मुजरिम-राजनेता-पुलिस गठजोड़ का नया विकास
आठ पुलिस अफसरों की शहादत का दोषी वह सिस्टम है जिसमें विकास दुबे जैसे अपराधियों को पनपने और फलने-फूलने का मौका मिलता है.

कानपुर में बिल्हौर के पुलिस क्षेत्राधिकारी रहे और बदमाशों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए देवेंद्र मिश्र पिछले एक साल से पुलिस संरक्षण में चल रहे जुए के अड्डों के खिलाफ अभियान छेड़े हुए थे. अपराधियों के खिलाफ इस अभियान में देवेंद्र को कानपुर जिला मुख्यालय से करीब 38 किलोमीटर दूर चौबेपुर थाना क्षेत्र के तत्कालीन थानाध्यक्ष विनय तिवारी का कोई सहयोग नहीं मिल रहा था.
पिछले वर्ष सितंबर में देवेंद्र ने विनय तिवारी की अपराधियों के साथ गठजोड़ की पहली रिपोर्ट कानपुर के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अनंत देव को भेजी. इसके बाद देवेंद्र समय-समय पर चौबेपुर थानाध्यक्ष के खिलाफ रिपोर्ट भेजते रहे लेकिन किसी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. होली के पहले 7 मार्च को भी देवेंद्र ने एसएसपी से चौबेपुर थानाध्यक्ष की अपराधियों से मिलीभगत की जानकारी दी थी लेकिन अनंत देव ने कोई कार्रवाई नहीं की.
इसी बीच लाकडाउन के दौरान 16 जून को बिल्हौर के विधायक भगवती सागर ने भी पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को पत्र लिखकर चौबेपुर थानाध्यक्ष विनय तिवारी की अपराधियों के साथ साठ-गांठ की शिकायत की थी जिस पर 28 जून को डीजीपी कार्यालय से एक टीम जांच करने कानपुर पहुंची थी. इसी बीच 16 जून को अनंत देव स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के डीआइजी बन गए और दिनेक कुमार पी कानपुर के नए एसएसपी बने.
विनय तिवारी के बढ़े हौसलों के पीछे चौबेपुर थानाक्षेत्र में आने वाले बिकरू गांव का रहने वाला और 10 जुलाई को पुलिस मुठभेड़ में मारे गए अपराधी विकास दुबे का खुला संरक्षण था. सभी राजनैतिक पार्टियों में संपर्क रखने वाले विकास के खिलाफ जमीन के विवाद में बिकरू के पड़ोसी गांव मोहनी नेवादा के राहुल तिवारी ने पहली जुलाई को चौबेपुर थाने में अपहरण और हत्या के प्रयास की तहरीर दी थी.
तत्कालीन चौबेपुर थानाध्यक्ष ने रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी की तो कानपुर के एसएसपी दिनेश कुमार पी. को हस्तक्षेप करना पड़़ा. एसएसपी ने दो जुलाई की रात 9 बजे सीओ बिल्हौर देवेंद्र मिश्र की अगुआई में कानपुर के तीन थानों शिवराजपुर, चौबेपुर और बिठूर थानाध्यक्षों के साथ 20 पुलिसकर्मियों की टीम विकास दुबे की गिरफ्तारी के लिए भेजी. इधर एसएसपी विकास को पकडऩे के लिए टीम तैयार कर रहे थे, उधर पुलिस की पूरी तैयारी की जानकारी विनय तिवारी ने विकास को दे दी.
विकास को पता चल गया कि तीन थानों की पुलिस टीम का नेतृत्व क्षेत्राधिकारी (सीओ) देवेंद्र मिश्र कर रहे है. विकास अलर्ट हो गया. उसने आसपास के इलाकों से करीब 40 असलहाधारी बदमाशों को बिकरू गांव में अपने घर पर बुला लिया. इन सभी बदमाशों को विकास ने छत पर खड़ा कर दिया. पुलिस का रास्ता रोकने के लिए विकास के घर की ओर जाने वाली सड़क पर बीचोबीच जेसीबी खड़ी कर दी.
