खास रपटः बर्फीली सरहद पर गरमागरमी

पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना की एक जवाबी कार्रवाई ने चीन की पीएलए को चौंकाया, मगर तनाव इस कदर बढ़ा कि दोनों ओर से मोर्चे पर सैनिक डटे, टकराव की आशंका बढ़ी, चुशुल बन सकता है विवाद सुलझाने या बड़े टकराव का सबब

खतरनाक मंसूबे 8 सितंबर को एलएसी पर भारत के सैनिकों को डराने के लिए मध्ययुगीन औजारों के साथ चीन के फौजी
खतरनाक मंसूबे 8 सितंबर को एलएसी पर भारत के सैनिकों को डराने के लिए मध्ययुगीन औजारों के साथ चीन के फौजी

लद्दाख में 1962 के युद्ध के बाद पहली दफा दो डिविजन और टैंक के साथ आगे आई चीन की सेना के साथ हुई झड़प के चार महीने बाद भारतीय सेना ने एक जवाबी कार्रवाई की और इसके लिए उसने लेह से 100 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में महत्वपूर्ण चुशुल सब-सेक्टर को चुना. 29 अगस्त की देर शाम कार्रवाई के आदेश मिले तो सेना के विशेष बलों की सैकड़ों अल्पाइन इकाइयां और गुप्त स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के मूल तिब्बतियों ने पैंगोंग झील के दक्षिण हिस्से में पहाडिय़ों पर अपनी धीमी चढ़ाई शुरू की.

जवानों को उनके पर्वतारोहण कौशल के कारण चुना गया था और उनकी पीठ पर लदा बैग पानी और सूखे राशन से भरा था. उनके पास एसॉल्ट राइफलें और गोला-बारूद, रेडियो सेट, नाइट विजन डिवाइस और थर्मल इमेजिंग डिवाइस वगैरह थे. वे लंबी तैयारी के साथ मिशन पर थे. चढ़ाई में उन्हें दो से तीन घंटे लगे और उनका उद्देश्य पैंगोंग झील के दक्षिण में 40 किलोमीटर लंबी पर्वत शृंखला पर कब्जा करना था.

थाकुंग, हेलमेट टॉप, ब्लैक टॉप, गुरुंग हिल, मागर हिल, मुखपरी, रेजांग ला और रेचिन ला—ये सभी समुद्र तल से 17,000 और 18,000 फुट की ऊंचाई पर हैं और उस इलाके के भीतर पड़ते हैं जिन्हें भारत एलएसी मानता है. इनमें से दो का नाम गोरखाओं की गुरुंग और मागर जातियों के नाम पर पड़ा है. यह उन सैनिकों का स्मरण कराता है जिन्होंने 1962 के भारत-चीन सीमा युद्ध के दौरान यहां अद्भु त शौर्य का परिचय दिया था.

रात के अंधेरे में चुपके से की गई इस चढ़ाई के दौरान एकमात्र हताहत एक एसएफएफ के कंपनी लीडर न्यीमा तेनजिन थे, जो ऐंटी-पर्सनल माइन (एक तरह की बारूदी सुरंग) के विस्फोट में शहीद हो गए. भारतीय सैनिकों ने 1962 में चीनी सैनिकों को रोकने के लिए ये सुरंगें बिछाई गई थीं. स्पेशल इकाई ने चोटी पर पहुंचकर पड़ाव डाला और वहां मौजूद पत्थरों से बहुत तेजी से संगर बनाए जैसा कि उनके साथियों ने लगभग आधी सदी पहले किया था. 

स्पेशल फोर्सेज ने 30 अगस्त को अपना मिशन पूरा करने का कूट संकेत बेस कैंप को भेजा तो लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह की अगुआई वाले 14 कोर के लेह मुख्यालय में राहत की लहर दौड़ गई. लद्दाख से लगी तकरीबन 840 किलोमीटर के एलएसी की रखवाली 14 कोर करता है.

पीएलए ने चार महीने पहले एलएसी पर सैनिकों और टैंकों के दो डिविजन भेजकर घुसपैठ की थी और भारतीय सेना के पास खेलने के लिए कोई कार्ड नहीं था. इसने सैन्य स्तर पर एक दर्जन से अधिक दौर की वार्ता में 6 जून को हुए समझौते का सम्मान करने के लिए पीएलए को समझाने के कई असफल प्रयास किए थे.

पीएलए ने पैंगोंग झील पर गोगरा पोस्ट और फिंगर 4 से हिलने से साफ इनकार कर दिया. अब, बस एक रात में समीकरण बदल गया. स्पेशल फोर्सेज की एक ब्रिगेड— 3,000 से अधिक कमांडो— का इस्तेमाल करके ऑपरेशन को अंजाम दिया गया और यह भारतीय सेना द्वारा स्पेशल फोर्सेज की सबसे बड़ी तैनाती थी. 

