बिहारः गालिब छुटी ना शराब
तमाम कोशिशों के बावजूद बिहार में शराबबंदी नाकाम हो रही, सरकार सख्त है और विपक्ष के तेवर तीखे

अवैध शराब का अंजाम गोपालगंज के बलथरी चेकपोस्ट के पास जब्त की गई 4,000 लीटर शराब को नष्ट करते आबकारी विभाग के कर्मी
पुष्यमित्र
''अंकल, मेरे पापा रोज दारू पीते हैं. नशे में वे मेरी दादी के साथ मारपीट भी करते हैं. जरा मेरे घर चलकर उनको समझा दीजियेगा कि वे ऐसा न करें.'' 15-16 साल के किशोर अंकित गुप्ता ने चार-पांच महीने पहले अपने गांव मोहम्मदपुर के पुलिस थाने में जाकर यह शिकायत की थी. अंकित अपने घर के हालात से बहुत दुखी था. उसके पिता संतोष साह रोज शराब पीते थे. पहले उसकी मां के साथ मारपीट करते थे. तो वह तंग आकर मायके चली गयी. फिर उसकी दादी यानी अपनी मां के साथ मारपीट करने लगे. नशे की लत में जमीन जायदाद बेचने लगे. लाचार होकर बेटे अंकित को पुलिस थाने जाना पड़ा. मगर थाने में भी अंकित की कोई सुनवाई नहीं हुई. तत्काल सख्त कार्रवाई करने के बदले पुलिस उसे समझा बुझाकर वापस घर भेज दिया. और 2 नवंबर, 2021 को खबर आई कि जहरीली शराब पीने की वजह से बिहार के गोपालगंज जिले के इस मोहम्मदपुर गांव के 13 लोगों की मौत हो गयी. मरने वालों में एक अंकित का पिता संतोष साह भी शामिल थे.
संतोष की सत्तर पार मां उमरावती देवी कहती हैं कि शराबबंदी कानून लागू होने के बाद एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब उसके बेटे ने शराब न पी हो. उसे गांव में ही शराब मिल जाती थी. पत्नी सविता देवी पुलिस में शिकायत की बात कहती तो संतोष उसे धमकाता-'पुलिस को कंप्लेन करके क्या कर लोगी? मैं तो पुलिस वालों के साथ ही बैठकर शराब पीता हूं.' फिर भी सविता ने पांच साल पहले संतोष के खिलाफ शराब पीकर मारपीट करने का मुकदमा दर्ज कराया था. मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई. संतोष के बड़े भाई राकेश कुमार साह कहते हैं, ''आज भी गांव में धड़ल्ले से शराब बिक रही है और लोग पी रहे हैं. मैंने कल ही खेतों में एक आदमी को शराब के नशे में धुत जमीन पर लुढ़के हुए पाया है.''
संतोष साह की यह कहानी सूबे में लागू हुई पूर्ण शराबबंदी की जमीनी हकीकत बयान करती है. यहां आसानी से हर जगह शराब मिल रही है. लोग रोज पी रहे हैं और घर की महिलाओं के साथ पहले की तरह मारपीट कर रहे हैं. शिकायत पर भी पुलिस सक्रिय नहीं होती, अक्सर शिकायत करने वालों को टरका देती है. जबकि सरकार ने शराब की शिकायत के लिए टोल फ्री नंबर तक जारी किए हैं. राज्य में हर जगह शराब की खाली बोतलें और पाउच फेंके हुए आसानी से दिख जाते हैं. पिछले दिनों तो विधानसभा परिसर में भी शराब की बोतलें मिल गयीं. विपक्ष ने इस घटना को मुद्दा बनाया तो मजबूरन सरकार को परिसर में शराब की बोतलें तलाशने के लिए डीजीपी को लगाना पड़ा.