विकास को पुलिस के मूवमेंट की पल-पल की जानकारी हो रही थी. रात करीब साढ़े बारह बजे जैसे की पुलिस टीम बिकरू में घुसी चौबेपुर थाना क्षेत्र से किसी सिपाही ने गांव में बिजली सप्लाई करने वाले शिवली पावर सब स्टेशन पर फोन करके फाल्ट का हवाला देकर बिजली बंद करवा दी.
रात करीब सवा एक बजे जैसे ही पुलिस टीम गाडिय़ां छोड़कर जैसे ही जेसीबी के आगे बढ़ी पहले से छतों पर घात लगाए बैठे विकास दुबे और उसके गुर्गों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दी. अप्रत्याशित हमले से पुलिस संभल न सकी. चारों तरफ चल रही बदमाशों की गोलियों से सीओ देवेंद्र मिश्र, शिवराजपुर थानाध्यक्ष महेश यादव, मंधना चौकी प्रभारी अनूप कुमार सिंह, सब इंस्पेक्टर नेबूलाल, सिपाही जितेंद्र पाल, सुल्तान सिंह, बबलू कुमार और राहुल कुमार शहीद हो गए.
करीब आधे घंटे तक चली इस मुठभेड़ के बाद सभी हमलावर अपने हथियार समेत मौके से फरार हो गए. यूपी में यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या पुलिसकर्मी किसी एक आपरेशन में शहीद हुए हों. इस सनसनीखेज हत्याकांड की जानकारी मिलने के बाद अपराधियों की धड़पकड़ के लिए कानपुर के पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) मोहित अग्रवाल ने तीन टीमें बनाईं.
पुलिसकर्मियों की हत्या के सात घंटे बाद पुलिस ने बिकरू के पड़ोसी गांव कांशीराम नवादा के एक मंदिर में छिपे विकास दुबे का दाहिना हाथ रहे चचेरे भाई अतुल दुबे और रिश्ते में मामा लगने वाले पड़ोसी प्रेम कुमार पांडेय को मुठभेड़ में ढेर कर दिया. इस दहला देने वाली घटना के बाद कानपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शहीद पुलिसकर्मियों के परिवार को एक-एक करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता और असाधारण पेंशन के साथ एक-एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की.
डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी ने घटना के बाद से फरार हुए विकास दुबे की तलाश में 50 से अधिक टीमें लगाई. यह टीमें नेपाल सीमा पर निगरानी के साथ यूपी के पड़ोसी राज्यों दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार के पुलिस अधिकारियों के साथ संपर्क बनाकर विकास की खोजबीन में लगी ही थी कि विकास सबकी आंखों में धूल झोंक कर उज्जैन के महाकाल मंदिर में हाजिर हो गया.
अपराधी की मुखबिर बनी खाकी
कानपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) मोहित अग्रवाल कहते हैं, ''सीओ देवेंद्र मिश्र की शिकायत पर थानेदार पर कार्रवाई हो जाती तो शायद मामला यहां तक नहीं पहुंचता. थानेदार की हर कदम पर गलती सामने आई है जिसकी जांच की जा रही है.’’ इस पूरे प्रकरण में कानपुर के पूर्व एसएसपी अनंत देव की भूमिका संदिग्ध पाए जाने पर प्रदेश सरकार ने इन्हें डीआइजी एसटीएफ के पद से हटाकर मुरादाबाद पीएसी का डीआइजी बना दिया है.
अब एसटीएफ अनंत देव से भी पूछताछ की तैयारी कर रही है कि उन्होंने शहीद सीओ देवेंद्र मिश्र की रिपोर्ट पर क्यों कार्रवाई नहीं की थी? यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विक्रम सिंह कहते हैं, ''कानपुर की घटना खाकी, खादी और अपराधी के गठजोड़ का सबसे बड़ा सबूत है. सिस्टम ने विकास का पूरा साथ दिया. विकास को पुलिस की दबिश की जानकारी थी लेकिन पुलिस को यह नहीं पता था कि विकास के घर बड़ी संख्या में हथियारबंद पहुंच चुके हैं.’’
