नोटबंदी की मार दर्शक बेजार
नोटबंदी की वजह से कई फिल्मों की रिलीज टली तो सिंगल स्क्रीन थिएटर संकट में, मल्टीप्लेक्स दर्शकों को लुभा रहे.

वजह तुम हो फिल्म को 2 दिसंबर को रिलीज होना था, लेकिन अब इसकी तारीख बढ़ाकर 16 दिसंबर कर दी गई है. हितेन पेंटल की फिल्म 30 मिनट्स को 9 दिसंबर तक के लिए टाल दिया गया है जबकि प्रियंका चोपड़ा की पहली पंजाबी प्रोडक्शन सरवन अगले साल 13 जनवरी को रिलीज होगी. पहले फिल्म 9 दिसंबर को रिलीज होनी थी. फिल्में बेशक सब अलग-अलग हैं, लेकिन इन्हें कुछ देर से दर्शकों के सामने लाने की वजह एक ही हैः नोटबंदी के बाद पैदा हुए तंग आर्थिक हालात. वजह तुम हो से जुड़े सूत्र बताते हैं, ''फिल्म के संभावित दर्शकों में छोटे शहर के लोगों की संख्या ज्यादा है, और वहां नोटबंदी से तंगी काफी है. कुछ दिन रिलीज टालने से दर्शकों को नकदी के संकट से उबरने की भी थोड़ी मोहलत मिल जाएगी." उधर, 30 मिनट्स के ऐक्टर हितेन पेंटल मानते हैं, ''इस समय आम जनता एटीएम और बैंकों के बाहर कतारों में खड़ी है. ऐसे हालात में वे फिल्म देखने क्या जाएंगे? पैसा निकालने पर भी तरह-तरह की पाबंदियां हैं."
500 रु. और 1,000 रु. के नोट को बंद करने का सीधा असर सिंगल स्क्रीन यानी इकलौते परदे वाले सिनेमाघरों पर सबसे ज्यादा दिख रहा है. पहले से ही बदहाली की मार झेल रहे ये सिनेमाघर इस झटके से उबर नहीं पा रहे हैं. दिल्ली-उत्तर प्रदेश जोन में फिल्म डिस्ट्रिब्यूशन का काम देखने वाले जोसिंदर महाजन बताते हैं कि पिछले तीन महीने में दिल्ली में तीन सिनेमाघर बंद हो चुके हैं और हालात इस तरह ही रहे तो मार्च, 2017 तक यह आंकड़ा और आगे तक जा सकता है. महाजन बताते हैं, ''मौजूदा आर्थिक संकट की वजह से सिंगल स्क्रीन की कमर ही टूट गई है. पिछले तीन महीने में दिल्ली में लोकेश, आकाश और सम्राट सिनेमाघर दम तोड़ चुके हैं. आने वाले समय में गगन, मिलन और सुप्रीम जैसे लगभग 10 सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं."
मौजूदा हालात सिनेमाघरों के मालिकों की कमर तो तोड़ ही रहे हैं, सिंगल स्क्रीन के मालिक यह भी कहते हैं कि दिल्ली में मनोरंजन टैक्स को 20 से 40 फीसदी करने का फैसला भी भारी पड़ रहा है. इस तरह की वजहों से सिनेमाघर के स्टाफ और बिजली के बिल जैसे खर्च तक निकालना उनके लिए मुश्किल हो गया है. फिर नोटबंदी के बाद से बैंक और एटीएम से पैसे निकालने की सीमा तय कर दी गई है, ऐसे में लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करेंगे या मनोरंजन का रुख करेंगे. महाजन कहते हैं, ''जिस तरह के हालात में हम हैं, उसमें सबसे पहले रोजाना की जरूरत पूरी करने की बात आती है, मनोरंजन और वह भी सिनेमाघर के जरिए
तो वरीयताओं की सूची में सबसे नीचे आता है." उनका कहना किसी हद तक सही भी है. 8 नवंबर को प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले के बाद से सिनेमाघरों में पहुंचने वाले लोगों के आंकड़ों में गिरावट दर्ज की गई है.
ट्रेड एक्सपर्ट अतुल मोहन मानते हैं कि फिल्मों का बिजनेस 25-30 प्रतिशत ऑक्युपेंसी पर चलता है. लेकिन मंदी के बाद कारोबार 5-10 फीसदी के बीच आ गया है. वे बताते हैं, ''छोटी-छोटी फिल्में अटकी हुई हैं, और आने वाले दिनों में बेफिक्रे (9 दिसंबर) और दंगल (23 दिसंबर) जैसी फिल्में आने वाली हैं, और इनके मोटे बिजनेस का दावा पहले से किया जा रहा है."
