समाचार सारः पाक को चित करने की रणनीति
भारत और पाकिस्तान जब परमाणु हथियारों की बात करें तो यह इस बात का संकेत होता है कि उनके रिश्ते अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गए हैं. अभी कुछ समय पहले ऐसा ही देखने को मिला.

भारत और पाकिस्तान जब परमाणु हथियारों की बात करें तो यह इस बात का संकेत होता है कि उनके रिश्ते अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गए हैं. अभी कुछ समय पहले ऐसा ही देखने को मिला. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी ने न्यूयॉर्क स्थित एक थिंकटैंक को 21 सितंबर को बताया कि उनके देश ने ''भारत के ''कोल्ड स्टार्ट" सिद्धांत के जवाब में कम दूरी वाले रणनीतिक परमाणु हथियार विकसित कर लिए हैं."
भारत के कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत के अनुसार, भारत की बख्तरबंद सैनिक टुकडिय़ां (मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री) पहले की तरह कुछ दिनों में नहीं, बल्कि कुछ घंटों में पाकिस्तान पर हमला कर सकती हैं. कोल्ड स्टार्ट के जवाब में पाकिस्तान की रणनीति, जैसा कि प्रधानमंत्री अब्बासी ने बताया है, 60 किमी की दूरी वाले परमाणु हथियारों से लैस ''नस्य" (विजय) मिसाइलों को तैनात करने की रही है ताकि पाकिस्तान की जमीन पर कदम बढ़ाने वाली भारतीय फौज को निशाना बनाया जा सके.
उधर, वायुसेना अध्यक्ष बी.एस. धनोवा का कहना है कि भारत ने इन परमाणु हथियारों को नष्ट करने के लिए खास योजना बनाई है जिसका नाम ''बैटलफील्ड न्यूक्स" (युद्धक्षेत्र के परमाणु हथियार) है. 5 अक्तूबर को दिल्ली में आयोजित एक प्रेस सम्मेलन में वायु सेना अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय वायु सेना (आइएएफ) सीमा पार ''ठिकानों का पता लगाने" निर्धारित करने और तबाह करने" में सक्षम है. आइएएफ के अफसरों ने इंडिया टुडे को बताया कि युद्ध की स्थिति में, ''कोल्ड स्टार्ट के जवाब का जवाब देने में नस्र के 8 गुणा 8 चीनी मूल के ट्रांसपोर्टर इरेक्टर लांचर्स (टीईएल) को निशाना बनाना शामिल है.
दोनों की ही योजनाओं में अपनी समस्याएं हैं. हमलावर दल को रोकने के लिए कम क्षमता वाले दर्जनों परमाणु हथियारों की जरूरत होगी और दूसरी तरफ आगे बढ़ रही सेना के लिए हवा में रक्षात्मक छतरी की तरह काम करते हुए आइएएफ को दुश्मन के टीइएल को अपने परमाणु हथियारों को लॉन्च करने से पहले ही उनके ठिकानों का ठीक-ठीक पता लगाने की जरूरत होगी ताकि उन्हें समय रहते तबाह किया जा सके. चलते-फिरते लांचरों का सटीक तरीके से पता लगाना कठिन होता है. 12 मीटर लंबे इन लांचरों का वजन 25 टन से ज्यादा होता है और ये जमीन पर लट्ठों के किसी ढेर की तरह दिखाई देते हैं. इसलिए आसमान से उनमें फर्क करना बहुत मुश्किल होता है.
1991 के खाड़ी युद्ध में 8गुणा8 टीईएल पर लगी इराकी स्कड मिसाइलों का पता लगाने और उन्हें तबाह करने के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने 2,000 से ज्यादा असफल हवाई हमले किए थे. सद्दाम हुसैन ने इन लांचरों को देश भर में इधर-उधर फैला रखा था. नस्र का पता लगाना और उन्हें तबाह करना बहुत चुनौती भरा काम साबित हो सकता है क्योंकि इस समय आइएएफ के पास अमेरिका की तरह जेएसटीएआरएस-अवाक्स जैसे प्लेटफॉर्म वाली क्षमता नहीं है, बल्कि उसके राडार जमीन पर केवल वाहनों की हलचल और दिशा पर नजर रखते हैं. यहां तक कि जमीन की स्कैनिंग करने वाले राडार भी नकली और असली लांचरों (जैसा कि सद्दाम ने तैनात कर रखे थे) में फर्क नहीं कर सकते. इसे देखते हुए वायु सेना अध्यक्ष के बयान का मकसद शायद सरकार के कोल्ड स्टार्ट के विकल्प को बल देना है.
इससे जहां जेएसटीएआरएस की खरीद का नया दौर शुरू हो सकता है, वहीं पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को लेकर चिंता को खारिज नहीं किया जा सकता. अमेरिका ने परमाणु हथियारों को छोटा रूप देकर उन्हें जीप पर लगी राइफलों और कुछ किमी तक मार करने वाली तोपों में लगा रखा था लेकिन उसने इन्हें हटा भी लिया क्योंकि इससे इस तरह का संघर्ष नाटकीय रूप से बड़े युद्ध में बदल सकता है. पूर्व अमेरिकी सीनेटर लैरी प्रेसलर ने 28 सितंबर को नई दिल्ली में कहा था कि ''पाकिस्तान ने तीन से चार संचालन चौकियां बना ली थीं, जहां से परमाणु हथियारों को छोड़ा जा सकता था." जहिर है, ऐसी स्थिति में उनके उपयोग या दुरुपयोग की संभावना बहुत बढ़ जाती है.