पश्चिम बंगालः दीदी से दुर्गा
ममता बनर्जी की जीत ने न केवल बंगाल बल्कि देशभर की विपक्षी ताकतों में उम्मीद पैदा कर दिया है जो भगवा ब्रिगेड की अनवरत चढ़ाई को रोकने की आस लगाए हुए हैं.

तीसरी बार सीएम ममता बनर्जी 5 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेती हुईं
यह 2 मई की शाम थी जब खबर आई कि ममता बनर्जी ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है. जीत की हैट्रिक और दो बार सीटों के दोहरे शतक को पार करते हुए उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सभी कयासों को धत्ता बता दिया. इस चुनाव की स्थायी छवि व्हीलचेयर पर बैठी ममता होंगी, एक घायल शेरनी जिन्होंने प्रधानमंत्री समेत भाजपा की पूरी ताकत के खिलाफ अकेले जंग लड़ी.
सत्ता-विरोधी रुझान, भ्रष्टाचार और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप, स्त्री-विरोधी उपहास...ममता ने सबका बहादुरी से सामना किया और आखिरकार उनकी पार्टी 292 सीटों में से 213 जीत कर (दो सीटों पर चुनाव स्थगति हुए हैं) भारी जीत हासिल की. भाजपा के रथ को रोककर बंगाल में उनकी छवि दीदी से दुर्गा वाली बन गई है. ममता ने मोदी-शाह की अचूक जोड़ी के दावे की हवा निकाल दी और देशभर की विपक्षी ताकतों की बड़ी उम्मीद बन गई हैं.
जीत के तुरंत बाद ममता को बधाइयों का तांता लग गया, केवल विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से नहीं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उन्हें कॉल किया, राकांपा सुप्रीमो शरद पवार ने टीएमसी की जीत को ‘विलक्षण विजय’ करार दिया, वहीं शिवसेना ने ‘बंगाल की शेरनी’ की तारीफ की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बधाई को लेकर ट्वीट करते हुए विनम्र नजर आए, वहीं राजनाथ सिंह ने उन्हें अगले कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं दी.
हालांकि यह अलग बात है कि चुनावी नतीजों के बाद टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की घटनाओं से सौहार्द का भाव तुरंत खत्म हो गया और भाजपा ने ममता के शपथग्रहण समारोह का बहिष्कार किया. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ममता को झिड़कने की कोशिश की और उन्हें 'पक्षपाती हितों से ऊपर उठने...शासन की एक नई परंपरा का निर्माण करने’ के लिए कहा.
लेकिन ममता की कामयाबी की अहमियत और कद को कुछ भी कमतर नहीं कर सकता. 2 मई को 30बी हरीश चटर्जी रोड पर उनके आवास की ओर जाता संकरा रास्ता टीएमसी के रंग में रंग गया क्योंकि उनके समर्थक एक-दूसरे को हरे गुलाल से सराबोर कर रहे थे. कुछ लोग एक फुटबॉल उछाल रहे थे तो कई अन्य डीजे बॉक्स पर बज रहे पार्टी के रैम्प गान ‘खेला होबे’ पर थिरक रहे थे. महामारी का कोई भय नहीं था और लाठियां चटकाते पुलिस वाले भी अपनी प्रिय मुख्यमंत्री की एक झलक पाने की कोशिश कर रहे लोगों को रोक नहीं पा रहे थे.
ममता अपनी पारंपरिक साधारण सूती साड़ी और मास्क पहने हुए आईं, जहां एक कोने में बंगाल का नक्शा बना था. उनके चेहरे पर बीते 50 दिनों की थकान और नंदीग्राम से उनकी हार की छाया भी दिखी. लेकिन विपरीत परिस्थितियों को बावजूद जीत हासिल करने की राहत भी उनके चेहरे पर थी. उन्होंने जीत का ‘वी’ चिह्न दिखाया और उनके बगल में उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी थे. भावुक दिख रही बंगाल की बेटी ने टीएमसी की जीत को बंगाल के लोगों, देश के लोगों और लोकतंत्र की जीत करार दिया.