हालांकि विकास से पुलिस दबिश की मुखबिरी करने के आरोप में चौबेपुर थानाध्यक्ष विनय तिवारी को योगी सरकार ने निलंबित कर गिरफ्तार कर लिया है. घटना की जांच में जुटी स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) को तिवारी समेत करीब तीन दर्जन पुलिसकर्मियों के मोबाइल फोन के काल डिटेल रिपोर्ट (सीडीआर) से पता चला है कि वे विकास दुबे के संपर्क में थे. इस पर कार्रवाई करते हुए कानपुर के एसएसपी दिनेश कुमार पी. ने चौबेपुर थाने के सभी 60 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया है.
पुलिस को शक था कि बिकरू गांव में दो बीघे में फैले अपने आलीशान घर में विकास ने बड़ी संख्या में हथियार और गोला बारूद जमा कर रखे हैं. इस पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने विकास का घर जमीदोंज कर दिया. अग्रवाल कहते है, ''पुलिस ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 100 के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए जेसीबी से विकास के घर की दीवारों को तोड़कर देखा है. पुलिस को घर में छुपा कर रखे गए हथियार, बम और गोलाबारूद मिले हैं.’’
अपराधी के सामने पुलिस नतमस्तक
पुलिस और राजनीति के साथ अपराधी विकास के गठजोड़ की दास्तान 30 वर्ष पहले शुरू होती है जब कानपुर के शिवली थाने में वर्ष 1990 में विकास पर पहला मुकदमा मारपीट का दर्ज होता है. इसके बाद साल-दर-साल उसका आपराधिक ग्राफ बढ़ता गया. वर्ष 2000 में विकास ने जमीन के विवाद में कानपुर में ताराचंद इंटर कालेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य सिद्धेश्वर पांडेय की गोली मारकर हत्या कर दी थी.
इसमें विकास को नामजद किया गया था. गवाहों और सबूतों के आधार पर कोर्ट ने उसे उम्र कैद की सजा सुनाई थी. पिछले वर्ष सितंबर में विकास हाइकोर्ट से जमानत पर छूटा था. बिकरू गांव और आसपास के इलाकों में विकास का खौफ उस वक्त बढ़ा जब उसने 12 अक्तूबर 2001 को शिवली थाने में तत्कालीन श्रम संविदा बोर्ड के चेयरमैन (राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त) संतोष शुक्ल की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस मामले में शुक्ल के भाई मनोज शुक्ल ने विकास के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखाई थी. चार महीने बाद पुलिस को गच्चा देकर विकास कोर्ट में हाजिर हो गया था.
वह जेल भेजा गया पर विकास का रसूख कानून पर भारी पड़ा. भाजपा नेता की हत्या के चश्मदीद कुल 16 सिपाही, दरोगा और विवेचक कोर्ट में मुकर गए. नतीजा यह हुआ कि विकास 2006 में कानपुर देहात की अदालत से बरी हो गया. कानपुर के वरिष्ठ क्रिमिनल वकील राकेश वैश्य कहते हैं, ''विकास ने राजनैतिक और पुलिस से दोस्ती के चलते संतोष शुक्ल हत्याकांड में कोर्ट में सरेंडर किया था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह गवाहों के मुकरने से बरी हुआ तो सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाइ कोर्ट में कोई अपील नहीं की. विकास की सियासी पहुंच के चलते संतोष शुक्ल हत्याकांड फाइलों में दफन हो गया.’’
अपराध की दुनिया में कदम रखने के बाद इसी राजनैतिक संरक्षण का फायदा उठाकर विकास ने जमीन की सौदेबाजी को अपना मुख्य धंधा बना लिया. बेशकीमती जमीनों के मालिकों को धमकाकर उनकी जमीनों को कम कीमत में खरीद लेना उसका शगल था. विकास को राजनैतिक संरक्षण देने वालों ने उसके इसी शगल का फायदा उठाया और विकास एक भूमाफिया बन बैठा.
