आधार की राह में अभी कई पेचोखम
सुप्रीम कोर्ट ने आधार की वैधता तो कायम रखी मगर कानून की कई मुख्य धाराओं को खारिज करके गोपनीयता और डाटा सुरक्षा के सवाल खुले छोड़े

अगर आप किसी ऐसे काम का हिस्सा हैं जिसमें आयकर अदा किया जाता हो तो आपके लिए आधार संख्या अनिवार्य है. अगर आपकी माली हालत दुरुस्त नहीं है या सामाजिक पिछड़ों में शुमार हैं और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने की दरकार है तो आपको 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या दिखानी ही होगी. और अगर आप इनमें से किसी में नहीं आते लेकिन वित्तीय लेनदेन करना चाहते हैं तो आपको स्थायी खाता संख्या या पैन नंबर की दरकार है. लेकिन आपको अपनी पैन संख्या को आधार से जोडऩा ही पड़ेगा.
थोड़े में कहें तो अगर आप चैन से जीना चाहते हैं, अगर आप भारत का नागरिक होने की सुविधाओं का लाभ उठाना चाहते हैं तो आपको अपनी आधार संक्चया तैयार रखनी होगी. सुप्रीम कोर्ट के 26 सितंबर को आधार (वित्तीय और दूसरी सब्सिडियों का लक्षित वितरण, लाभ और सेवा) अधिनियम, 2016 की संवैधानिक वैधता प्रदान करने वाले फैसले का व्यावहारिक मतलब यही है. हालांकि इसकी वैधता को कायम रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने इस अधिनियम की धारा 57 को रद्द कर दिया, जो सामान या सेवा मुहैया करने के लिए कंपनियों या किसी व्यक्ति को भी आधार संख्या मांगने की इजाजत देती थी.
सर्वोच्च अदालत ने मार्च 2017 में ट्राइ के उस सर्कुलर को भी खारिज कर दिया जो मोबाइल नंबर को आधार से जोडऩे को अनिवार्य बनाता था. अब आधार योजना पर अमल करने वाली एजेंसी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ) ने दूरसंचार कंपनियों से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आधार आधारित प्रमाणन व्यवस्था को खत्म करने की योजना 15 अक्तूबर तक पेश करने को कहा है.
लेकिन मोबाइल फोन और बैंक खातों से आधार संख्या को जोडऩे की योजनाएं तो अभी बदस्तूर कायम हैं. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली इसके लिए एक विधेयक संसद में पारित करने की वकालत कर रहे हैं.
मद्रास हाइकोर्ट में आधार को मतदाता संख्या और वोटर आइडी कार्ड से जोडऩे के लिए एक जनहित याचिका भी दायर हो चुकी है. चुनाव आयोग भी कह चुका है कि उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं है.
बेशक, आप बिना आधार कार्ड के भी मतदान करने जैसे कई अधिकारों के हकदार हैं. आप बैंक (सरकारी भी), फोन कंपनियों और स्कूल-कॉलेजों वगैरह को आधार संख्या बताने से इनकार कर सकते हैं.
लेकिन आधार और पैन कार्ड को जोडऩे और पैन कार्ड बनवाने के लिए आधार को अनिवार्य बनाकर सुप्रीम कोर्ट ने परोक्ष रूप से तो यह आश्वस्त कर ही दिया है कि आपके बैंक खाते के ब्यौरे यूआइडीएआइ तक पहुंच जाएं. देश में बैंक खाता खोलने के लिए अब पैन संख्या अनिवार्य है.
सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से आधार को जोडऩे की इजाजत देने के लिए अदालत ने इस दलील को मंजूर कर लिया कि इससे व्यापक जनहित साधा जा रहा है. फैसला सुनाते वक्त जज अर्जन कुमार सिकरी ने कहा कि पीठ इस दलील से संतुष्ट है कि आधार एक जायज लक्ष्य लीकेज और दुरुपयोग की रोकथाम के लिए उपयुक्त उपाय है. अदालत ने आधार कानून की धारा 7 को कायम रखा, जिसके मुताबिक देश के समेकित कोष से पूरी की जाने वाली सरकारी योजनाओं के लिए यह अनिवार्य है. मतलब यह हुआ कि अगर आप राशन, रसोई गैस सब्सिडी, मनरेगा वगैरह के लाभ उठाना चाहते हैं तो आपको अपनी आधार संख्या या आधार आवेदन संख्या बतानी होगी.