शुरू से ही ममता ने 2021 की चुनावी संघर्ष को मां या मातृभूमि की रक्षा के जंग के तौर पर पेश कर दिया था. आक्रामक भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 फीसद वोट हिस्सेदारी हासिल करके खतरा उत्पन्न कर रही थी, वहीं ममता ने यह अफसाना गढ़ा कि बाहरी भाजपा बंगाल की संस्कृति, भावना, विरासत के साथ-साथ विभिन्न समुदायों, जातियों और वर्गों के बीच सौहार्दपूर्ण अस्तित्व के इतिहास को छिन्न-भिन्न करना चाहती है.
क्षेत्रीय भावनाओं को उभारने के साथ-साथ वे इस बड़े पहलू को भी नहीं भूलीं कि भाजपा की बेधड़क विस्तारवादी नीति और सभी शक्तियों को केंद्र तक सीमित करके देश की संघीय प्रवृत्ति को नुक्सान पहुंचा रही है, चाहे वह एक पार्टी-एक देश की उनकी चाह हो, या सीएए और एनआरसी हो या फिर—हदू राष्ट्र के निर्माण का उनकी व्यापक परियोजना.
ममता ने लोगों को बार-बार जोर देकर कहा, ‘‘बंगाल लोगों को आजादी का स्वाद दिलाएगा...2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराकर उसके शिकंजे से देश के लोगों का आजाद कराएगा.’’
भाजपा के आक्रामक ‘उखाड़ कर फेंक देंगे’ जैसे नैरेटिव या बिहार में भाजपा की जीत के बाद दिलीप घोष की चुनौती कि एबार बंगाल पारले शामला (अगली बारी बंगाल का, रोक सको तो रोक लो) के खिलाफ मातृभूमि को बचाने का नारा उपयुक्त पलटवार साबित हुआ. इससे ममता यह बताने में सफल रहीं कि भाजपा सत्ता-लोलुप पार्टी और किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना चाहती है, यह बार-बार कहा, ''हम बंगाल पर गुजरात का शासन नहीं होने देंगे या बंगाल को गुजरात नहीं बनने देंगे.’’
ममता यह भी बताने में सफल रहीं कि पान-गुटखा चबाते हुए रामनवमी और हनुमान जयंती पर जुलूस निकालते भाजपा के लोग, महिलाओं पर स्त्री-विरोधी कमेंट करते उनके नेता बंगाल के मुक्त-सोच और उदार-प्रवृत्ति वाली भावना पर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं.
ममता की केंद्रीय टीम के सदस्य पुर्णेंदु बोस कहते हैं, ‘‘वे भाजपा को अपनाने के खतरों के बारे में आगाह करने में कामयाब रहीं. भाजपा का यह कहना कि बंगाल सभी मोर्चों पर नाकाम रहा है, इसलिए पूर्ण परिवर्तन या सोनार बांग्ला की जरूरत है, लोगों के बीच अच्छा संदेश दे पाया. यह केवल ममता पर नहीं बल्कि बंगाली अस्मिता पर भी हमला था. भाजपा को वोट नहीं या फासीवादी आरएसएस-भाजपा के खिलाफ बंगाल जैसे अभियानों ने भी शिक्षित उदारवादियों, वाम बुद्धिजीवियों और मुक्त-सोच वाले युवाओं में भी भाजपा-विरोधी भावना को एकजुट करने में मदद की.’’
यहां तक कि अमित शाह के एबार बांग्ला (इस बार बंगाल) अभियान का मकसद ममता के कथित अल्पसंक्चयक तुष्टिकरण के खिलाफ-हिंदू भावनाओं को भड़काने का था, लेकिन बहुतायत मतदाताओं पर इसका असर नहीं हुआ.
प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमरिटस और सामाजिक विज्ञानी प्रशांत रे कहते हैं, ''बंगाल में ङ्क्षहदू और मुसलमान, दोनों के एक साथ रहने और साथ काम करने का लंबा इतिहास है. यहां तक कि सीमावर्ती इलाकों में भी, जहां लगातार घुसपैठ होती है, बाहरी लोग कठिन काम करने और आजीविका जुटाने की कोशिश करते हैं और इसे सीमावर्ती अर्थव्यवस्था के हिस्से के तौर पर देखा जाता है.
