उत्तर प्रदेश-खोया गढ़ जीतने की चुनौती
यूपी के तीसरे चरण के लोकसभा चुनावों में यादव परिवार के दिग्गजों का राजनैतिक रसूख भी दांव पर लगा है. क्या बसपा का साथ पाकर अखिलेश यादव इस जंग को जीत पाएंगे?

सुहाग नगरी फिरोजाबाद के अरांव ब्लॉक में शिकोहाबाद से मैनपुरी रोड पर करीब तीन किलोमीटर चलने के बाद इटौली ऌगांव पड़ता है. यहीं से समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के पूर्वज इटावा के सैफई गांव में आकर बसे थे. कई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार की एकता का मूक गवाह रहा यह गांव अब पारिवारिक द्वंद का साक्षी है. गांव से दो किलोमीटर दूर शिकोहाबाद के सुभाष चौराहे के पास मुलायम सिंह के सबसे छोटे भाई और 'प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) लोहिया' के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल यादव का चुनाव कार्यालय है.
सपा से बगावत करके शिवपाल फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर अपने सांसद भतीजे और सपा उम्मीदवार अक्षय यादव के खिलाफ खम ठोककर खड़े हो गए हैं. वहीं, सुभाष चौराहे से डेढ़ किलोमीटर दूर रामलीला मैदान के सामने अक्षय यादव का चुनाव कार्यालय शिवपाल को पटखनी देने के लिए बनने वाली रणनीतियों का केंद्र बिंदु है.
शिवपाल भी तैयार हैं. सैफई में अपने आवास से रोज सुबह आठ बजे तक शिकोहाबाद के केंद्रीय कार्यालय पहुंच जाते हैं. वे सहयोगियों के साथ नाश्ते की मेज पर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करते हैं. दूर-दराज से आए समर्थकों से मिलने के बाद वे सुबह ठीक 10 बजे अपना काफिला लेकर चुनाव प्रचार पर निकल पड़ते हैं. रास्ते में दिखने वाले हर बुजुर्ग का पैर छूकर आर्शीर्वाद लेते हैं. कुछ ही देर में वे सभा स्थल पर पहुंचते हैं. समर्थक शिवपाल के साथ मुलायम सिंह यादव जिंदाबाद के नारे लगाते हैं. अपने भाषण की शुरुआत शिवपाल सपा से नाता तोडऩे की वजहों से करते हैं. इसके लिए वे समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से ज्यादा अपने चचेरे भाई और अक्षय यादव के पिता राम गोपाल यादव को जिम्मेदार ठहराते हैं
वे बताते हैं कि रामगोपाल के प्रभाव में आकर अखिलेश यादव अपने पिता मुलामय सिंह यादव का अपमान कर रहे हैं. बसपा के साथ सपा के गठबंधन को निशाने पर लेते हुए वे यादव स्वाभिमान जगाने की कोशिश भी करते हैं. शिवपाल सभा में मौजूद लोगों के नाम लेते हुए उन पर बसपा शासनकाल में जुल्म से पीड़ित होने की हुंकारी भरवाते हैं. वे यह याद दिलाना नहीं भूलते कि सपा के शासनकाल में गांव और आसपास के कितने लोगों को सरकारी नौकरी मिली और उसमें उनकी क्या भूमिका रही. यादव वोटों पर दावेदारी मजबूत करने के लिए शिवपाल लोगों को यह बताना नहीं भूलते कि उनकी पार्टी प्रसपा वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी में सरकार बनाएगी. भावुक होते हुए वे लोगों से कहते हैं, ''आपने मुझे पगड़ी पहनाई है तो इसकी लाज भी रखना.''
