खास रपटः गांधी परिवार से मुक्ति की छटपटाहट

चुनावी हार से कांग्रेस में फिर उठी परिवर्तन की आवाज, विद्रोही गुट के और दूसरे नेता चाहते हैं कि निष्पक्ष संगठनात्मक चुनाव हों और 'जवाबदेह नेतृत्व’ स्थापित हो, क्या नेहरू-गांधी परिवार इसके लिए राजी होगा?

बंधन के सूत्र दिल्ली में 13 मार्च को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में सोनिया गांधी और राहुल
बंधन के सूत्र दिल्ली में 13 मार्च को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में सोनिया गांधी और राहुल

टूटने के कगार पर खड़ी कांग्रेस को बचाने के लिए पार्टी 14 मार्च, 1998 को सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाकर ले आई. राजीव गांधी की हत्या के सात साल बाद भी गांधी उपनाम को तारणहार के तौर पर देखा जाता था, क्योकि तब भी देश भर में उसके पास अच्छी-खासी राजनैतिक पूंजी थी. तब से सोनिया कांग्रेस की राजनैतिक धुरी रही हैं, जबकि उनकी संतानें राहुल और प्रियंका सत्ता के नाभिकेंद्र से क्रमश: 2004 और 2019 में जुड़े.

दरअसल कांग्रेस के इतिहास में पहली बार नेहरू-गांधी परिवार के तीन नेता एक साथ राजनीति में सक्रिय हैं. ऐसे में तो पार्टी पर उनकी मुकम्मल पकड़ होनी चाहिए थी. इसके बजाए 13 मार्च को, यानी सोनिया की पहली ताजपोशी के ठीक 24 साल बाद, कांग्रेस की मातृ सत्ता पूरे परिवार की विदाई की पेशकश कर रही थी. पार्टी के सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय कांग्रेस कार्यकारिणी (सीडब्ल्यूसी) से सोनिया ने कहा, ''अगर हम तीनों से कोई दिक्कत है, तो हम कोई भी त्याग करने को तैयार हैं. हमारे मन में बिल्कुल साफ है कि पार्टी सबसे पहले है और पार्टी से बड़ा कोई नहीं है.’’

त्याग की यह पेशकश गांधी परिवार ने पहली बार नहीं की. इस बार अलबत्ता यह ऐसे वक्त आई, जब तीखी बहस छिड़ी है कि पार्टी को देश के राजनैतिक फलक पर सफाए से बचाने के लिए परिवार को नेपथ्य में चला जाना चाहिए. गांधी परिवार की सदारत में 2014 से पार्टी को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक के बाद एक चुनावी पराजयों का सामना करना पड़ा है. पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस 543 सदस्यों के सदन में दहाई के आंकड़े से आगे नहीं जा सकी.

खास रपटः गांधी परिवार से मुक्ति की छटपटाहट

उसकी हुकूमत वाले राज्य 2014 में 13 से घटते-घटते महज चार रह गए हैं. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में वह अपने दम पर सत्ता में है और महाराष्ट्र और झारखंड की गठबंधन सरकारों में जूनियर पार्टनर है. सीडब्ल्यूसी की बैठक से महज तीन दिन पहले पार्टी को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपमानजनक पराजय झेलनी पड़ी. इनमें पंजाब भी था, जहां उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा. 

उम्मीद के मुताबिक सीडब्ल्यूसी ने सोनिया से इस साल संगठन चुनाव होने तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने का अनुरोध किया और संगठन में राजनैतिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए जरूरी बदलाव करने को कहा (2020 में भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया गया था). अलबत्ता आस्था का यह प्रदर्शन सोनिया तक सीमित रहा. जी-23 के नाम से चर्चित उस छोटे-से मुखर धड़े के अलावा, जो खुलकर संगठन के कायाकल्प और जवाबदेह नेतृत्व की मांग करता रहा है, कांग्रेस के कई दिग्गज नेता भी आधिकारिक पदों से या असल मुखिया के तौर पर राहुल और प्रियंका को पार्टी चलाने देने को लेकर चौकन्ने हैं.

राहुल ने 2019 में लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेकर कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, पर मां के अंतरिम अध्यक्ष रहते वे सारे बड़े फैसले लेते रहे. उनके आलोचक बताते हैं कि ऐसे ही दो फैसलों ने पंजाब में पार्टी की लुटिया डुबो दी. इनमें एक फैसला चुनाव से महज चार महीने पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री के पद से हटाना और दूसरा नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाना था. प्रियंका ने पंजाब में सिद्धू की पीठ पर हाथ रखा, तो उत्तर प्रदेश में प्रभारी महासचिव के नाते पार्टी के अब तक के बदतरीन प्रदर्शन की अगुआई की, जहां वह दो सीट और दो फीसद वोट तक सिकुड़ गई.