इसके अलावा ममता बनर्जी के कथित अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के डर की बजाए हिंदुओं को सांप्रदायिकता से ज्यादा डर रहता है जो भाजपा लाने की कोशिश कर रही थी जिससे जान और संपत्ति दोनों को नुक्सान पहुंचता.’’
इस बात को चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से बेहतर कोई नहीं भांप पाया. ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के थोड़े ही दिनों बाद किशोर को शामिल कर लिया था. यह वह समय था जब ममता जहां भी जाती थीं जय श्रीराम का नारा लगाती अक्रामक ब्रिगेड उनके पीछे पड़ी रहती, ‘कट मनी’ और तोलाबाजी के आरोप लग रहे थे और सत्ता विरोधी रुझान का खतरा बढ़ा हुआ था.
किशोर ने लगातार पत्रकारों को कहा था, ‘‘अगर भाजपा को जीतना है तो उसे हिंदुओं का 50-55 फीसद वोट हासिल करना होगा जो कि तकरीबन नामुमकिन है क्योंकि हिंदू, मुसलमानों की तरह वोट नहीं करते.’’
ममता को भी भरोसा था कि विभाजन और सांप्रदायिक दंगों के इतिहास वाला बंगाल सांप्रदायिक रास्ते पर नहीं जाएगा. यहां तक कि मोदी और शाह हिंदुत्व के तीर छोड़ रहे थे और मसलन, कह रहे थे कि ममता दुर्गा मूर्ति के विसर्जन पर मुहर्रम के जुलूस को तरजीह देती हैं. लेकिन ममता को पता था कि क्या करना चाहिए.
वे मानवतावाद, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के दर्शन पर केंद्रित थीं और धार्मिक सहिष्णुता की जरूरत पर बल दे रही थीं. टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय कहते हैं, ''उन्होंने ज्यादा श्लोक पढ़े और देवी-देवताओं को स्मरण किया, इसलिए कि वे अपने धार्मिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे और वोटों के ध्रुवीकरण करने के लिए खुद को ममता बेगम कह रहे आलोचकों का मुंह बंद कर सकें.’’
उन्होंने भाजपा के गेम प्लान का खुलासा करने और उसकी हवा निकालने के हर मौके को भुनाया. नंदीग्राम में अपने चुनावी अभियान के दौरान उन्होंने कहा, ''कुछ लोग नंदीग्राम को 70-30 (हिंदू-मुसलमान आबादी के अनुपात) में बांटना चाहते हैं, लेकिन मैं 100 फीसद समर्थन चाहती हूं...कोई भी इस जगह को धार्मिक रूप से विभाजित नहीं कर सकता.’’
राज्य की धर्मनिरपेक्ष धागे को सुरक्षित रखने के लिए हिंदुओं की बहुसंख्यक आबादी ने भाजपा को नकार दिया और भाजपा की ध्रुवीकरण की चाल उल्टी पड़ गई क्योंकि राज्य की 30 फीसद मुस्लिम आबादी ने इस बार एकमुश्त ममता को वोट दिया जिन्होंने पहले लेफ्ट-कांग्रेस को वोट दिया था. लेफ्ट-कांग्रेस की संयुक्त वोट हिस्सेदारी घटकर 8 फीसद हो गई जो 2016 के विधानसभा चुनावों के दौरान 32 फीसद और 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान 13 फीसद थी.
उत्तरी बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर जिलों वाले मुस्लिम बहुल इलाके के 49 सीटों में 39 सीटें टीएमसी के खाते में गईं. ऐसा ही दक्षिण बंगाल के उन जिलों में हुआ जहां इस समुदाय की आबादी अच्छी-खासी है. मसलन, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, बीरभूम और बर्दवान के हिस्सों में ममता को 89 में से 81 सीटें हासिल हुईं.