पिछले दिनों जहरीली शराब से 33 लोगों की मौत के बाद सरकार बहुत दबाव में आ गयी थी. इस दबाव से निबटने के लिए सीएम ने 16 नवंबर, 2021 को सभी मंत्रियों, जिलों के प्रभारी सचिवों और डीएम-एसपी के साथ सात घंटे तक समीक्षा बैठक की. तय हुआ कि एक सेंट्रल टीम बनेगी जो राज्यभर में छापेमारी करेगी. उसे जहां शराब मिलेगी, वहां के थानेदार को सस्पेंड कर दिया जाएगा. लापरवाही बरतने वाले थानेदारों को अगले दस साल तक थाने में ड्यूटी नहीं दी जाएगी. शराब से जुड़े मामले में शामिल होने पर उन्हें बर्खास्त कर दिया जायेगा. हर 15 दिन पर डीएम और एसपी शराबबंदी की समीक्षा करेंगे. डीजीपी, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, उत्पाद आयुक्त और आईजी मद्यनिषेध हर दूसरे दिन इसकी समीक्षा करेंगे. फिर 26 नवंबर को मद्यनिषेध दिवस के दिन सभी मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों, सरकारी पदाधिकारियों और कर्मियों को शराब नहीं पीने और किसी को नहीं पीने देने की शपथ भी दिलायी गयी.
चेकपोस्ट से तस्करी
हर महीने तस्करी की शराब बरामद हो रही है. दिसंबर महीने में भी ये सिलसिला जारी है. भट्टियां तोड़ी जा रही हैं. फिर भी सात दिसंबर को समस्तीपुर जिले के बल्लीपुर गांव में जहरीली शराब पीने से तीन मजदूरों की मौत हो गयी. उसी रोज गोपालगंज जिले के सीमावर्ती बलथरी चेकपोस्ट पर पिछले एक महीने में जब्त की गयी चार हजार लीटर शराब को नष्ट किया जा रहा था. संयोगवश उस वक्त इंडिया टुडे की टीम वहीं मौजूद थी. वहां स्कॉच की महंगी बोतलें भी थीं, तो लोकल ब्रांड वाली 'बंटी-बबली' नाम की प्लास्टिक की छोटी बोतलें भी. महंगे ब्रांड के शराब के टेट्रा पैक नजर आ रहे थे. वहां मौजूद गोपालगंज के एक्साइज सुपरिंटेंडेंट राकेश कुमार ने बताया कि हम लोग इसे 'फ्रूटी पैक' कहते हैं. इसका इजाद भी तस्करी के लिहाज से ही किया गया है क्योंकि शीशे की बोतलें आवाज करती हैं. ये हल्की और बेआवाज होती हैं. न फूटने का खतरा, न लाने में कोई दिक्कत. वे बताते हैं, तस्कर हमेशा अलग-अलग तरीके अपनाते हैं. एक बार तो हमने देखा कि प्लास्टिक के गोल-गोल रेलिंग वाले पाइप में काफी महंगी शराब लाई जा रही थीं.
पहले इस चेकपोस्ट पर आने वाली ज्यादातर शराब हरियाणा से आती थी. मगर हाल में जब गोपालगंज की पुलिस वहां के माफिया सरगना को उठाकर लाई तो वहां से फ्लो 90 फीसदी तक कम हो गया. अब यूपी से मोटरसाइकिल और फोर व्हीलर आदि से शराब की आवक बढ़ी है. इस चेकपोस्ट से गोपालगंज ही नहीं, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मोतिहारी और बेतिया तक के लिए शराब आती है. राकेश कुमार कहते हैं, जब हरियाणा से शराब आती थी तब हम एक महीने में करीब 28 हजार लीटर शराब तक बरामद कर चुके थे. अब जब इधर का मामला ठंडा पड़ा तो दालकोला की तरफ से पूर्णिया-किशनगंज की सीमा के इलाके में ज्यादा आमद होने लगी है. हालांकि किशनगंज एसपी कुमार आशीष कहते हैं कि अब दालकोला से भी आवक काफी कम हो गयी है. हमने बंगाल के तीन बड़े तस्करों को पकड़ लिया है, जो तृणमूल कांग्रेस से जुड़े थे. एक वक्त में बंगाल सीमा से महीने में 30 हजार लीटर तक शराब पकड़ी गयी थी. हमने बलथरी चेकपोस्ट पर देखा, एक-एक गाड़ी को रोककर लंबी चेकिंग होती है. एक गाड़ी की चेकिंग में 15 से 20 मिनट लग जाते हैं. इस लंबी प्रक्रिया में कई दफा ट्रक चालकों और पुलिस वालों के बीच बहस हो जाती है. इस चिक-चिक और लंबी जांच का विकल्प क्या है?