कानपुर के अलग-अलग थानों में विकास पर पांच हत्याओं समेत कुल 71 मुकदमे दर्ज हैं. एक मामले में विकास को आजीवन कारावास की सजा हुई है. इसके बावजूद विकास का नाम कानपुर शहर या किसी थाने के टाप-10 अपराधियों की सूची में नहीं दर्ज है. यही नहीं विकास का नाम कानपुर जिले में भूमाफिया के रूप में भी नहीं दर्ज है. पूर्व पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद कहते हैं, ‘‘पुलिस, अपराधी और नेता के गठजोड़ में तीनों एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं और एक दूसरे को आगे बढ़ाते हैं.
यही वजह थी कि एक अपराधी जिसका 30 साल पुराना इतिहास रहा हो, वह टाप-10 की सूची से गायब था.’’ कानपुर के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल बताते हैं कि आपराधिक रिकार्ड होने के बावजूद विकास का नाम टाप-10 अपराधियों की सूची में क्यों नहीं था? पुलिस ने अभी तक विकास पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? ऐसे कई सारे बिंदुओं पर पड़ताल चल रही है.
अपराध पर राजनीति का पहरा
कानपुर में बिल्हौर तहसील के घिमऊ जिला पंचायत निर्वाचन क्षेत्र में बिकरू गांव भी आता है. वर्ष 2000 में विकास ने घिमऊ जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीतकर अपने अपराधों पर राजनैतिक संरक्षण पाने की शुरुआत की. घिमऊ जिला पंचायत में विकास का ही सिन्न्का चलता था. पिछले 20 साल में से 10 साल वह और उसकी पत्नी ही जिला पंचायत सदस्य रहे हैं.
2005 और 2010 में घिमऊ जिला पंचायत सीट पिछड़ा और एससी वर्ग के लिए आरक्षित जरूर रही लेकिन विकास के करीबी ही यहां से जीते. धीरे-धीरे विकास ने कानपुर में शिवराजपुर विकास खंड की बिलहन, घिमऊ जिला पंचायत के अलावा क्षेत्र ग्राम पंचायत की लगभग 56 सीटों में से 40 पर दबदबा बना लिया था. यही वजह रही कि पिछले 20 वर्ष में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, कानपुर में शिवराजपुर ब्लॉक प्रमुख विकास की ही मर्जी का बना.
2005 में विकास बसपा के संपर्क में था और इस पार्टी के समर्थन से इसके छोटे भाई दीपू दुबे की पत्नी अंजलि बिकरू गांव की प्रधान बनीं. 2010 में बिकरू ग्राम पंचायत सीट आरक्षित होने के बाद 2015 में जब पुन: यह सीट सामान्य हुई तो विकास ने अंजलि को ही दोबारा प्रधान बनवाया. इसी वर्ष विकास ने अपनी पत्नी ऋचा दुबे को घिमऊ से सपा के समर्थन से जिला पंचायत सदस्य बनवाया था.
बिकरू ग्राम पंचायत और आसपास के एक दर्जन से अधिक गांवों की करीब 20 हजार आबादी पर सीधा प्रभाव रखने वाले विकास की इसी ताकत ने सभी सत्तारूढ़ दल मुख्यत: सपा, बसपा और भाजपा में विकास की पैठ बनाई. यही वजह रही कि सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा सरकारों में अपराधियों के कई एनकाउंटर हुए लेकिन विकास पर कोई आंच नहीं आई.
अक्तूबर 2004 में बसपा के दो पूर्व विधायक जिनमें एक भाजपा और दूसरे कांग्रेस में आ चुके हैं, कानपुर के कल्याणपुर थाने में इसलिए पूरी रात धरना देते रहे कि एक आपराधिक मामले में पकड़े गए विकास दुबे का पुलिस कहीं एनकाउंटर न कर दे. आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार के निशाने पर आए विकास के हर आपराधिक पहलुओं की जांच करने के आदेश मुक्चयमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिए थे.
मुख्यत्री ने पूरे प्रदेश में भू-माफिया और अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाने के निर्देश भी दिए हैं (देखें बाक्स). पिछली समाजवादी पार्टी की सरकार में बिगड़ी कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार के लिए पुलिस, अपराधी और राजनेता के गठजोड़ को तोडऩा बड़ी चुनौती है. बगैर इसके अपराधियों पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं होगा.