हालांकि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि नोटबंदी का असर इनकी कमाई पर जरूर नजर आएगा. माना जा रहा है कि दंगल के निर्माताओं को फिल्म से 400 करोड़ रु. की कमाई की उम्मीद थी, लेकिन अब संभवतः फिल्म को उस आंकड़े तक पहुंचने में दिक्कत आए.
बॉलीवुड ने बदलते बाजार को देखते हुए अपने तेवरों में भी बदलाव कर लिया है. उसने अपनी आने वाली फिल्मों के लिए बड़े मल्टीप्लेक्स पर दांव खेला है. इस हफ्ते रिलीज हो रही कहानी-2 को मल्टीप्लेक्स में रिलीज किया जा रहा है, और इसमें भी बड़े मल्टीप्लेक्स को तवज्जो दी जा रही है. इसी तरह यशराज फिल्म्स की रणवीर सिंह और वाणी कपूर की रोमांटिक फिल्म बेफिक्रे को लिमिटेड स्क्रीन्स पर रिलीज करने की योजना है. इस तरह बड़ी फिल्में सिंगल स्क्रीन से कन्नी काट रही हैं. ट्रेड एक्सपर्ट मानते हैं कि सिंगल स्क्रीन में आम लोग ज्यादा आते हैं जबकि मल्टीप्लेक्स में पैसे वालों की तादाद अधिक होती है. मल्टीप्लेक्स में आने वाले ऑनलाइन पेमेंट और क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाओं से लैस होते हैं, इसलिए प्रोडक्शन हाउस समझदारी दिखाते हुए उनका रुख कर रहे हैं. जोगिंदर महाजन कहते हैं कि इससे सिंगल स्क्रीन को नुक्सान पहुंचेगा, ''घाटे के शिकार सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के लिए यह अभिशाप की तरह काम करेगा. वे वैसे ही केंद्र और राज्य सरकार की बेरुखी का स्वाद चख रहे हैं, इससे हालात और खराब ही होंगे." हालांकि इस अंतर को दो फिल्मों के जरिये बखूबी समझा भी जा सकता है. फोर्स-2 आम लोगों के लिए फिल्म थी. 45 करोड़ रु. की लागत से बनी यह फिल्म लगभग 48 करोड़ रु. कमा सकी जबकि 22 करोड़ रु. की लागत से बनी डियर जिंदगी लगभग 40 करोड़ रु. का कारोबार कर चुकी है. यह फिल्म पूरी तरह मल्टीप्लेक्स ओरियंटेड थी. अतुल मोहन बताते हैं, ''यहां फर्क साफ नजर आ जाता है. डियर जिंदगी के कलेक्शन अच्छे आए हैं. इसकी बड़ी वजह इसके दर्शक हैं, जिन्होंने ऑनलाइन बुकिंग और क्रेडिट कार्ड को चुना. जबकि फोर्स-2 औसत कारोबार ही कर सकी और इसकी वजह इसका सिंगल स्क्रीन फोकस होना था. वजह मास मार्केट का नोटबंदी की मार से बदहाल होना था."
नकद बिक्री बैठी
बॉलीवुड से इस कदम को लेकर तरह-तरह की आवाजें आ रही हैं. लेकिन मल्टीप्लेक्स की तस्वीर ठीक-ठाक ही है. पीवीआर सिनेमाज के सीईओ गौतम दत्ता मानते हैं कि भारतीय फिल्म उद्योग पर नोटबंदी का असर जाहिर तौर पर पड़ेगा लेकिन इसे नकारात्मक नहीं कहेंगे. वे कहते हैं, ''नोटबंदी ग्राहकों को ऑनलाइन टिकट खरीदने के लिए प्रेरित कर रही है, और पीवीआर के सभी सिनेमाघरों पर ऑनलाइन बुकिंग और क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल के चलन में जबरदस्त इजाफा देखने को मिला है." मल्टीप्लेक्स के मालिक मानते हैं कि शुरुआती दिनों में तो खिड़की पर टिकटों की बिक्री में कुछ गिरावट आई थी पर ऑनलाइन खरीद ने इसकी भरपाई कर दी. दत्ता बताते हैं, ''हमारी नकद खरीद में 20-25 फीसदी की कमी आई है लेकिन ऑनलाइन खरीद में 55-60 फीसदी की बढ़त देखने को मिली है."
यही नहीं, मल्टीप्लेक्स दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने के लिए कई तरह के डिस्काउंट और पैकेज ऑफर हो रहे हैं. इस बीच फिल्म पीआर देखने वाले शैलेष गिरी का यह सवाल अहम हो जाता है, ''क्या 500 रु. के नोट को सिनेमाघरों में चलाने की अनुमति नहीं मिल सकती थी?"