राकेश कहते हैं कि अगर स्कैनर लग जाए तो सुविधा हो सकती है. तब ट्रक स्कैनर के नीचे से गुजरेगा और अंदर क्या है दिख जायेगा. तब न वक्त लगेगा, न इतनी चिक-चिक होगी. अभी हम सिर्फ संदिग्ध वाहनों की जांच कर पाते हैं. किशनगंज एसपी कुमार आशीष भी इस बात को स्वीकार करते हैं. मगर जब हमने बिहार के एक्साइज कमीश्नर बी कार्तिकेय से स्कैनर के बारे में पूछा, तो वे बोले-स्कैनर को लेकर भ्रम की स्थिति है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इससे एक्स-रे तरंगें बाहर आती है, जो ट्रक चालकों के लिए नुकसानदेह हो सकती है.
फिलहाल बलथरी चेकपोस्ट पर वाहनों की जांच के लिए एक ही उपकरण दिखता है. वह है लोहे की लंबी और नुकीली छड़. ट्रक पर उस छड़ को सामान के बीच में नीचे तक डाला जाता है, ताकि निचले हिस्से में कहीं शराब हो तो उस छड़ से उसका पता चल जाए.
जलमार्ग से भी आती है शराब
बलथरी चेकपोस्ट पर बड़ी संख्या में शराब के साथ पकड़ी गयी गाड़ियां दिखती हैं. इनमें बस-ट्रक, महंगी कारें और तरह-तरह के वाहन हैं. राकेश कहते हैं, कुल 1092 गाडिय़ां जब्त हैं. इनमें फोर्चुनर कार तक है. जल्द ही इनकी नीलामी होने वाली है. वे कहते हैं, अमूमन हर महीने-दो महीने में चार से पांच सौ गाड़ियां पकड़ी जाती हैं. फिर इन्हें नीलाम कर दिया जाता है. हालांकि शराब की तस्करी सिर्फ हाइवे से नहीं होती. सीमावर्ती इलाके में वह ग्रामीण रास्तों, खेतों और कई दफा जलमार्ग से भी होती है. इधर जलमार्ग का इस्तेमाल काफी बढ़ा है. इन दिनों सारण जिले के मांझी पुल का इलाका जलमार्ग के जरिये तस्करी का सबसे प्रमुख मार्ग बन गया है. वहां यूपी के बलिया जिले के ग्रामीण इलाकों से रात के वक्त नावों से शराब ढोयी जाती है.
सिताब दियारा के एक ग्रामीण संतोष कहते हैं कि उनके गांव का इलाका धीरे-धीरे शराब तस्करों का अड्डा बन गया है. वहां बिहार से लोग बड़ी संख्या में आकर लोकल शराब माफियाओं के घर ठहरते हैं और रात आठ बजे नावों पर शराब लाद कर लौट जाते हैं. वे कहते हैं, दोनों राज्यों के शराब माफियाओं की जमघट से उनके गांव का माहौल खराब हो रहा है. वे इसकी शिकायत कई दफा यूपी-बिहार पुलिस से कर चुके हैं, मगर कार्रवाई नहीं हुई. जल मार्ग से तस्करी का एक बड़ा रूट गंडक नदी का रास्ता भी है. भारत-नेपाल और यूपी सीमा पर स्थित वाल्मिकीनगर की तरफ से नाव से बड़े पैमाने पर शराब बिहार के अलग-अलग इलाकों में भेजी जाती है. मोहम्मदपुर गांव के लोगों ने बताया कि पिछले महीने गोपालगंज और पूर्वी चंपारण में जहरीली शराब से जो मौतें हुईं, वे भी संभवत: गंडक के रास्ते ही पहुंचीं थीं.
शराब तस्करों ने भारत-नेपाल के बीच की खुली सीमा का भी भरपूर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. बिहार में यह सीमा 729 किमी लंबी है, जो पश्चिम में वाल्मिकीनगर से लेकर पूरब में किशनगंज तक फैली है. यह सीमा पूरी तरह से खुली है. प्रमुख चेकपोस्ट पर सीमा सुरक्षा बल के जवान जरूर तैनात रहते हैं, मगर वे कहते हैं, ग्रामीण इलाकों में हर जगह चेकपोस्ट बनाकर जांच करना न मुमकिन है, न व्यावहारिक. ऐसा ही एक सीमाक्षेत्र है, पूर्वी चंपारण के रक्सौल से पास का मुशहरवा गांव. वस्तुत: मुशहरवा एक ही गांव है और यह दोनों देशों भारत और नेपाल में आधा-आधा बंट गया है. गांव के लोग आपस में काफी घुलमिलकर रहते हैं.