पीएलए के लिए 1986 के बाद का यह सबसे बड़ा धक्का है, जब जनरल सुंदरजी ने अरुणाचल प्रदेश के सुमदोरोंग चू में चीनी सैनिकों का सामना करने के लिए हेलिकॉप्टर की मदद से पूरी एक ब्रिगेड उतार दी थी और इससे सरकार को चीन को वार्ता की मेज पर लाने और सौदेबाजी में बड़ी मदद मिली थी.

31 अगस्त को सेना के एक बयान में कहा गया था कि चुशुल सब-सेक्टर में एलएसी के भीतर राजनैतिक रूप से ऊंचे स्थानों पर कब्जा करके जमीनी स्थिति को बदलने के चीनी इरादों को नाकाम कर दिया था. इस गोपनीय कार्रवाई के बाद नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास, चेंगदू स्थित चीन के पश्चिमी थिएटर कमान और बीजिंग में विदेश मंत्रालय ने बयानों की झड़ी लगा दी.

बीजिंग में एक चीनी प्रवक्ता ने इसे 'गंभीर उकसावे’ की संज्ञा दी, और भारत पर 'चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता, द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन करने, महत्वपूर्ण आम सहमति को भंग करने और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सद्भाव को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश’ का आरोप लगाया. संक्षेप में, ठीक ऐसे ही बयान पिछले चार महीनों में भारत की ओर से जारी होते आ रहे थे.

दक्षिणी लद्दाख में स्थिति को तनावपूर्ण बताना जमीनी हकीकत को कम करके बताना होगा. फिलहाल स्थिति 15 जून को गलवान घाटी में हुई घटना जहां दोनों सेनाओं के बीच एक हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक और एक अनिर्दिष्ट संख्या में पीएलए के लोग मारे गए थे, से भी खराब है. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी स्थिति को इस प्रकार समझाते हैं.

कई युनिट्स अलग-थलग जगहों पर तैनात हैं, जहां सेना केंद्रीकृत कमांड और नियंत्रण का इस्तेमाल नहीं करती है. 15 जून को गलवान घाटी में टकराव के बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच व्यवहार के नियम (जिसने तय किया कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को कैसे जवाब देंगे) बदल गए हैं. वे कहते हैं, ''इससे पहले, हम शायद ही कभी गश्त पर हथियार लेकर जाते थे, लेकिन अब दोनों पक्ष भारी हथियारों से लैस हैं. अगर कोई खतरनाक स्थिति बनती है, तो मौके पर मौजूद हमारे सैनिक वह करेंगे जो उस समय उन्हें सही लगेगा...’’

भले ही सेना ने नहीं बताया लेकिन यह ऑपरेशन दरअसल 'जैसे को तैसा’  वाला कदम था पर उसका उद्देश्य था दुश्मन को करारा जवाब देना और उसके इलाके को कब्जा करके उसे पीछे हटने को विवश करना. चुशुल में, इस कदम का इस्तेमाल चीन को पैंगोंग त्सो में फिंगर 4 से पीछे हटने के लिए मजबूर करने में किया जा सकता है, जहां चीन ने आठ किमी भीतर तक घुसपैठ की है और गलवान घाटी के पास गोगरा पोस्ट से पीछे हटने को विवश करना जहां वह दो किमी बढ़ गया है. 

फिर भी एक दूसरे की गोली की जद में भारी हथियारों से लैस सैनिकों, जिन्हें आर्टिलरी और टैंक की मदद भी हासिल है, की मौजूदगी के बीच इस ऑपरेशन के जरिए भारत ने युद्ध को टालने के लिए एक जुआ खेला है. भारतीय सेना की ओर से जारी की गई तस्वीरों में पीएलए के सैनिकों को मध्यकालीन चीनी पुलिस के हथियारों से लैस दिखाया गया है, जिन्हें गुआनडोस कहा जाता है, उसमें एक मोटे डंडे पर दाभी जैसा धारदार हथियार लगा हुआ है. यह बताता है कि वे लड़ाई को आमादा हैं. 
सात सितंबर को, भारत और चीन के बीच 45 वर्षों में एलएसी पर पहली गोलियां चलाई गईं. भारतीय सेना ने पीएलए पर आरोप लगाया कि उसने मुखपरी में भारतीय सैनिकों को डराने के लिए हवा में गोलियां चलाईं. आखिरी बार गोलीबारी 20 अक्तूबर, 1975 को हुई थी, तब पीएलए ने अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला में असम राइफल्स के गश्ती दल पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें चार सैनिक मारे गए थे.