आधार के पैरोकार अक्सर यह दलील देते हैं कि इससे सरकारी योजनाओं के वितरण में खामियां दूर हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा, "पहचान के लिए आधार संख्या के इस्तेमाल से खामियां दूर करके करीब 500 कल्याणकारी योजनाओं में हर साल तकरीबन 90,000 करोड़ रु. की बचत हुई है.'' यहां तक कि गोपनीयता के मामलों के जानकार लेखक राहुल मट्ठन इससे सहमत हैं कि आधार का डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर किफायत बरतने में मददगार है. वे कहते हैं, "लोन पाने के लिए केवाइसी (अपने ग्राहक को जानें) प्रक्रिया का खर्च 1,000 रु. आता है जबकि आधार आधारित ई-केवाइसी से यह खर्च महज 5 रु. ही बैठता है.''
हालांकि जनवरी 2016 और मार्च 2017 के बीच पुदुच्चेरि, चंडीगढ़ और दादर-नगर हवेली में नीति आयोग के एक अध्ययन से पता चलता है कि आधार से जुड़े बैंक खाते के जरिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण में लीकेज पहले की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की लीकेज के मुकाबले कम नहीं हो पाए हैं.
डाटा गोपनीयता की प्रबल पैरोकार अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा के मुताबिक लीकेज को खत्म करने या वाजिब लाभार्थी की पहचान में आधार कोई भूमिका नहीं निभा पाता है, इसके बदले इससे लोगों को दायरे से बाहर करने का एक तरीका तैयार हो गया है. दरअसल खेड़ा का दावा है कि आधार योजना का प्राथमिक लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने और कल्याणकारी योजनाओं की प्रक्रिया में सुधार लाना कभी नहीं रहा. उन्होंने एक स्तंभ में लिखा, "एकदम स्पष्ट व्यावसायिक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए कल्याणकारी योजनाओं की चाशनी में लपेटा जा रहा है. इन व्यावसायिक गतिविधियों के लिए आधार जैसे डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की दरकार है, जिसे सार्वजनिक पैसे से तैयार कर लिया गया.'' अपने दावे को पुष्ट करने के लिए वे कहती हैं कि आधार इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में मदद करने वाले कई "स्वयंसेवक'' अब उसका इस्तेमाल करके अपना व्यवसाय खड़ा कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने उनके एक लेख पर गौर किया जिसमें उन्होंने झारखंड में 900 परिवारों के सर्वेक्षण का जिक्र किया था. सर्वेक्षण से साबित हुआ कि अनिवार्य आधार पहचान प्रक्रिया से बुजुर्ग विधवाओं जैसे सबसे दुर्बल लोग दुकान पर अपनी पहचान पूरी करने के लिए नहीं जा सके और उससे दूसरों को भारी कठिनाई उठानी पड़ी. तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र की अगुआई वाली पीठ इससे सहमत हो गई कि आधार वंचित तबके तक लाभ पहुंचाने के लिए ही तैयार किया गया मगर उसने सरकार को स्पष्ट चेतावनी भी दी, "वित्तीय लाभ के दायरे से बाहर करने की गंभीर शिकायतों के संदर्भ में अदालत का निर्देश है कि आधार संख्या के बहाने एक भी व्यक्ति अनाज वितरण जैसी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.''
लेकिन आधार कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की बड़ी चिंता आधार का वह तंत्र है जो सरकार को समाज पर व्यापक नजर रखने की सुविधा मुहैया करा देता है. याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि आधार कानून निजता के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन करता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में वैध बताया है.