तीखे ध्रुवीकरण वाले नैरेटिव का एससी-एसटी (दलित-आदिवासी) वोटों पर भी उल्टा असर पड़ा, चाहे वह पश्चिम मिदनापुर, झारग्राम, पुरुलिया और बांकुरा के आदिवासी इलाके हों या फिर उत्तर 24 परगना और नादिया में मतुआ (बांग्लादेश से आए हुए एससी हिंदी शरणार्थी) समुदाय का वोट. 2019 में इन इलाकों में भाजपा को जीत मिली थी. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते और भाजपा ने अपना बाहुबल दिखाना शुरू किया तथा जय मारंग बुरू और जय जहार पर विश्वास करने वालों को जय श्रीराम बोलने के लिए मजबूर किया, आदिवासियों ने खुद को असुरक्षित महसूस किया और भाजपा को अपनी अस्मिता और विशिष्ट संस्कृति के लिए खतरे के रूप में देखना शुरू कर दिया.
झारग्राम से टीएमसी उम्मीदवार बिरबहा हांसदा कहते हैं कि बाइक पर बैठकर लोगों को आतंकित करने के लिए ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाते आदिवासी युवकों को लोग संदेह की दृष्टि से देखने लगे थे. वे कहते हैं, ''वे (भाजपा) हमारे दैनिक क्रियाकलापों में भी हस्तक्षेप कर रहे थे और हमारे आदिवासी जीवन को प्रभावित कर रहे थे.’’ भाजपा के हिंदुत्व के एकरूप वर्जन को खारिज करते हुए आदिवासी इलाकों ने उसका मुंहतोड़ जवाब दिया. पश्चिम मिदनापुर के 15 में से 14 सीटों पर, झारग्राम की सभी चार और बांकुरा तथा पुरुलिया की चार-चार सीटों पर, कुल 21 सीटों में से टीएमसी ने जीत हासिल की. इन दो जिलों में 2019 में टीएमसी का खाता भी नहीं खुल पाया था.
ममता ने दो दर्जन से अधिक सामाजिक कल्याण योजनाओं को लागू किया था. इनके जरिये ममता का ध्यान राज्य के 10 करोड़ लोगों में से 8 करोड़ लोगों की पारिवारिक आय बढ़ाने पर था. इससे ममता की साख में वृद्धि भी हुई. सब्सिडी वाला चावल, मुफ्त राशन, मुफ्त इलाज और प्रति परिवार 5 लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा कवरेज से लेकर साइकिल, उच्च शिक्षा के लिए वजीफा, बेरोजगारी भत्ता, शादी के लिए आर्थिक मदद और यहां तक घरेलू कामकाज संभालने वालों के लिए पॉकेट मनी तक, राज्य का खजाना इस पर खर्च किया जा रहा था.
ग्रामीण, अर्द्धशहरी और निम्न मध्यवर्ग शहरी परिवारों को अब सालाना 12,000-20,000 रुपए तक मिल रहा था. यह बीपीएल आबादी के आंकड़ों से भी स्पष्ट था. गरीबी में जीवन बसर कर रही आबादी 2011-12 में 20 फीसद थी (जब ममता पहली बार सत्ता में आई थीं) जो 2017-18 में घटकर 14 फीसद हो गई. ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च 5 फीसद बढ़ गया, जिससे संकेत मिलता है कि लोग अब भोजन और रोजाना के राशन से इतर भी खर्च कर सकते हैं.
राज्य के खजाने पर भारी दबाव है, सालाना 12,000 करोड़ रुपए का, लेकिन इससे ममता को चुनावी लाभ सूद समेत मिल गया. बंगाल की महिलाएं जो कुल मतदाताओं का करीब पचास फीसद हैं, ममता को वोट देने के लिए बड़ी संख्या में उमड़ीं. ‘बांग्ला निजेर मेये केई चाई (बंगाल को अपनी बेटी ही चाहिए)’ का भी जनता पर बड़ा असर पड़ा. बोस कहते हैं, ‘‘हमने अपना फोकस दीदी से बदलकर बांग्लार मेये (बंगाल की बेटी) पर कर दिया. बांग्लार मेये नारे ने ममता को बंगाल की बेटी के तौर पर पेश किया जिन्हें चुनना हर व्यक्ति का कर्तव्य था.’’
