपत कम करने के लिए मांग में कमी लाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए, जिसमें लोगों को नशे की ओर प्रवृत्त होने से रोकने के लिए उपचार, पुनर्वास और जागरूकता पर काम किया जाना शामिल है. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में संयुक्त सचिव राधिका चक्रवर्ती कहती हैं, ''युवाओं को नशीली दवाओं के सेवन के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए ताकि वे सोचा-समझा निर्णय ले सकें और अपने कार्यों के परिणामों से अवगत हो सकें.’’

मंत्रालय ने 2020 में महिलाओं और युवाओं पर केंद्रित जागरूकता कार्यक्रम ''नशा मुक्ति अभियान’’ शुरू किया था, जिसका उद्देश्य लोगों को नशीली दवाओं पर निर्भरता बढ़ाने वाले कारणों के प्रति संवेदनशील बनाते हुए भी नशे का उपयोग करने वालों को कलंकित नहीं करना है. अभियान में 2.5 करोड़ स्वयंसेवकों ने नामांकन कराया लेकिन कोविड महामारी ने कुछ समय के लिए अभियान में बाधा पहुंचाई.

मंत्रालय ने हॉटस्पॉट जिलों में 270 से अधिक उपचार केंद्र भी स्थापित किए. इनमें नशा करने वालों के पुनर्वास के लिए उन्हें ''नार्कोटिक्स एनॉनिमस’’ (नशामुक्ति के क्षेत्र में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय संगठन) की पद्धति पर सलाह सेवाएं दी जाती हैं. मंत्रालय एनडीपीएस कानून के तहत नशीली दवाओं की खपत को श्रेणीबद्ध तरीके से अपराध-मुक्त करने पर भी जोर दे रहा है.

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए आंबेकर दो तरह के जागरूकता कार्यक्रमों का सुझाव देते हैं. एक जो इस बात पर जोर दे कि नशीले पदार्थ क्यों आपके लिए ठीक नहीं हैं और दूसरे, जो नशा करने वालों को उम्मीद दिलाते हुए बताए कि नशे की लत से बाहर आना संभव है. सिंथेटिक दवाओं के क्षेत्र में हुई भारी प्रगति और कम हानिकारक चीजों से भी व्यसनियों की मदद की जा सकती है.

वे पंजाब का उदाहरण देते हैं जहां इस तरह की रिप्लेसमेंट दवाएं पूरे राज्य के क्लिनिकों में बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराई गईं, जिससे बहुत फर्क पड़ा. इस राज्य के मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर आसानी से दोहराया जा सकता है. साथ ही, इलाज के लिए विशेष क्लिनिकों के अलावा, सामान्य अस्पतालों को भी इस दिशा में बुनियादी उपचार सुविधाएं स्थापित करने के लिए राजी किया जा सकता है. आंबेकर कहते हैं कि यह सब आसानी से किया जा सकता है और इसके लिए बड़े संसाधनों या शोध की आवश्यकता नहीं है.

ऐसे प्रयोगों से यह निर्णायक रूप से साबित हो चुका है कि लोगों को जेल में डालने की तुलना में उनके इलाज पर बहुत कम खर्च होता है. यह सभी के लिए जीत जैसी स्थिति है. युवाओं को इलाज के लिए आगे आने में सक्षम बनाने के लिए हमें नशीली दवाओं के उपयोग को अपराध-मुक्त करना चाहिए क्योंकि अभी वे कानूनी डर से भी इलाज के लिए आगे आने से कतराते हैं. 

मूर्ति का मानना है कि किसी एक रणनीति से काम नहीं चलेगा और कई तरीके अपनाने की जरूरत है. इन उपायों में सामुदायिक स्तर पर नशीली दवाओं के उपयोग को सामान्य बनाना, नशीली दवाओं की मांग घटाने की दिशा में काम करना, इलाज की जरूरत वाले लोगों को उचित उपचार मुहैया कराना शामिल है. मूर्ति कहती हैं, ''इसका कोई शॉर्टकट नहीं है. इस काम को आगे बढ़ाने के लिए सभी को मिलकर ताकत लगानी होगी.’’ यह अच्छी तरह से ध्यान देने योग्य सलाह है.

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