अपने चाचा शिवपाल के उलट अक्षय यादव का पूरा ध्यान घर-घर जनसंपर्क पर है. बसपा से सपा का गठबंधन का असर उनकी चुनावी रणनीति पर भी दिख रहा है. दलित बस्तियों में लगी डॉ. भीमराव आंबेडकर की मूर्ति पर मार्ल्यापण कर अक्षय यादव जनसंपर्क की शुरुआत करते हैं. अक्षय यादव पूरे जनसंपर्क में कहीं भी शिवपाल यादव का नाम नहीं लेते बल्कि लोगों से केवल पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल पर वोट देने की अपील करते हैं. पिछला लोकसभा चुनाव भाजपा उम्मीदवार से एक लाख से अधिक मतों से जीतने वाले अक्षय यादव के सामने इस बार चाचा शिवपाल यादव की कठिन चुनौती है. मुलायम सिंह यादव परिवार के दो सदस्यों के आमने सामने खड़े होने से यादवों के प्रभाव वाले फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर मुकाबला रोचक हो गया है. यह चुनाव साबित करेगा कि इस परिवार के झगड़े में यादव मतदाता किसके साथ हैं? यादव बेल्ट में होने वाला तीसरे चरण का चुनाव मुलायम सिंह यादव की सियासी विरासत पर उनके बेटे और सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के उत्तराधिकार पर अपनी मुहर भी लगाएगा.
यादव मतों में बिखराव की नींव
इस बार सैफई में होली में मुलायम सिंह परिवार में सियासी अलगाव के रंग ज्यादा चटख थे. पहली बार यादव परिवार के सभी सदस्यों ने एक साथ होली नहीं मनाई. सैफई में अखिलेश यादव के घर पर मुलायम सिंह यादव, राम गोपाल यादव समेत कई नेता होली खेल रहे थे. यहां से कुछ दूरी पर 'एस.एस. मेमोरियल पब्लिक स्कूल' में शिवपाल अपने समर्थकों के साथ होली के रंगों में सराबोर थे. अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव और छोटे भाई शिवपाल यादव के बीच अलगाव से अभय राम यादव बेहद आहत हैं. सैफई में अपने मकान के भीतर 50 से अधिक गायों की देखभाल कर रहे बदायूं से सांसद धर्मेंद्र यादव के पिता अभयराम यादव तय कर चुके हैं कि वे इस लोकसभा चुनाव में किसी के लिए भी चुनाव प्रचार करने नहीं जाएंगे.
थोड़ी देर बात करने के बाद परिवार का अंदरूनी दंगल उनकी जुबान पर आ जाता है. वे सवाल उठाते हैं, ''जब अखिलेश के कहने पर कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में परिवार के लोगों के खिलाफ उम्मीदवार नहीं खड़े किए तो धर्मेंद्र यादव के खिलाफ ही कांग्रेस ने क्यों प्रत्याशी उतारा?'' अभयराम परिवार में चल रहे झगड़े के लिए चचेरे भाई रामगोपाल यादव को जिम्मेदार ठहराते हैं. इस पारिवारिक झगड़े में अन्य रिश्तेदार भी खेमे में बंट गए हैं.
मुलायम सिंह यादव परिवार की ज्यादातर रिश्तेदारियां फिरोजाबाद में हैं और इन्हीं के बल पर शिवपाल यादव मतों में एकतरफा सेंधमारी करने की कोशिश कर रहे हैं. फिरोजाबाद के गांव नगला हुमायूं में शिवपाल की ससुराल है. शिकोहाबाद और जसराना में समधी का रिश्ता है. सिरसागंज के भरौल में परिवार की बेटी ब्याही है तो टूंडला के राजा का ताल में शिवपाल के बड़े भाई राजपाल सिंह यादव की ससुराल है. मुलायम सिंह के समधी शिकोहाबाद के पूर्व नगर पालिका चेयरमैन राम प्रकाश नेहरू शिवपाल के साथ मंच साझा कर रहे हैं. नेहरू के भाई सिरसागंज से सपा विधायक हरियोम यादव भी शिवपाल के साथ हैं.
वहीं, मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेंद्र यादव के बहनोई अनुजेश प्रताप यादव भाजपा में शामिल हो गए हैं. दूसरे बहनोई जिला पंचायत सदस्य राजीव यादव धर्मेंद्र यादव के साथ हैं. राजीव यादव के मामा जसराना के पूर्व विधायक रामवीर यादव सपा छोड़कर भगवा झंडा पकड़ चुके हैं. मैनपुरी के भोगांव इंटर कालेज के प्रधानाचार्य बृजेश कुमार यादव बताते हैं, ''मुलायम सिंह यादव परिवार के रिश्तेदार पूरे यादव बेल्ट में फैले हुए हैं. मुलायम परिवार की एकता ही यादव बेल्ट के मतदाताओं का सपा को एकतरफा समर्थन की वजह थी. परिवारिक झगड़े ने परिवार की एकता छिन्न की है तो रिश्तेदार भी अलग-अलग खेमे में बंट गए हैं. यही वजह है कि इस बार के आम चुनाव में पहली बार यादव मतों में काफी बिखराव दिखेगा.''