आधार परियोजना के तंत्र में एक केंद्रीय पहचान डाटा कोष (सीआइडीआर) है, जो डाटा रखता है और उसके प्रमाणीकरण का हिसाब-किताब करता है. एक याचिकाकर्ता की दलील थी कि इस तंत्र के जरिए सरकारी अधिकारी प्रमाणीकरण चाहने वाले व्यक्ति के स्थान का पता लगा सकते हैं. एक याचिकाकर्ता अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं कि अदालत के फैसले ने आधार से सरकार को विभिन्न डाटाबेस से जुडऩे और ताक-झांक का इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की ताकत पर न के बराबर ही अंकुश लगाया. वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट में दलील रखी कि आधार परियोजना लोगों पर नियंत्रण रखने का इलेक्ट्रॉनिक साधन है. खेड़ा कहती हैं, "केंद्रीकृत और एक-दूसरे से जुड़े डाटाबेस ट्रैकिंग, प्रोफाइलिंग को आसान बनाता है जिससे स्वतः-सेंसरशिप की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है जिससे हमारी आजादी खतरे में पड़ जाती है.''
वाकई, अगर आधार आखिरकार बैंक खाते, मोबाइल नंबर और वोटर कार्ड से जुड़ जाता है तो सरकार अपने नागरिकों पर दिन-रात नजर रखने के काबिल हो जाएगी. सरकार की "आधार अनिवार्य होना चाहिए्य की हुंकार से इसके आलोचकों ने यही आशंका तो जाहिर की थी.
मट्ठन भी इससे तो सहमत हैं कि विभिन्न डाटाबेस को जोडऩे की संभावना लोगों की गोपनीयता को खतरे में डाल सकती है. वे कहते हैं, "आधार का डाटा अपने आप में खतरनाक नहीं है. खतरनाक यह है कि आधार मनरेगा, रसोई गैस वितरण जैसे सरकारी डाटाबेस से जोड़ दिया जाए. फिलहाल तो ये अलग-अलग मंत्रालयों के जिम्मे हैं और उन्हें जोड़ पाना आसान नहीं है. लेकिन उन्हें अगर जोडऩे की कोई पहल है तो पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के मुताबिक निजता के अधिकार को जरूर ध्यान में रखा जाना चाहिए.''
इन चिंताओं पर कोर्ट ने तवज्जो तो दी पर कहा कि आधार में न्यूनतम डाटा ही होता है और इसका इस्तेमाल व्यापक जनहित में होता है. हालांकि अदालत ने आंशिक राहत भी मुहैया की. वह प्रावधान रद्द कर दिया गया जिससे पांच साल तक प्रमाणीकरण के रिकॉर्ड रखने की इजाजत मिलती थी यानी जब-जब कोई अपनी पहचान बताने के लिए आधार का इस्तेमाल करता, पांच साल तक उसका रिकॉर्ड रखा जाता. ऐसा रिकॉर्ड अब सिर्फ छह महीने तक ही रखा जा सकेगा.
अदालत ने लोगों के लेनदेन का मेटा डाटा रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. इसका मतलब यह हुआ कि यूआइडीएआइ डाटा सेट इकट्ठा नहीं कर सकता और उसे आगे डाटा विश्लेषण के खातिर इस्तेमाल नहीं कर सकता. सुप्रीम कोर्ट ने आधार कानून की धारा 33 (2) को भी रद्द कर दिया, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सुरक्षा एजेंसियों को डाटा मुहैया कराने की इजाजत मिलती थी. कानून की धारा 47 भी खारिज हो गई जिसके मुताबिक आधार डाटा चोरी होने की शिकायत करने का अधिकार सिर्फ सरकार को था. अब कोई व्यक्ति भी इसकी शिकायत कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से डाटा सुरक्षा के लिए जितनी जल्दी संभव हो, सख्त कानून बनाने को भी कहा.