दर्ज थे विकास दुबे पर कानपुर के अलग-अलग थानों में. पांच मामले हत्या के भी थे. एक मामले में उसे उम्रकैद की सजा हुई. फिर भी वह टॉप 10 में शामिल नहीं था.
‘‘पुलिस, अपराधी और नेता के गठजोड़ में तीनों एक-दूसरे का सपोर्ट करते हैं. यही वजह है कि एक अपराधी जिसका 30 साल पुराना इतिहास रहा हो वह टॉप-10 की सूची से गायब था.’’
जावीद अहमद
पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश
अपराधी, भू-माफिया पर नकेल का रोडमैप
टास्क फोर्स
अवैध कब्जेदारी में फंसी निजी और सरकारी जमीनों को कब्जा मुक्त कराने के लिए जिला और तहसील स्तर पर एंटी भू-माफिया टास्क फोर्स का गठन किया गया है. यह टास्क फोर्स कब्जेदारी के चिन्हित आरोपियों को भू-माफिया घोषित करते हुए 15 दिन के भीतर इनके कब्जे से जमीन मुक्त कराने की कार्रवाई करेगी.
कब्जा मुक्ति
केंद्र के सहयोग से शुरू हो रही स्वामित्व योजना में ग्रामीण क्षेत्रों में घर के अगल-बगल की ग्राम समाज की जमीन का अपनी पैतृक संपत्ति की तरह उपयोग कर रहे गांव वालों को कब्जा छोडऩा होगा. तालाब, खलिहान और सार्वजनिक उपयोग की अन्य जमीन पर भी कब्जेदारी का स्थायी मोह छोडऩा होगा. ऐसा न करने वालों पर कार्रवाई की जाएगी.
अपराधियों की कुंडली
कानपुर की घटना के बाद माफिया, हिस्ट्रीशीटर की जिलेवार कुंडली तैयार हो रही है. जो बदमाश फरार चल रहे हैं, उनकी जिलेवार सूची अलग से तैयार की जा रही है. जिले के सभी हिस्ट्रीशीटरों की सूची पुलिस कप्तान के पास हर वक्त उपलब्ध रहेगी. कप्तान इन अपराधियों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा हफ्तेवार पुलिस मुख्यालय भेजेंगे.
प्लानिंग
इन अपराधियों को पकडऩे के लिए दबिश देने से पहले योजनाबद्ध ढंग से पूरा खाका तैयार किया जाएगा. अब बुलेट प्रूफ जैकेट, हेलमेट के साथ सुरक्षा कवच या आधुनिक हथियारों के बिना किसी भी टीम का दबिश के लिए मूवमेंट नहीं होगा. रात के समय दबिश के दौरान पुलिस को नाइट विजन डिवाइस रखना होगा.
ट्रेनिंग
हर जिले में शारीरिक रूप से चुस्त 10-10 जवानों को अपराधियों को पकडऩे के लिए दबिश देने के साथ ही बिना जान जोखिम में डाले बदमाशों से निबटने के तौर-तरीके सिखाने के लिए कमांडो ट्रेनिंग दिलाई जाएगी. यह इसलिए ताकि जरूरत पडऩे पर इन्हें फ्रंटलाइन पर भेजा जा सके. प्रशिक्षण के बाद हर जिले में एक विशेष कमांडो दस्ता तैयार करने की कार्रवाई भी होगी.
नेतृत्व
सभी दबिश में सर्किल की पुलिस का नेतृत्व डिप्टी एसपी या एडिशनल एसपी करेंगे. बड़े माफिया या अपराधियों के खिलाफ अभियान का नेतृत्व जिलों के कप्तान करेंगे. जरूरत पडऩे पर संबंधित रेंज के डीआइजी और आइजी भी अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करने वाली टीम की कमान संभालेंगे. दबिश में शामिल पुलिसकर्मी को वही हथियार मिलेंगे, जिसे चलाने में वह प्रशिक्षित हो.