दलित-यादव गठजोड़ पर संशय
वर्ष 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा कार्यकर्ताओं के बीच मैनपुरी में निरंतर तनाव की स्थिति बनी रहती थी. दोनों के परंपरागत दलित और यादव समर्थक भी आमने सामने थे. इस बार लोकसभा चुनाव में सपा बसपा के गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परंपरागत समर्थकों को एक साथ लाने की है. इसकी कोशिश 1 अप्रैल को मैनपुरी में दिखी जब मुलायम सिंह यादव नामांकन करने पहुंचे. मैनपुरी लोकसभा सीट से मुलायम के नामांकन के प्रस्तावकों में मैनपुरी सदर से सपा विधायक राजकुमार सिंह, करहल से सपा विधायक सोबरन सिंह यादव और मैनपुरी से वर्तमान सांसद तेज प्रताप सिंह तेजू थे. लेकिन सबसे चौंकाने वाला नाम बसपा के मैनपुरी जिलाध्यक्ष शुभम सिंह का था.
मुलायम सिंह यादव के नामांकन में प्रस्तावकों में बसपा नेता को शामिल करके अखिलेश ने यादव-दलित एकता का संदेश देने की कोशिश की. पिछले महीने लखनऊ में सपा के प्रदेश कार्यालय में एक बैठक में सपा-बसपा गठबंधन पर सवाल खड़े करने वाले मुलायम सिंह इस बार अपने नामांकन के दौरान कुछ असहज थे. हर बार की तरह इस बार भी मैनपुरी में सपा कार्यालय के बाहर मुलायम सिंह की सभा प्रस्तावित थी. कार्यकर्ता सुबह से जुटने भी लगे थे. नामांकन के बाद मुलायम सिंह के सभा स्थल पर न पहुंचकर वापस लौट जाने पर तरह-तरह की अटकलें लगने लगीं. समर्थकों को समझाने के लिए अखिलेश यादव ने लगातार मंच से घोषणा की, ''नेता जी (मुलायम सिंह यादव) 19 अप्रैल को मैनपुरी में आएंगे.'' दरअसल, इसी दिन मैनपुरी में बसपा सुप्रीमो मायावती और मुलायम सिंह की संयुक्त रैली प्रस्तावित है.
मैनपुरी-सैफई रोड पर पडऩे वाले अंडनी गांव में राम गोपाल यादव की तीन बहनों और मुलायम सिंह की इकलौती बहन की ससुराल है. अंडनी गांव के प्रधान रनवीर सिंह सवाल करते हैं, ''बसपा के शासनकाल में यादवों पर जो जुल्म हुए थे उसकी भरपाई कौन करेगा? जिन दलितों ने यादवों पर एससी-एसटी ऐक्ट के तहत गलत मुकदमा दर्ज कराया था वे अभी भी केस वापस लेने को तैयार नहीं हैं. मुलायम सिंह यादव को इस बात का एहसास है इसीलिए वे सपा-बसपा गठबंधन को लेकर असहज हैं.''
अंडनी गांव से करीब 80 किलोमीटर दूर फिरोजाबाद-एटा की सीमा पर मौजूद नगला हंसी ग्राम पंचायत में रहने वाले 70 वर्षीय दलित राम किशुन के घर पहुंचकर बगल के गांव में रहने वाले एक यादव परिवार के लोगों ने 14 दिसंबर, 2014 की रात जानलेवा हमला किया था. मामला खेत की सीमा के विवाद का था जिसकी शिकायत राम किशुन ने पुलिस से की थी. दलित-यादव के बीच जमीन विवाद से जुड़े सैकड़ों मामले मैनपुरी, फिरोजाबाद, इटावा समेत यादव बेल्ट में पडऩे वाले जिलों में दर्ज हैं. लेकिन फिरोजाबाद में एका द्ब्रलॉक प्रमुख पंकज यादव दलितों और यादवों के बीच किसी तनाव से इनकार करते हैं. वे बताते हैं, ''यादव और दलितों में कहीं कोई विवाद नहीं है. जो थोड़े विवाद हैं भी उन्हें दोनों समाज के लोग आपस में बैठकर सुलझा रहे हैं. सपा-बसपा गठबंधन से घबराए लोग ही दलित-यादव के बीच विवाद की बातें प्रचारित कर रहे हैं.''
