शहाबुद्दीन की जमानत की पूरी हकीकत

11 साल जेल में रहने के बाद सीवान के बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन जमानत पर छूटकर बाहर आ गए हैं. बिहार पर और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर इसका क्या असर पड़ेगा?

जमानत मिलने के बाद भागलपुर जेल से बाहर आते हुए शहाबुद्दीन
जमानत मिलने के बाद भागलपुर जेल से बाहर आते हुए शहाबुद्दीन

दस सितंबर की सुबह मॉनसून ने खासी मदद की. सुबह 7.26 बजे सजायाफ्ता हत्यारे और चार बार के सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन ने आरामतलब मुद्रा में जब भागलपुर केंद्रीय जेल से बाहर कदम रखा, तब न केवल हजारों समर्थकों ने उनकी अगवानी की, बल्कि आसमान भी इस तरह खुल गया मानो डॉन के आगे सिर झुका रहा हो. कलफ लगे सफेद कुर्ते में शहाबुद्दीन बेहद नफासत से पेश आ रहे थे, पत्रकारों को 'यार' कहकर पुकार रहे थे. यह पूछने पर कि लोग उनसे इतने भयभीत क्यों हैं, वे भद्र मुस्कान के साथ जवाब दे रहे थे. एमए और पीएचडी डिग्रीधारी शहाबुद्दीन अपनी पढ़ाई के चश्मे में और कांख में किताब दबाए प्रोफेसर की मानिंद दिखाई पड़े और शायद दिखना भी चाह रहे थे. बड़े सुरक्षा अमले के बगैर वे चलकर अपने समर्थकों के बीच आए, उनसे हाथ मिलाते रहे और हल्की-फुल्की बातचीत करते रहे. वे हंसमुख और मिलनसार थे, पर उनकी देहभाषा—अकड़ और इठलाहट, हेठी के साथ कंधे झटकना—पर उनके खास आत्मविश्वास की छाप थी. यह वह शख्स था, जिसके हाथ में कमान थी.

यही जलवा 150 कारों के उस काफिले में भी दिखाई दिया, जिसमें 13 घंटे का सफर करके वे सीवान में अपने कस्बे प्रतापपुर पहुंचे. एसयूवी गाडिय़ों का जत्था गुजरता तो कारें सड़कों से नीचे उतरकर रास्ता खाली कर देतीं और करीब आधा दर्जन टोलगेट आनन-फानन उठा दिए गए. मजाल है कि किसी एक भी ऑपरेटर ने शुल्क मांगने की जुर्रत की हो. मानो पूरा बिहार एक बार फिर उनके हिसाब से ढल रहा था.
यहां तक कि प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस झमेले से दूर ही रहते जान पड़ रहे थे. वही नीतीश जिन्होंने 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद पक्का किया था कि शहाबुद्दीन को कानून की पूरी ताकत का स्वाद चखना पड़े. वे झारखंड में थे और शहाबुद्दीन ने जब उन्हें 'परिस्थितिवश मुख्यमंत्री' बता उनका मजाक उड़ाया, तब उसका जवाब देने में असमर्थ या अनिच्छुक थे. ऐसा लगा कि शहाबुद्दीन की वह हंसमुख बातचीत, पढ़ाकू सरीखी सजधज महज दिखावे के लिए थी. अपने सियासी फन काढ़ते हुए वे बेहद खुश दिखाई दे रहे थे. उनकी बातों ने उस जनता दल (यूनाइटेड) को खफा कर दिया, जो उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का सहयोगी है. नीतीश ने इन चीजों से ऊपर उठने की कोशिश की, यह कहकर कि उन्हें लोगों का जनादेश हासिल है और वे परवाह नहीं करते कि दूसरे क्या कहते हैं, पर आरजेडी के कुछ नेताओं ने जिस तरह 'परिस्थितिवश मुख्यमंत्री' वाली बात का समर्थन किया, उससे साफ तौर पर तनाव दिखाई दिया. आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा, ''लालू हमारे नेता हैं, गठबंधन के दलों के नेताओं ने नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था...मैं इसके हक में नहीं था. '' इसके फौरन बाद, शहाबुद्दीन को बमुश्किल अनदेखा कर रहे जेडी(यू) नेताओं ने लालू को फोन घुमाकर अपनी पार्टी को काबू में रखने के लिए कहा. लालू ने सिर्फ इतना कहा कि शहाबुद्दीन ने नीतीश के खिलाफ कुछ नहीं कहा, वे तो बस आरजेडी और उसके मुखिया के प्रति अपना समर्थन और वफादारी जता रहे थे.