आखिरकार, टीएमसी की पूरी चुनावी रणनीति के निर्माण का श्रेय प्रशांत किशोर को जाता है. दो बार की सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी रुझान, भाजपा की ओर से ममता पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण करने वाला बताने की कोशिश को बेअसर करने से लेकर प्रशासनिक डिलिवरी व्यवस्था को सुधारने और जनता-हितैषी सरकार की तस्वीर पेश करने की रणनीति में किशोर की महत्वपूर्ण भूमिका रही. करीब एक साल और 10 महीने तक इस रणनीतिकार ने ममता के पक्ष में माहौल बनाने के लिए अथक परिश्रम किया.
साल 2019 में 12 लोकसभा सीटों को गंवाना ममता के लिए सबसे बड़ा वरदान सरीखा साबित हुआ. इससे किशोर को पार्टी के कामकाज में मौजूद खामियों का पता करने और उन्हें हल करने के लिए खुली छूट मिल गई. किशोर की टीम ने विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पड़ताल की कि आखिर लोग टीएमसी से नाराज क्यों हैं. अधिकतर मामलों में जमीन पर मौजूद नेताओं और पार्टी पदाधिकारियों की उदासीनता और असंवेदनशीलता को जिम्मेदार पाया गया.
सरकार को अधिक उत्तरदायी बनाने के लिए किशोर ने ‘दीदी के बोलो’ अभियान चलवाया. इसके तहत लोगों को फोन कॉल के जरिये सीधे दीदी को अपनी बात कहने का मौका मिला, चाहे पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार का खुलासा हो, स्थानीय नेताओं की शिकायत हो या फिर कट मनी की वसूली. 500-दिन वाले इस अभियान में 28 लोगों ने कॉल किया. इससे दुआरे सरकार, पराये समाधान, जय जोहार और तपोशिली बंधु जैसी कई योजनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ.
ममता ने इस कठिन चुनावी जंग को जीत लिया है, लेकिन इस कार्यकाल में उन्हें सावधानीपूर्वक आगे बढऩा होगा. अमित शाह ने जोर देकर अपनी पार्टी को 200 सीटें जीतने का मंसूबा बनाया था जो धराशायी हो गया. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य में भाजपा ने अपनी जगह जरूरी बनाई है और लेफ्ट तथा कांग्रेस को पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिया है. दीदी को अपनी लड़ाकू छवि से आगे बढऩा होगा.
मिसाल के तौर पर, उन्होंने धमकी दी है कि अगर राज्य को मुफ्त वैक्सीन नहीं मिलता है तो वह धरने पर बैठ जाएंगी, लेकिन वे अब केवल धरना पर आश्रित नहीं रह सकतीं. अपने राज्य की आकांक्षाओं को पूरा करने और देशभर की विपक्षी ताकतों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए ममता को अब उच्च कोटि के सियासी परिपक्वता का परिचय देना होगा. राज्य को कोविड की घातक उभार से निबटने के लिए फंड की जरूरत होगी, ऐसे में उनका सबसे पहला काम केंद्र से जीएसटी के बकाए की मांग करना होगा.
विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं को जारी रखने के लिए 12,060 करोड़ रुपए की जरूरत होगी. सरकार पर पहले से ही 4.9 लाख करोड़ रुपए के कर्ज का बोझ है. उन्होंने पीपीई, दस्ताने और मास्क बनाने की इकाइयों और सिंगूर में कृषि संबंधित उद्योगों को स्थापित करने का संकल्प जताया है. टाटा मोटर्स की नैनो फैक्टरी सिंगूर छोड़कर बाहर चली गई थी और पश्चिम बंगाल उद्योगों के लिए अब भी कब्रिस्तान सरीखा बना हुआ है. ऐसे में खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. ठ्ठ