हमने देखा कि वहां कभी कोई ब्रश करते-करते नेपाल से भारत आ जाता है तो कभी लोग भोज खाने भारत से नेपाल चले जाते हैं. कोई-कोई घर ऐसे हैं, जिसका एक दरवाजा भारत में तो दूसरा नेपाल में खुलता है. यहां अगर कोई शराब इधर से उधर ले जाए तो उसे रोकना नामुमकिन है. इस खुली सीमा पर ऐसे गांवों की संख्या कम नहीं है. ये सब शराब तस्करी के रास्ते बन गए हैं. पूर्वी चंपारण के घोड़ासहन के पास स्थित सीमा को शराब तस्करी का बड़ा जोन माना जाता है. वहां से शराब मुजफ्फरपुर तक पहुंचती है और फिर वहां से अलग-अलग इलाकों में भेजी जाती है. इसी तरह भारत बंगाल सीमा पर स्थित दालकोला, झारखंड की सीमा पर स्थित गया के इलाके और यूपी सीमा से सटे कैमूर और बक्सर के इलाकों से बड़े पैमाने पर शराब की तस्करी होती है. भारत-नेपाल सीमा पर शराब तस्करी के धंधे के बारे में रक्सौल स्थित एसएसबी हेडक्वार्टर के डिप्टी कमांडेंट मनोज कुमार कहते हैं, कोई बड़ा कंसाइनमेंट आ रहा हो तो उसे पकड़ना आसान है. मगर दो-चार बोतलों को पकड़ पाना मुश्किल होता है. कई बार ऐसे लोगों को हम छोड़ भी देते हैं, क्योंकि लोकल लोगों से हम बेहतर रिश्ता बनाकर रखना चाहते हैं. मनोज बताते हैं कि उनके पड़ोसी 71 बटालियन में रोज बड़े पैमाने पर शराब पकड़ी जाती है. आदापुर से आगे वाले इलाके में बहुत अधिक सीजर होती है. क्योंकि वह ग्रामीण सीमा वाला इलाका है. इस तरह हम देखते हैं कि लैंडलॉक स्टेट बिहार में शराबबंदी के बावजूद बड़े पैमाने पर हर सीमा से शराब आ रही है.
होम डिलीवरी एजेंटों की चांदी
इस तस्करी के नेटवर्क की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, होम डिलीवरी एजेंट. रक्सौल में ऐसे ही एक एजेंट से हमारी मुलाकात हुई. वह बीस-बाइस साल का एक युवक है. एक झोपड़ीनुमा होटल चलाता है. दीवाली से पहले तक वह होम डिलीवरी के धंधे में था. उसने कहा कि पिता की गिरफ्तारी के बाद उसने यह धंधा छोड़ दिया है. उसने महंगे ब्रांडेड कपड़े और जूते पहन रखे थे. नेपाल से शराब लाकर दोगुनी कीमत में बेचने के धंधे में उसने काफी पैसे कमाए. जब इस बारे में उससे पूछा तो वह शर्माने लगा. वह बोला कि शुरुआत में साथियों के साथ थोड़ा बहुत काम किया था, अब छोड़ चुका हूं. ''शराबबंदी के बाद बिहार में ऐसे लड़कों की बाढ़ आ गई है जो सीमावर्ती इलाके में तस्करी और होम डिलिवरी का काम करते हैं.'' झटपट अमीर बनने का यह अच्छा धंधा हो गया है. गोपालगंज में भी ऐसे कई लड़कों के बारे में पता चला जो दो-तीन साल में लखपति हो गए. ये जेल जाने में भी नहीं हिचकते. क्योंकि इन्हें थोड़े से पैसे खर्च करके आसानी से बेल मिल जाती है. इसके साथ-साथ शराब माफिया की फौज भी खड़ी हुई है, जो इन लड़कों से काम लेती है और इनकी मदद से शराब वितरण की सामानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली है. इसमें कई राजनेताओं के नाम भी लिए जाते हैं. पिछले दिनों जनाधिकार पार्टी के नेता पप्पू यादव ने ऐसे ही 23 शराब माफियाओं के नाम सार्वजनिक किए थे. राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप में भाजपा और जदयू के विधायकों ने अपनी ही पार्टी के नेताओं के नाम सार्वजनिक किए हैं. पड़ोसी राज्यों के राजनेता भी इस कारोबार में जुटे हैं. पश्चिम बंगाल और यूपी के भी कुछ राजनेताओं के नाम इस कारोबार से जोड़े जाते हैं.