दोनों पक्षों ने उसके बाद सैन्य भरोसा बहाली उपायों (सीबीएम) के समझौते पर हस्ताक्षर किया और उसका पालन करते आ रहे हैं. इसमें सैनिकों के आचरण को नियंत्रित करने और आग्नेयास्त्रों को साथ रखने से मना करने वाले कई अनुच्छेद शामिल हैं. 

सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि चीन अरुणाचल प्रदेश सहित 4,400 किलोमीटर लंबी एलएसी के अन्य क्षेत्रों में सैन्य आक्रमण करने और अपनी जमीन को वापस लेने के लिए जवाबी कार्रवाई जैसे कई विकल्पों का इस्तेमाल कर सकता है. इसमें सैन्य झड़प की भी गुंजाइश है.

उत्तरी कमान के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग, हालांकि मानते हैं कि चुशुल में ही चीन के आक्रामक होने की ही अधिक संभावना है. वे कहते हैं, ''ब्लैक टॉप, रेचिन ला और मुखपरी पर चीन के जवाबी हमला करने की सबसे अधिक संभावना है. हमारी तैनाती अभी इन स्थानों पर चल ही रही है और इसलिए वे जल्द से जल्द इन इलाकों को फिर से कब्जे में लेना चाहेंगे.’’ 

पूर्व महानिदेशक सैन्य अभियान लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डी.बी. शेखटकर इससे असहमत हैं. वे कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि चीनी लद्दाख में आक्रमण करने की स्थिति में हैं. दौलत बेग ओल्डी (लद्दाख में सेना की सबसे उत्तरी पोस्ट) और गलवान को छोड़कर, हम हर जगह ऊंचाई पर बैठे हैं.

पहाड़ी युद्ध में,  आप ऊंचे पर हैं, तो आप पहले दौर में जीत चुके हैं.’’ अगले दो महीने भारतीय पक्ष के लिए महत्वपूर्ण होंगे. अक्तूबर और नवंबर को हिमालय में 'अभियान के मौसम’ के रूप में देखा जाता है. यही कारण है कि पीएलए ने 1962 में अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में हमले के लिए इन महीनों को ही चुना था.’’ 

गतिरोध को हल करने के लिए अब सैन्य और राजनयिक स्तर पर नए दौर की बातचीत शुरू हो सकती है. 10 सितंबर को मॉस्को में चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुलाकात हुई. दोनों पक्षों के कोर कमांडरों की जल्दी मुलाकात होगी. 

पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त जी. पार्थसारथी इस वार्ता में कोई खास सफलता की उम्मीद नहीं रखते. वे कहते हैं, ''चीन 1962 से हमारे साथ आंखमिचौली खेल रहा है; वे कहते हैं कि एलएसी का सम्मान करेंगे लेकिन उन्होंने कभी इसे न तो परिभाषित किया न ही इसे खींचा है. हर बार वे अपने लाभ के लिए दबाव बिंदु के रूप में इसका उपयोग करते हैं. हमने उनके साथ वही खेल नहीं खेला, इसलिए उन्होंने प्रत्येक चरण में थोड़ी बढ़त बनाई है.’’

चोटियों पर कब्जा
पहाड़ों पर लड़ाई का एक अहम उसूल यह है कि चोटियों और दर्रों पर कब्जा कर लो. जिन्हें सेना 'एलपी/ओपी चौकियां’ (सुनने वाली चौकियां, देखने वाली चौकियां) कहती है और जिन्हें अब संगरों में जवानों के छोटे-छोटे जत्थे संभालते हैं, वहां से वह न केवल दुश्मन पर लगातार निगाह रख सकती है बल्कि जंग के वक्त दुश्मन ठिकानों पर सटीक निशाने लगाकर तोप के गोले दाग सकती है.

ऊंची चोटियों से नजारा, जैसा कि चुशुल में दो कार्यकाल काम कर चुके ब्रिगेडियर एन.सी. जोशी (सेवानिवृत्त) कहते हैं, 'होश उड़ा देने वाला’ है. वे कहते हैं, ''आपको और कुछ नहीं बल्कि ठेठ तिब्बत तक मैदान ही मैदान दिखाई देते हैं.’’

इन पहाडिय़ों की चोटियों पर मचानों से भारतीय सैनिक जी219 शिनजियांग-तिब्बत रोड और यहां तक कि पहाड़ों में दो किलोमीटर चौड़ी घाटी स्पंगुर दर्रे में पीएलए का मोल्दो गैरिसन भी देख सकते हैं. सेना के अधिकारी कहते हैं कि दर्रों पर कब्जा चीनियों के लिए रुकावटें पैदा करता है, ''हमने उनके लिए इस इलाके को वापस लेने की लागत बढ़ा दी है.’’