पटना हाइकोर्ट ने 2014 के राजीव रौशन हत्या मामले में 7 सितंबर को शहाबुद्दीन की जमानत मंजूर की है. इस केस में वे साजिशकर्ता के बतौर नामजद हैं. रौशन की हत्या का मुकदमा उनके दो भाइयों की हत्या के केस से अलग चल रहा है. उनके दो भाइयों की हत्या अगस्त, 2004 में सीवान में हुई थी, जिसके लिए शहाबुद्दीन को पिछले साल दिसंबर में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है. 1999 में अपने एक सियासी प्रतिद्वंद्वी के अपहरण और हत्या के जुर्म में भी उन्हें 2007 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.

न्यायिक हिरासत में 11 साल गुजारने के बाद वे पिछले हफ्ते जेल से छूटकर आए. आठ अन्य मामलों में भी उन्हें अलग-अलग मियाद की कैद की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन अपीलों पर सुनवाई जहां अदालतों में घिसट रही है, वहीं वे कम से कम अस्थायी तौर पर जेल से बाहर और लोगों की नजर में लौट आए हैं. इसके अलावा उनके खिलाफ दाखिल 11 और मुकदमे सुनवाई के इंतजार में हैं. इसके बावजूद जेल की जिंदगी और कानूनी पचड़ों से शहाबुद्दीन का हौसला नहीं टूटा है. उनके घने बाल और उजली रंगत कायम है और उनके ताजा शेव किए गालों को देखकर लगता है मानो वे अभी-अभी जेल से नहीं बल्कि हज्जाम की दुकान से निकलकर चले आ रहे हैं.

जमानत पर भौंहें क्यों तन रही हैं
बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने लालू-नीतीश की जोड़ी पर शहाबुद्दीन को जमानत दिलवाने का इंतजाम करने का आरोप लगाया है. पटना हाइकोर्ट का आदेश कहता है, ''मुकदमे में कोई प्रगति न देखकर और हिरासत की अवधि पर विचार करते हुए याचिकाकर्ता को जमानत पर छोडऩे का निर्देश दिया जाता है. '' पिछले दो से ज्यादा साल से सरकार रौशन हत्याकांड में मुकदमा शुरू करने में नाकाम रही. यहां तक कि वह मुकदमा नौ महीनों में खत्म करने के हाइकोर्ट के 3 फरवरी के आदेश का सम्मान भी नहीं कर सकी. जमानत इसलिए भी संभव हो सकी, क्योंकि पुलिस ने उन पर अपराध नियंत्रण कानून (सीसीए) नहीं लगाने का विकल्प चुना, जबकि एक बार पहले शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे रखने के लिए उसने यह कानून लगाया था, इस बिना पर कि वे मुकदमे प्रभावित कर सकते हैं.
मोदी ने कहा कि अगर सरकार चाहती तो वह भागलपुर जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शहाबुद्दीन पर मुकदमा शुरू कर सकती थी. शहाबुद्दीन को सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के बाद पिछली मई में ही भागलपुर जेल लाया गया था. रंजन का परिवार शहाबुद्दीन पर हत्या की साजिश रचने का इल्जाम लगा रहा है. मोदी पूछते हैं, ''जब वह इतने मामलों में शामिल है, तो फिर उसे सीसीए में बुक क्यों नहीं किया गया? उसके बजाए सीसीए मोकामा के विधायक अनंत सिंह (एक अन्य खतरनाक डॉन) पर लगाया गया ताकि वह जेल से बाहर न आ सके, जबकि उस पर अभी जुर्म साबित भी नहीं हुआ है. सरकार ने मुकदमे को कमजोर करने की साजिश की है. '' उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सरकार ने शहाबुद्दीन की जमानत का विरोध करने के लिए दिग्गज वकीलों की सेवाएं क्यों नहीं लीं, जबकि शराबबंदी के फैसले को कोर्ट में चुनौती मिलने पर सरकार ने अपनी नुमाइंदगी के लिए वकीलों की भारी-भरकम फौज कोर्ट में खड़ी करने के लिए खजाने का मुंह खोल दिया था.