गैर जरूरी कार्रवाई का इल्जाम
शराब के इस काले कारोबार में पुलिस पर भी बराबर की भागीदारी के आरोप लगते हैं. खुद बिहार सरकार ने अब तक ऐसे 206 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया है. 2017 में एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन में पटना जिला एवं सत्र न्यायालय के कई कर्मियों को कैमरे पर शराब से जुड़े अपराधियों की मदद के लिए पैसे मांगते दिखाया गया. बाद में ऐसे 16 कर्मियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई. बिहार में शराबबंदी कानून के तहत किस पैमाने पर अपराध हो रहा है, इसका पता इन आंकड़ों से चलता है. कानून के लागू होने से लेकर अक्तूबर, 2021 तक कुल चार लाख से अधिक लोग गिरफ्तार किये जा चुके हैं. तीन लाख से अधिक मामले दर्ज कराए जा चुके हैं. शराबबंदी से पहले राज्य में लोग सालाना 14 करोड़ लीटर से अधिक शराब पीते थे. शराबबंदी के बाद राज्य में शराब की बरामदी 1.85 करोड़ लीटर हुई है. जाहिर है बरामदगी से काफी अधिक शराब राज्य में पहुंच रही होगी. हालांकि यह कहा जा सकता है कि शराबबंदी के बाद बिहार में शराब की खपत तो कमी है. दरअसल बिहार में शराबबंदी को लागू करने का जिम्मा पूरी तरह पुलिस और एक्साइज महकमे पर ही छोड़ दिया गया है. इस वजह से पुलिस काम के बोझ के तले दब रही है और अदालतों में भी मामले बढ़ रहे हैं. हालांकि ज्यादातर मामले पेंडिंग हैं और जनवरी 2021 तक सिर्फ 470 लोगों को ही सजा सुनाई जा सकी थी.
शराबबंदी के शुरुआती दिनों में ज्यादातर गिरफ्तारियां गरीब लोगों की ही हो रही थी. 2018 तक राज्य में जिन डेढ़ लाख के करीब लोगों की गिरफ्तारियां हुई थीं, उनमें से 90 फीसदी गरीब तबके के बताए जाते हैं. पहली सजा भी जहानाबाद के दो दलित भाइयों को हुईं. इन दोनों भाइयों को मई, 2017 को गिरफ्तार किया गया था, उसी साल 11 जुलाई को पांच-पांच साल की सजा और एक-एक लाख का जुर्माना सुनाया गया. अदालती चक्करों में इन गरीब दिहाड़ी मजदूरों के एक लाख रुपये खर्च हो गए. सारी पूंजी होम हो गई, कर्ज चढ़ गया, परिवार के सामने खाने-पीने का संकट पैदा हो गया और बच्चों की पढ़ाई रुक गई. इन भाइयों का कहना था कि इन्होंने शराब नहीं बल्कि थोड़ी सी ताड़ी जरूर पी थी. मगर थोड़ा सा नशा कर लेने की जो कीमत इन भाइयों ने चुकाई वह इनके परिवारों को तबाह कर गई. बड़ी संख्या में लोगों के साथ यही हुआ. पुलिस पर लोगों के साथ ज्यादती के भी आरोप लगे. हाल के दिनों में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें पुलिस एक शादी पार्टी में शराब की तलाश में दुल्हन के बेडरूम तक घुस गई थी. इससे पहले राजधानी पटना के एक होटल में 20 नवंबर को शराब पी रहे इंजीनियरिंग के छात्रों को गिरफ्तार किया जो एक बारात में शामिल होने के लिए दूसरे राज्य से आए थे.
उसी दिन एक होटल से एक डॉक्टर दंपती को भी गिरफ्तार किया गया. हालांकि इन घटनाओं से बिहार सरकार पर गैर जरूरी कार्रवाई के आरोप लगने लगे. इन आलोचनाओं के बाद बिहार सरकार ने अपनी नीति बदली और तस्करों पर कार्रवाई पर फोकस किया. शराब मामले में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी होने की वजह से अदालतों पर काफी बोझ बढ़ा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक स्थानीय अदालतों में लंबित मामलों में 25 फीसदी और उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों के 20 फीसदी शराबबंदी से जुड़े हैं. हालांकि शराबबंदी कानून में शराब से संबंधित मामलों के निबटारे के लिए स्पेशल कोर्ट गठित करने की बात थी. बाद में राज्य कैबिनेट ने ऐसे 74 विशेष अदालतों के गठन की मंजूरी भी दी थी. मगर इस खबर को लिखे जाने तक इनमें से एक भी अदालत का गठन नहीं हो पाया है.
