यह है चीन की नई दीवार
मसूद अजहर के बचाव में उतरा है चीन

पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर, जो जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) का मुखिया है, पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश दो साल में दूसरी बार लगता है, चीन की दीवार से आकर टकरा गई है. 30 अक्तूबर को चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 1267 प्रतिबंध समिति में अजहर को प्रतिबंधित सूची में डालने के मामले पर असहमतियां थीं. यह समिति अमेरिका की ओर से दी गई एक याचिका, जिसका समर्थन ब्रिटेन और फ्रांस ने किया है, पर अल-कायदा, आइएसआइएस और उससे जुड़े संगठनों से संबंधित है. चीन ने इस साल इससे पहले भी अधिक जानकारी मांगते हुए एक तकनीकी रोक लगा दी थी. लेकिन उस रोक की अवधि 2 नवंबर को खत्म होने से बीजिंग ने मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया रोकने के लिए अपने वीटो अधिकार का प्रयोग करने का संकेत दिया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुनइंग ने कहा, ''अब तक समिति के सदस्यों के बीच सहमति बननी बाकी है.’’
अजहर के खिलाफ मामला एकदम साफ दिखाई देता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की यही समिति अजहर के संगठन जेईएम पर रोक लगाने के लिए राजी हो गई थी. और अभी कुछ दिन पहले सितंबर में ब्रिक्स के पांच देशों में चीन भी शामिल था जिन्होंने जियामेन शिखर सम्मेलन में जेईएम को एक वैश्विक चिंता बताने वाले संयुक्त बयान पर दस्तखत किए थे.
बीजिंग के इस हठ का मतलब क्या है. सार्वजनिक रूप से, बीजिंग के अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में ‘ठोस सबूत’ नहीं हैं. हुआ ने कहा, ''हमारा मानना है कि समिति को वस्तुनिष्ठता, पेशेवरपन और निष्पक्षता का पालन करना चाहिए और ठोस सबूतों के आधार पर आम सहमति बनानी चाहिए.’’
दूसरी तरफ गुप्त तौर पर, चीनी अधिकारियों को लगता है कि अजहर पर प्रतिबंध लगाने के पीछे ‘राजनीतिक मकसद’ काम कर रहा है और उसके सच्चे दोस्त पाकिस्तान को निशाना बनाया जा रहा है. पिछले साल वरिष्ठ चीनी अधिकारी ली बाओडोंग ने कहा था कि हमें ‘‘आतंकवाद से मुकाबला करने के नाम पर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.’’ अधिकारी लश्कर-ए-तय्यबा के मुखिया हाफिज सईद के मामले का उदाहरण देते हैं जो प्रतिबंध की सूची में रखे जाने के बावजूद पाकिस्तान में खुला घूम रहा है.
भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, इस तर्क में ज्यादा दम नहीं है. उनका कहना है कि पाकिस्तान की निर्लज्ज कार्रवाई—जैसा कि सईद के मामले में देखा जा रहा है—के पीछे दरअसल चीन का कूटनीतिक कवच है. चीन का यह तर्क खुद उसकी ही इस शिकायत के विपरीत है जिसमें वह शीनजियांग प्रांत में आतंकवाद पर पश्चिमी देशों की ओर से ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने की बात कहता रहा है. भारत के सामने अब विकल्प क्या हैं. भारत अजहर के लिए तीसरा आवेदन दे सकता है. हो सकता है, उसका भी यही हश्र हो. लेकिन इससे कम से कम चीन की चाल तो उजागर होगी और दुनिया को पता चलेगा कि वह किस तरह कूटनीतिक तरीके से अपने ‘सच्चे दोस्त’ का बचाव कर रहा है.