शहाबुद्दीन कौन है?
सीवान में 'साहेब' के नाम से पुकारे जाने वाले शहाबुद्दीन सबसे पहले 1996 में आरजेडी के सांसद बने थे. वे 2008 तक सांसद रहे, जब जेल जाने के कारण उनके सियासी करियर पर लगाम लग गई. आपराधिक मामलों में सजा होने की वजह से चुनाव लडऩे से अयोग्य होने तक उन्होंने सीवान से कभी कोई चुनाव नहीं हारा. उनकी चुनावी कामयाबी का सिलसिला 1990 में शुरू हुआ था, जब उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा सीट जीती थी. उसके बाद उन पर लालू की नजर पड़ी और 1995 में वे आरजेडी के टिकट पर विधानसभा में पहुंचे. फिर लालू ने उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया. उनका यह भरोसा कामयाब रहा और सीवान 2008 तक आरजेडी के लिए सुरक्षित सीट बनी रही.

बिहार के पूर्व डीजीपी डी.पी. ओझा ने एक बार कहा था, ''अगर सीवान एक सल्तनत होता, तो शहाबुद्दीन उसके शहंशाह होते. '' पूरे इलाके में उनकी बादशाहत चलती थी. यह थोड़ा अतिरंजित लगता है, पर कहा जाता है कि सीवान में शहाबुद्दीन के पोस्टर के करीब भी कोई थूकने या पेशाब करने की जुर्रत नहीं करता था. ओझा ने शहाबुद्दीन पर 256 पन्नों का डोजियर तैयार किया था, जिसमें 500 अपराधियों के उनके नेटवर्क, एके-47 सरीखे हथियारों के जखीरे और 100 करोड़ रु. की सल्तनत के ब्यौरे दिए गए थे. पर ओझा के रिटायर होने से महज दो महीने पहले दिसंबर 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री और लालू की पत्नी राबड़ी देवी ने उन्हें अनौपचारिक ढंग से पद से हटा दिया. उन 15 वर्षों में जब लालू और उनकी पत्नी ने बिहार का शासन चलाया, सीवान में शहाबुद्दीन का एकछत्र राज रहा. कारोबारी अपनी फैक्ट्रियों और दफ्तरों की दीवारों पर साहेब की तस्वीरें टांगकर रखा करते थे.

उत्थान और पतन
अगर उन्हें लगता था कि वे कुछ भी कर सकते हैं और उनका बाल भी बांका नहीं होगा, तो असल में ऐसा था भी. 1996 में एसपी एस.के. सिंघल पर कातिलाना हमला हुआ जिसमें सिंघल बाल-बाल बचे. इस साजिश में शामिल रहने के लिए शहाबुद्दीन और उनके दो बॉडीगार्डों पर जुर्म साबित हुआ. यहां तक कि जब लालू के साले साधु यादव शहाबुद्दीन से तीखी लड़ाई में मुब्तिला थे, तब भी लालू ने अपने चेले के हक में जुबान खोली थी. लालू और साधु के बीच मनमुटाव असल में यहीं से शुरू हुआ. आरजेडी के एक नेता कहते हैं, ''लालू शहाबुद्दीन को सीवान के मुस्लिम वोटों का एकमात्र रखवाला मानते हैं. '' मार्च, 2001 में जब बिहार पुलिस की एक टीम उनके प्रतापपुर के घर पर छापा मारने गई, तो शहाबुद्दीन की निजी सेना ने गोलियां चला दीं, जिसमें दो पुलिसवालों समेत 10 लोग मारे गए थे.

बिहार में लालू की गद्दी औपचारिक तौर पर छिनने से पहले ही शहाबुद्दीन की किस्मत ने गोता लगाया. राज्य में उन दिनों राष्ट्रपति शासन था और विधानसभा चुनाव चल रहे थे (एक ही साल में दूसरी बार), तब नवंबर 2005 में बिहार और दिल्ली पुलिस की एक संयुक्त टीम ने राजधानी में बिशंभर दास मार्ग पर शहाबुद्दीन के सरकारी आवास से उन्हें गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी प्रतापपुर में उनके घर पर एक छापे में विदेशी बंदूकों, गोलाबारूद और अघोषित विदेशी मुद्रा की बरामदगी के सिलसिले में की गई. इसके साथ ही शहाबुद्दीन की सियासी तकदीर ने पलटा खाया, जब जेडी(यू)-बीजेपी गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और 2005 से 2013 तक राज्य में शासन किया. उन्हें कई जुर्मों की सजा दिलाकर जेल में डाल दिया गया और उनकी बीवी हिना शहाब 2009 और 2014 में लगातार दो चुनाव हार गईं. पर शहाबुद्दीन ने जेल के सीखचों के पीछे से ही वापसी की जब 2014 के लोकसभा चुनाव में भारी हार के बाद लालू ने नीतीश से हाथ मिलाकर गठबंधन बना लिया. इस गठबंधन को 2015 के विधानसभा चुनावों में बिहार में जबरदस्त जनादेश हासिल हुआ. आरजेडी-जेडी(यू) गठबंधन ने सीवान में आठ में छह सीटें जीतीं और इस फतह ने मुस्लिम वोटों पर शहाबुद्दीन की पकड़ फिर साबित कर दी.