आबकारी अदालतों का खस्ताहाल
राज्य के आबकारी अदालतों की हालत को समझने के लिए हम पटना के एक्साइज कोर्ट पहुंचे तो वहां जमानत लेने वालों की भारी भीड़ थी. जब सरकारी वकील का पता पूछा तो बताया गया कि वे पार्किंग में अपनी कार पर बैठे रहते हैं. वही उनका दफ्तर है. वे वहीं लोग उनसे मिला जुला करते हैं. सरकारी वकील उस रोज छुट्टी पर थे. उनके सहायक अपनी स्कूटी पर उसी तरह दफ्तर खोले बैठे थे. सहायक ने बताया कि इस अदालत में अमूमन 40 से 45 हजार मामले लंबित हैं. तीन सरकारी वकील जरूर हैं, मगर जज एक ही हैं. ऐसे में जाहिर है कि मुकदमे काफी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं. अब तक सिर्फ 11 मामलों में सजा हो सकी है. अभियुक्त का फोकस जमानत लेने पर होता है. सरकारी वकील अपने दफ्तर के बदले कार पार्किंग में क्यों बैठते हैं, यह पूछे जाने पर बताया गया कि उन्हें अभी तक बैठने की कोई जगह नहीं मिली है? मगर क्या इतना सब कुछ होने पर भी बिहार में शराबी कम हुए? शायद नहीं. क्योंकि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) 5 के आंकड़े कहते हैं कि बिहार में 14.8 फीसदी लोग अभी भी शराब पीते हैं. ये 2019-20 के सर्वे के आंकड़े हैं. जबकि 2015-16 में जारी एनएफएचएस-4 के आंकडों के मुताबिक बिहार में उस वक्त 28.9 फीसदी पुरुष शराब पी रहे थे. जाहिर है आधे से अधिक लोग अभी भी शराब पी रहे हैं. बिहार की करीब 13 करोड़ की आबादी के लिहाज से यह काफी बड़ी संख्या है.
महिला संगठन भी खुश नहीं
तो फिर शराबबंदी को लेकर राज्य सरकार जो इतनी मेहनत-मशक्कत कर रही है, उसका क्या फायदा ? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बात को बार-बार कहते हैं कि उन्होंने शराबबंदी उन महिलाओं की मांग पर की, जो लगातार शराब के खिलाफ आंदोलन चला रही थीं. मगर क्या इस शराबबंदी के बाद उन महिलाओं के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव आया?
यह जानने के लिए हमने इंदुबाला से बातचीत की. इंदुबाला मुजफ्फरपुर में अपनी महिला साथियों के साथ मिलकर लोकल दारू की भट्टियों के खिलाफ अभियान चलाती रही हैं. शराबबंदी के बावजूद उनका धावा दल सक्रिय है. वे कहती हैं कि उनके पंचायत के लगभग सभी गांवों में आज भी महुआ दारू तैयार होती है और लोग पीते हैं. महिलाओं के साथ हिंसा में कमी तो आयी है, मगर 25 फीसदी महिलाएं आज भी शराब के नशे में धुत अपने पतियों की हिंसा और प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं. वे कहती हैं कि 2020 में उनके समूह की कुछ महिलाएं महुआ दारू की भट्ठी बंद कराने गयी थीं. बहुत बवाल हुआ. उनके साथ भट्ठी संचालकों ने हिंसा भी की. बाद में उन भट्ठी संचालकों ने भट्ठी बंद कराने गयी एक महिला की बेटी को किडनैप कर लिया. फिर पुलिस की मदद से उस लड़की को छुड़ाया गया.