खास रपटः गांधी परिवार से मुक्ति की छटपटाहट

राहुल से अनबन
2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद से राहुल गांधी और कई दिग्गज नेताओं के बीच खाई चौड़ी होती रही है. 2019 में इस्तीफा देते वक्त उन्होंने उनमें से कइयों की खुलकर आलोचना की थी. कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा के खिलाफ लड़ाई में उनका साथ नहीं दिया.

उनके आलोचक दावा करते हैं कि वे मिलने के लिए सुलभ नहीं होते, मुट्ठी भर 'राजनैतिक रूप से अनुभवहीन’ पसंदीदा लोगों या पत्रकारों और नीति विशेषज्ञों तक की बातों पर भरोसा करते हैं, पार्टी के दिग्गज नेताओं से सलाह-मशविरा नहीं करते और मनमाने फैसले लेते हैं. मसलन, कई बड़े नेता मानते हैं कि भारत-चीन टकराव पर राहुल का रुख या नरम हिंदुत्व का प्रदर्शन, चुनावों में उलटे पार्टी के ही गले की फांस बन गया.

उनके चुनिंदा लोगों की नाकामियों से हताशा बढ़ी. बीते दो साल में राहुल ने चुनाव अभियान की देख-रेख के लिए रणदीप सिंह सुरजेवाला को बिहार, अजय माकन को पंजाब और जयराम रमेश को मणिपुर भेजा. उन्होंने अपने तीन कृपापात्रों जितेंद्र सिंह (असम), देवेंद्र यादव (उत्तराखंड) और हरीश चौधरी (पंजाब) को राज्य प्रभारी भी बनाया. कांग्रेस इन सभी राज्यों में हार गई. फिर भी परिवार अपने चुनिंदा लोगों में भरोसा जताता रहा.

मसलन, पांच राज्यों में हार का मुंह देखने के बाद भी कांग्रेस ने हालात का जायजा लेने के लिए माकन को पंजाब, जयराम को मणिपुर और अविनाश पांडेय को गोवा भेजा. एक बागी नेता कहते हैं, ''जो (हमारे लिए) हार गए, वही जांच करेंगे कि वे क्यो हारे. इससे बदतर नहीं हो सकता. क्या वे बता सकते हैं कि पंजाब से सांसद मनीष तिवारी राज्य में स्टार प्रचारक क्यो नहीं थे और राज्य के पूर्व अध्यक्ष राज बब्बर को उत्तर प्रदेश से दूर क्यो रखा गया?’’

जब कांग्रेस 2021 में चार राज्यों में हारी, हार के कारणों की समीक्षा और सुधार के उपाय सुझाने के लिए पांच सदस्यों की कमेटी बनाई गई थी. इसमें जी23 के नेता मनीष तिवारी भी थे. तिवारी दावा करते हैं कि रिपोर्ट को दफना दिया गया और उसकी सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. तमिलनाडु से पार्टी सांसद मणिक्कम टैगोर इससे इनकार करते हैं और कहते हैं कि इन्हीं सिफारिशों की बदौलत पिछले पांच विधानसभा चुनावों में छानबीन समितियां जल्द बनाई गईं और उम्मीदवारों की घोषणा भी जल्द की गई.

अपने को लगातार दरकिनार किए जाने से परेशान जी23 नेताओं ने अगस्त 2020 में सोनिया को चिट्ठी लिखकर अपनी नाराजगी को आधिकारिक शक्ल दे दी. नौ सदस्यों के रुखसत होने और चार नए सदस्यों के आगमन के साथ अब जी18 रह गए बागियों के इस धड़े ने अपनी बुनियादी मांगें दोहराई हैं. कपिल सिब्बल ने कहा कि गांधी परिवार को नेतृत्व से अलग हो जाना चाहिए, तो जी18 के एक अन्य नेता पी.जे. कुरियन मानते हैं कि राहुल को संसद में पार्टी की अगुआई करनी चाहिए, अध्यक्ष पद दूसरों के लिए छोड़ देना चाहिए. 