चुशुल का चयन इत्तफाकन नहीं था. चुशुल में इतिहास, भूगोल और भू-राजनीति एक दूसरे को काटते हुए गुजरते हैं. यह लद्दाख और तिब्बत के बीच सैन्य दरवाजा है. इसका फायदा ठीक-ठीक किसे मिलेगा, यह इस बात से तय होगा कि कौन-सा पक्ष पहाड़ी दर्रों में घूमने के लिए जरूरी सैन्य ताकत लगा सकता है.

1841 में ये जम्मू के डोगरा शासक गुलाब सिंह के सेनापति और लद्दाख और बल्तिस्तान के विजेता जोरावर सिंह थे, जिन्होंने तिब्बती पठार पर चढऩे के लिए चुशुल का दरवाज चुना था. वहां वे चीनी और तिब्बती सेना के साथ लड़ाई में मारे गए थे. डोगराओं और तिब्बतियों ने 1842 में चुशुल की संधि पर दस्तखत किए थे और इसके जरिए लद्दाख और तिब्बत के बीच सरहद की लकीर खींच दी थी.

अक्तूबर 1962 में पीएलए स्पगुर दर्रे से होते हुए अचानक आ धमकी थी और उसने बहुत कम सैनिकों की भारतीय किलेबंदी पर फतह हासिल कर ली थी. पीएलए के आगे बढऩे के साथ भारतीय सैनिकों छह एएमएक्स-13 हल्के टैंक हवाई जहाजों से उठाकर ले जाने पड़े थे, जो दुनिया की सबसे ऊंची टैंक तैनाती थी, ताकि चीनी सेना की पहुंच से लेह को बचा सकें.

मजबूती से जमे 120 भारतीय सिपाहियों ने आगे बढ़ती पीएलए के खिलाफ पीछे हटते हुए भीषण लड़ाई लड़ी थी जब तक कि एयरफील्ड की रक्षा के लिए आखिरी आदमी तक नहीं गिर गया. जिस घाटी में उन्होंने चीनियों से आखिरी मोर्चा लिया था, वह रिजांग ला थी, चार महीनों से चले आ रहे सैन्य गतिरोध के बढऩे या आखिरकार इसके समाधान की कुंजी चुशुल में ही है. 

''चीन 1962 से ही हमें लगातार भरमा रहा है; उसने एलएसी को कभी सही ढंग से परिभाषित नहीं किया, हर बार अपने फायदे में इसका इस्तेमाल करता है... हमने उनके साथ वैसा ही खेल नहीं खेला तो हर बार वे कुछ फायदा उठा लेते रहे हैं.’’
जी. पार्थसारथी
पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त

आगे का कदम?
मॉस्को में 10 सितंबर को शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ
विदेश मंत्री एस. जयशंकर

चोटियों से पहरेदारी
भारतीय सेना और विशेष इकाइयां ऐसी चोटियों पर काबिज हो गईं, जहां से लद्दाख के दक्षिण-पूर्व में
चीन की चौकी दिखती है. लिहाजा, भारतीय निगरानी चौकी कैसी दिखेगी

आर्कटिक टेंट
दो लोगों के लायक ऊंची चोटियों के टेंट, जो हवा और ठंड से बचाता है

स्पेस हीटिंग डिवाइस
टेंट को गरम रखने और भोजन पकाने का बहुपयोगी उपकरण. सौर ऊर्जा और बैटरी से चलता है

थर्मल इमेजर
दिन/रात मध्यम दूरी तक निगरानी के लिए कैमरा.  इलेक्ट्रॉनिक संयंत्र, डिजिटल जूम, वीडियो और इमेज रिकॉर्डिंग क्षमता. दायरा: 5 किमी जीपीएस, लेजर रेंज-फाइंडर और कम्पास भी लगा हुआ

बैरेट एम82 ऐंटी-मटीरियल राइफल
12.7 मिमी.की गोली दागती है, 2 किमी दूर तक निशाना भेद सकती है. दिन-रात हर समय कारगर

वीएचएफ सेट बेस कैंप से संपर्क और बातचीत के लिए हाड़ जमा देने वाली ठंड के कपड़े
हल्के, दोहरी परत वाले पॉलिएस्टर-नाइलॉन की चोटियों का पहनावा. करीब 14,000 फुट ऊंचाई पर 40 किमी/घंटे रफ्तार वाली हवा में कारगर. शून्य से 20 डिग्री कम तापमान में भी सैनिक की सुरक्षा आश्वस्त

स्लीपिंग बैग
दोहरी परत वाले. शून्य से 50 डिग्री कम तापमान और 40 किमी/घंटा रक्रतार वाली हवा में कारगर

हथियार एसॉल्ट और स्नाइपर राइफल
सूखा राशन

खाने के लिए तैयार उच्च कैलोरी की पैकेटबंद सामग्री, ताजा फल, सब्जी, मेवा और चॉकलेट. ऊंची चोटियों पर हर सैनिक को रोजाना करीब 4,000 किलो कैलोरी की जरूरत पड़ती है.

Read more!