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता शाहीना परवीन का मानना है कि साढ़े पांच साल बाद भी शराबबंदी का अचीवमेंट 50 फीसदी से भी कम है. वे कहती हैं, सफल शराबबंदी के चार चरण हैं. पहला जागरूकता, दूसरा सहमति, तीसरा रोजगार और चौथा उपचार. लोगों की शराब की लत के खतरों के प्रति जागरूक किया जाए, उन्हें इस बात के लिए राजी कराया जाये कि वे शराब छोड़ देंगे, उनके लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था हो और अगर कोई शराब छोड़ पाने में खुद को असमर्थ पा रहा हो तो उसका इलाज कराया जाए. मगर शाहीना के मुताबिक सरकार ने सिर्फ सक्चती और बल के सहारे शराबबंदी को लागू करने की कोशिश की. सामाजिक समूहों को इस अभियान से नहीं जोड़ा. न रोजगार के इंतजाम हुए, न लत के शिकार लोगों के लिए इलाज की समुचित व्यवस्था. बिहार में शराबबंदी की शुरुआत जीविका से जुड़ी महिलाओं की मांग पर हुई थी, मगर मोहम्मदपुर गांव में हुए जहरीली शराब कांड का कसूरवार जीविका से जुड़ी एक महिला प्रभावती देवी के पति को ही माना गया. पुलिस ने उसके घर को सील कर दिया. हालांकि इस कांड में उनके पति मुकेश राम की मौत भी हो गई. वे कहती हैं कि उन्हें अपने समाज के लोगों को शराब पीना छोड़ने के लिए समझाने की जिम्मेदारी मिली थी. मगर वे इस बात को अपने पति को भी समझा नहीं सकी.
नशा मुक्ति केंद्र केवल नाम के
आखिर ऐसा क्यों हुआ? जानकार मानते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ कि सरकार ने शराबियों को शराब की लत छुड़ाने के बदले गिरफ्तार कर जेल में डालने को प्राथमिकता दी. अगर उन्हें नशामुक्त करने का काम किया जाता तो शायद हालात अलग होते. जब बिहार में शराबबंदी का फैसला हुआ था तो उस वक्त यह तय हुआ था कि राज्य के सभी सदर अस्पतालों में 15-15 बेड के नशामुक्ति केंद्रों का संचालन होगा. उसमें नशे की लत के शिकार लोगों का इलाज हो सकेगा. देखा जाये तो शराबबंदी का यह बड़ा महत्वपूर्ण कंपोनेंट था. मगर इन केंद्रों में पूरे साढ़े पांच साल की अवधि में न के बराबर लोग इलाज कराने पहुंचे. इस बारे में पूछने पर राज्य स्वास्थ्य समिति, बिहार के डीएडिक्शन सेल से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि अमूमन नहीं के बराबर शराब पीने वाले अब इन नशामुक्ति केंद्रों में भर्ती हो रहे हैं. जो लोग शराब के नशे में गिरफ्तार होते हैं, उन्हें सीधे जेल भेज दिया जाता है. गोपालगंज जिले के सदर अस्पताल के नशामुक्ति केंद्र में भी शराब के नशे के आदी मरीज नहीं के बराबर एडमिट होते हैं.
अस्पताल के डीपीएम कहते हैं, लोगों में जागरूकता की कमी है, इसलिए वे अपना इलाज कराने यहां नहीं आते. हालांकि ऐसे लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार क्या कर रही है, इसका जवाब वे नहीं देते? राजधानी पटना में पीएमसीएच और एनएमसीएच दोनों अस्पतालों में नशामुक्ति केंद्र संचालित हो रहे हैं. पीएमसीएच के नशामुक्ति वार्ड में कुछ मरीज जरूर दिखते हैं. राजधानी पटना में निजी नशामुक्ति केंद्र संचालित करने वाली राखी शर्मा कहती हैं, यूरोपीय मुल्कों में नशे की हालत में पकड़े गये लोगों को जेल के बदले नशामुक्ति केंद्र भेजे जाने का चलन है. क्योंकि शराबियों को जेल भेजने से उसमें नकारात्मक भावना भर जाती है. जेल जाने से उसकी छवि पर दाग लगता है. अगर बिहार सरकार भी इस चलन को अपनाए तो शराबबंदी सफल हो सकती है. इससे अदालतों का बोझ भी घटेगा. हालांकि ताजा घटनाओं के बाद बिहार सरकार ने जागरूकता पर थोड़ा फोकस बढ़ाने की कोशिश की है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद समाज सुधार यात्रा शुरू कर रहे हैं, जिसमें शराबबंदी के साथ-साथ बाल विवाह, दहेज प्रथा समेत कई मुद्दों पर बात होगी. मगर इस समाज सुधार अभियान में सामाजिक संगठनों को नहीं जोड़ा जा रहा. फोकस अभी भी पुलिसिया कार्रवाई पर ही है.