राहुल के सुलभ न होने का मुद्दा दिग्विजय सिंह, मुकुल वासनिक और पूर्व केंद्रीय मंत्री के.एच. मुनियप्पा (जो जी18 के हिस्से नहीं हैं) सरीखे अन्य बड़े नेताओं ने भी सीडब्ल्यूसी की बैठक में उठाया. जी18 के अघोषित प्रमुख गुलाम नबी आजाद ने राहुल पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि पार्टी को ऐसे अध्यक्ष की जरूरत है जो 'सुलभ, स्वीकार्य और जवाबदेह’ हो. सीडब्ल्यूसी के एक नेता कहते हैं, ''सुलभ, स्वीकार्य और जवाबदेह नेतृत्व पर जोर अप्रत्यक्ष रूप से राहुल को सितंबर में अध्यक्ष का पद का चुनाव लडऩे से रोकने के लिए है.’’

पार्टी का केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण (सीईए) सांगठनिक चुनाव प्रक्रिया की देख-रेख कर रहा है. इसके प्रमुख राहुल के वफादार मधुसूदन मिस्त्री हैं. कांग्रेस अध्यक्ष चुनने वाले मतदाता मंडल में 10,000 से ज्यादा प्रदेश कांग्रेस प्रतिनिधि हैं जिन्हें ब्लॉक स्तर पर ब्लॉक कांग्रेस प्रमुखों ने चुना है. ये प्रतिनिधि करीब 1,400 एआइसीसी (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी) सदस्यों का चुनाव करते हैं, जो फिर सीडब्ल्यूसी का चुनाव करते हैं.

कागज पर यही प्रक्रिया है, पर विद्रोहियों का दावा है कि व्यवहार में सीईए केंद्रीय पार्टी नेतृत्व के साथ सलाह-मशविरा करके पीसीसी प्रतिनिधियों और एआइसीसी सदस्यों की सूचियां तैयार करता है और फिर उन पर संबंधित राज्य अध्यक्षों के दस्तखत करवाता है. फिर इसके आधार पर पार्टी अध्यक्ष और सीडब्ल्यूसी के सदस्यों का चुनाव होता है. यही वजह है कि जी18 के सदस्य चुनाव प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव की मांग कर रहे हैं. पंजाब के एक कांग्रेस सांसद कहते हैं, ''किसी गांधी को अध्यक्ष और मसखरों के झुंड को सीडब्ल्यूसी सदस्य चुनने के लिए चुनाव प्रक्रिया में फर्जीवाड़ा किया जाता है.’’

यही वजह है कि जी18 का असली मकसद यह पक्का करना है कि सीडब्ल्यूसी के चुनाव में उन लोगों को दरकिनार न कर दिया जाए, जिन्हें राहुल का समर्थन हासिल नहीं है. सीडब्ल्यूसी के निर्वाचित सदस्य अध्यक्ष के फैसलों के खिलाफ तनकर खड़े हो सकते हैं क्योकि वे उसके रहमो-करम पर निर्भर नहीं होते. इसलिए अगर कोई गांधी अगला अध्यक्ष चुन भी लिया जाता है, तो पार्टी को 'मनमाने और सनकी’ तौर-तरीकों से चलाने का दौर खत्म हो जाएगा.

पिछली करीब आधी सदी में सीडब्ल्यूसी के चुनाव केवल दो बार हुए—1992 और 1997 में. दोनों मौकों पर गैर-गांधी शिखर पर था. जब से सोनिया गांधी ने बागडोर संभाली, वे ही सीडब्ल्यूसी सदस्यों को नामजद करती रही हैं. आखिरी बार उन्होंने सितंबर 2020 में, जी23 की चिट्ठी के एक महीने बाद, सीडब्ल्यूसी का पुनर्गठन किया था. मूल जी23 के तीन नेताओं, आजाद, आनंद शर्मा और वासनिक को सीडब्ल्यूसी में बनाए रखा गया. सामूहिक नेतृत्व की मांग के जवाब में उन्होंने अपनी सहायता के लिए छह सदस्यों की एक समिति भी बनाई और वासनिक को उसमें सदस्य के तौर पर शामिल किया. वासनिक ने तभी से बागियों से दूरी बना ली.

जी18 क्या गांधी नामधारियों को गद्दी से उतार सकते हैं?
परिवार के वफादार दावा करते हैं कि कांग्रेस ने हमेशा सामूहिक नेतृत्व का पालन किया और बागियों के आरोप को 'फर्जी दावा’ कहकर खारिज कर देते हैं. वे बताते हैं कि जी18 के सात नेता कई कांग्रेस समितियों में हैं. 2020 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान आजाद प्रभारी महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा अभियान समिति के प्रमुख थे. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण 2021 के असम चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख थे.