मुसलमान तय करेंगे परिणाम
बदायूं से सांसद धर्मेंद्र यादव को इस बार अपनी सीट बचाने के लिए सबसे कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. एक तरफ गैर-यादव और सवर्ण मतों में सेंधमारी की कोशिश भाजपा प्रत्याशी संघमित्रा मौर्य कर रही हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस के उम्मीदवार सलीम इकबाल शेरवानी हैं जो पांच बार बदायूं से सांसद रह चुके हैं. सलीम शेरवानी के सामने आने से सपा का यादव-मुसलमान गठजोड़ दरकने लगा है. शेरवानी की काट के लिए धर्मेंद्र यादव ने बदायूं के कुछ मुसलमान नेताओं को अपने साथ जोड़ा है. शहर के पुराने कांग्रेसी नेता फखरे अहमद शोबी इस चुनाव में सपा के साथ हैं.
धर्मेंद्र यादव के पक्ष में मुसलमानों को लामबंद करने के लिए सपा के राष्ट्रीय महासचिव और रामपुर से प्रत्याशी आजम खान ने कमान संभाली है. धर्मेंद्र यादव और बदायूं से पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री आबिद रजा के मध्य चल रही राजनैतिक खींचतान को आजम खान ने दखल देकर सुलझाया है. आबिद अब धर्मेंद्र यादव के लिए मुसलमानों के बीच जाकर वोट मांग रहे हैं. आजम खान की दखलअंदाजी से ही सपा को मुरादाबाद लोकसभा सीट पर अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा.
मुरादाबाद सीट पर सपा के दावेदारों में पूर्व मेयर एस.टी. हसन और पूर्व मंत्री कमाल अख्तर शामिल थे. सपा ने दोनों दावेदारों के बीच बढ़ती गुटबाजी पर लगाम लगाने के लिए डेढ़ वर्ष पहले पार्टी में शामिल हुए नासिर कुरैशी को टिकट थमा दिया. कुरैशी को टिकट मिलते ही सपा के वरिष्ठ मुसलमान नेता आजम खान बिफर पड़े. आजम ने अखिलेश पर प्रत्याशी बदलने का दबाव डाला. कुरैशी को 28 मार्च को सपा का टिकट मिलने के 48 घंटे के भीतर प्रत्याशी पद से हाथ धोना पड़ा. अब आजम के करीबी एस.टी. हसन मुरादाबाद से सपा प्रत्याशी हैं. कांग्रेस का भी यही हाल है. पार्टी ने मुरादाबाद सीट से पहले अपने प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर को उम्मीदवार बनाया था. राज बब्बर के मना करने पर मशहूर युवा शायर इमरान प्रतापगढ़ी कांग्रेस के टिकट पर मुरादाबाद से उम्मीदवार हैं.
मुरादाबाद में मुसलमान उम्मीदवार उतार कर इस समाज के मतों में बंटवारे की नींव रखने वाली कांग्रेस ने यूपी में सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाली लोकसभा सीट रामपुर में आजम खान की राह सुरक्षित कर दी है. रामपुर के इतिहास में यह पहला मौका है जब कांग्रेस ने नवाब खानदान के दावेदार का टिकट काटकर हिंदू प्रत्याशी उतारा है. कांग्रेस ने रामपुर से पूर्व विधायक संजय कपूर को लोकसभा उम्मीदार घोषित कर भाजपा उम्मीदवार और फिल्म अभिनेत्री जया प्रदा के समर्थकों में दरार डालने की कोशिश की है. मुरादाबाद के वरिष्ठ हस्तशिल्पी इकराम अंसारी बताते हैं, ''तीसरे चरण के चुनाव में मुसलमान मतों का झुकाव ज्यादातर सपा-बसपा गठबंधन की ओर है. कांग्रेस के मुसलमान उम्मीदवारों की भूमिका मतों में बंटवारा कर भाजपा को लाभ पहुंचाने तक ही सीमित है.''
यूपी में तीसरे चरण का चुनाव यादव वोटरों पर अखिलेश यादव की पकड़ का इम्तहान लेगा तो आजम खान को भी सूबे का सबसे बड़ा मुसलमान नेता होने की कसौटी पर परखेगा.
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