फिलहाल तो सरकार व्यक्तिगत डाटा सुरक्षा विधेयक, 2018 के मसौदे की जांच-परख कर रही है, जिसे न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अगुआई वाली विशेषज्ञ समिति ने जुलाई में सौंपा था. इस विधेयक के मसौदे की सबसे तीखी आलोचना यह हो रही है कि इसमें निजी खिलाडिय़ों के डाटा गोपनीयता भंग करने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई के तो प्रावधान हैं मगर सरकार के मामले में यह नरम हो जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनांस ऐंड पॉलिसी की कंसलटेंट स्मृति पशीरा के मुताबिक, खुफिया और कानून की रखवाली दूसरी एजेंसियों को डाटा उपलब्धता के मामले में प्रस्तावित विधेयक में कड़े प्रावधान किए जाने की दरकार है. वे कहती हैं, "रिपोर्ट में जो कहा गया है और प्रस्तावित विधेयक में वह जिस रूप में शामिल किया गया है, उसमें काफी फर्क है.
मसलन, खुफिया और पुलिसिया एजेंसियों को डाटा उपलब्ध कराने के मामले में रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था नाकाफी है और ताकझांक करने की इजाजत के लिए पूर्व न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था जैसे सुधारों की दरकार है. लेकिन यह विचार विधेयक के मसौदे में नहीं आ पाया है.''
न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण भी सरकारी ताकझांक के खतरे से वाकिफ हैं. उन्होंने सिफारिश की है कि कार्यपालिका की ताक-झांक की कार्रवाई पर न्यायिक देखरेख संबंधी कानून बनाए. मट्ठन कहते हैं, "ऐसी ताक-झांक के लिए हर छह महीने पर संसदीय मंजूरी लेने का भी प्रस्ताव है, ताकि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ सहभागी बन सकें.''
फिर, वे प्रस्तावित गोपनीयता कानून की सबसे बड़ी खामी की ओर इशारा करते हैं कि गोपनीयता प्रावधानों के उल्लंघन के लिए सरकार पर कोई दंड का प्रावधान नहीं है. शायद इसी खामी की वजह से सरकार आधार के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना का साहस जुटा लेती है. मसलन, 2015 में महज पांच कल्याणकारी योजनाओं तक आधार को सीमित रखने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार ने कम से कम तीन दर्जन कल्याणकारी योजनाओं से आधार को जोड़ दिया. अब सर्वोच्च अदालत ने सरकार को चेताया है कि जिनके पास आधार नहीं है, उन्हें कल्याणकारी योजनाओं से वंचित न किया जाए क्योंकि उनके लिए अभी भी कोई तंत्र और दिशानिर्देश नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने आधार कानून में कैसे फेरबदल किए
-कानून की धारा 57 को रद्द किया गया, जो कंपनियों या व्यक्तियों को भी सामान या सेवाओं के लेनदेन में आधार कार्ड मांगने की इजाजत देती थी
- धारा 33 (1) पहचान और प्रमाणीकरण केरिकॉर्ड वगैरह संबंधी सूचनाएं उजागर करने की इजाजत देता था, बशर्ते जिला जज से नीचे की अदालत का आदेश न हो. इस उपधारा के बारे में अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उस व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए
-कानून की धारा 33 (2) को खारिज कर दिया गया जो केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी के निर्देश पर राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में पहचान और प्रमाणन रिकॉर्ड जाहिर करने की इजाजत देती थी. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस मामले में कोई न्यायिक अधिकारी (हाइकोर्ट का कोई मौजूदा जज हो तो बेहतर) जुड़ा होना चाहिए और कि सरकार इस बारे में नया कानून लाए
-धारा 47 रद्द हो गई जो डाटा चोरी के मामले में शिकायत का अधिकार किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि सिर्फ यूआइडीएआइ को अधिकार देती थी. अब अगर किसी को लगता है कि उसका डाटा चोरी हुआ तो वह शिकायत कर सकता है
-पहचान प्रमाणीकरण रिकॉर्ड पांच साल तक सुरक्षित रखने का प्रावधान खारिज हो गया. अब इसे सिर्फ छह महीने तक रखा जा सकेगा
-व्यक्तियों के लेनदेन के मेटा डाटा को सुरक्षित रखने का प्रावधान खारिज. मतलब यह कि यूआइडीएआइ डाटा सेट नहीं बना सकता और न अधिक डाटा या विश्लेषण के लिए उसे सुरक्षित नहीं रखा जा सकता
-यूआइडीएआइ कंपनियों के साथ डाटा साझा नहीं कर सकेगा
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