जवाब में जी18 के नेता कहते हैं कि कभी-कभार (कई नियंत्रणों के साथ) सौंपे गए ऐसे कामों को सामूहिक नेतृत्व नहीं माना जा सकता, जो 'सतत प्रक्रियाÓ है. उनमें से एक बताते हैं कि शर्मा से भारत-चीन टकराव पर विरले ही कभी सलाह-मशविरा किया गया, बावजूद इसके कि वे विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख हैं. राज्यसभा के एक सांसद कहते हैं, ''पता करो कि सोनिया गांधी की मदद के लिए बनाई गई छह सदस्यों की समिति ने पिछले दो साल में कितनी बैठकें कीं. सारे फैसले गांधी भाई-बहन अपनी निजी पसंद और नापसंद के आधार पर लेते हैं और फिर उन पर मां की मुहर लगवाते हैं.’’

जी18 नेताओं का यह कहकर मजाक उड़ाया जाता है कि वे ऐसे नेता हैं जिनकी उम्र ढल चुकी है, उनकी अपील न जनता में है और न संगठन में, वे राज्यसभा में जगह हासिल करने सहित प्रभावशाली आधिकारिक पदों की तलाश में हैं. आजाद की राज्यसभा सदस्यता पिछले साल चली गई. शर्मा, सिब्बल और विवेक तन्खा जुलाई तक अपनी सीटें गंवा देंगे और उनके फिर चुनकर आने की संभावना नहीं है.

आजाद ने 1984 से लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा. शर्मा ने कभी लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा. सिब्बल और तन्खा कई बार हार चुके हैं. मणिशंकर अय्यर 2014 में जमानत गंवा बैठे और शंकर सिंह वाघेला तो कांग्रेस के सदस्य तक नहीं हैं.

हालांकि उनमें कई दूसरों को व्यापक जनसमर्थन हासिल है. मसलन, शशि थरूर ने लगातार तीन बार लोकसभा का चुनाव जीता है. तिवारी दो बार से लोकसभा सांसद हैं. हरियाणा की राजनीति के दिग्गज नेता हुड्डा राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं. जी18 के एक नेता कहते हैं, ''अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हों तो उनमें से कोई भी अध्यक्ष के पद का चुनाव लड़ सकता है.’’

मगर चुनाव प्रक्रिया में बदलाव की कोई भी संभावना राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और मध्य प्रदेश के दिग्गज कमलनाथ और दिग्विजय सिंह सरीखे बड़े नेताओं के सहयोग के बगैर बेकार हो जाती है. गहलोत और बघेल मजबूती से गांधी परिवार के पीछे खड़े रहे हैं, तो कमलनाथ और दिग्विजय का ध्यान मध्य प्रदेश दोबारा जीतने पर है. कमलनाथ ने दिसंबर 2020 में बागियों और सोनिया के बीच अस्थायी सुलह करवाई थी. इस बार उन्होंने चुप्पी साध ली.

इस बीच, दो साल पहले की तरह जी18 को बांटने की प्रक्रिया फिर शुरू हो गई है. राहुल ने हुड्डा से संपर्क साधा और कयास यह है कि उनके बेटे दीपेंदर को हरियाणा कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया जाता है तो पूर्व मुख्यमंत्री बागियों के खेमे से किनारा कर सकते हैं. सोनिया ने भी अलग-अलग खेपों में कुछ बागी नेताओं से मुलाकात की. पहले आजाद के साथ और फिर शर्मा, तिवारी, तन्खा के साथ इकट्ठे.

राहुल के जी-हुजूर ऐसी स्थिति को लेकर फिक्रमंद हैं जिसमें अगर वे अध्यक्ष का चुनाव नहीं लडऩे का फैसला करते हैं तो उन्हें 'डमी’ उम्मीदवार खोजना पड़ सकता है. इसकी उम्मीद बागी नेताओं ने भी नहीं की है. जिन दो नामों के सबसे ज्यादा कयास लगाए जा रहे हैं, वे दोनों राजस्थान से हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके मुख्य विरोधी सचिन पायलट. दोनों ने ही डूबते जहाज की अगुआई करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है. ठ्ठ             

एक बागी नेता हैरानी से कहते हैं, ''जो (हमारे लिए) हार गए, वे ही समीक्षा करेंगे कि वे क्यो हारे. इससे बदतर और क्या हो सकता है?’’

लगभग आधी सदी से कांग्रेस कार्यकारिणी का चुनाव सिर्फ दो बार 1992 और 1997 में हुआ और दोनों बार अध्यक्ष कोई गैर-गांधी नेता था. जब से सोनिया गांधी के हाथ कमान आई, उन्होंने कार्यकारिणी में सदस्यों को नामजद ही किया है.

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