जून 2014 के बाद से सीवान में चार सनसनीखेज हत्या हो चुकी हैं और हर बार उंगलियां शहाबुद्दीन की ओर ही उठी हैं. पहली हत्या राजीव रौशन की हुई थी. उसके पिता चंदा बाबू कहते हैं कि वह गवाही देने जाने वाला था और उसके ठीक पहले उसे मार दिया गया. फिर नवंबर, 2014 में बीजेपी के स्थानीय प्रवक्ता श्रीकांत भरतिया को (जिन्होंने हिना शहाब की चुनावी हार में अहम भूमिका अदा की थी) मार दिया गया जब वह एक शादी से घर लौट रहे थे. संदिग्ध शैलेष ने हिरासत में कुबूल किया कि उसे भरतिया की हत्या के लिए रकम दी गई थी. हालांकि उसने शहाबुद्दीन का नाम नहीं लिया. मार्च, 2015 में एक और बीजेपी नेता की हत्या कर दी गई और इस साल मई में एक स्थानीय पत्रकार को ठिकाने लगा दिया गया.

13 मई को जब एक हिंदी अखबार के स्थानीय ब्यूरो प्रमुख राजदेव रंजन की हत्या की गई, तब जांचकर्ताओं ने पाया कि घटना स्थल पर मौजूद मोबाइल फोन पर एक ही नंबर से 36 कॉल आए थे. यह नंबर सीवान जेल के भीतर का निकला जहां शहाबुद्दीन बंद थे. छह दिन बाद जब पुलिस ने जेल में छापा मारा, तब उन्होंने शहाबुद्दीन को वहां दरबार लगाते पाया जिसमें 63 लोग मौजूद थे. पुलिस ने 45 फोन और कई सिम कार्ड बरामद किए, जिनमें से एक अंतरराष्ट्रीय जगह से जारी किया था. इसके फौरन बाद नीतीश के प्रशासन ने उन्हें सीवान जेल से भागलपुर जेल भेज दिया. इसे ज्यादातर लोगों ने इज्जत बचाने की खातिर उठाया गया कदम बताया था. नीतीश ने सीबीआइ जांच की भी सिफारिश कर दी.

रंजन के संदिग्ध हत्यारों ने अजहरुद्दीन बेग उर्फ लड्डन मियां की पहचान हत्या की सुपारी देने वाले शख्स के तौर पर की. बेग शहाबुद्दीन का करीबी सहयोगी है और उसे गिरफ्तार कर लिया गया है. पर पुलिस दोनों के बीच साजिश का कोई रिश्ता जोडऩे में नाकाम रही. रंजन की बहुत-सी खरी-खरी रिपोर्टों के निशाने पर शहाबुद्दीन ही होते थे. उन्होंने सीवान जेल में बिहार के सामाजिक कल्याण मंत्री अब्दुल गफूर और शहाबुद्दीन की एक गुप्त मुलाकात की तस्वीर भी जारी की थी. इससे सरकार को बेहद शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी. रंजन की पत्नी आशा कहती हैं कि रंजन को जेल में तलब किया गया था, पर उन्होंने जाने से मना कर दिया था.

वे नीतीश पर हमला क्यों कर रहे हैं
जुर्म का साबित होना, 11 विचाराधीन मामले और हालिया हत्याओं में परिस्थितिजन्य सबूतों का अंबार शहाबुद्दीन के जमानत को रोकने में नाकाफी साबित हुआ. कोई और होता तो मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने से परहेज करता जिसके राज में उसे जमानत मिली है पर शहाबुद्दीन ऐसे नहीं हैं. उन्होंने अपनी रिहाई के कुछ ही मिनटों में नीतीश के खिलाफ तीखा हमला बोल दिया. आरजेडी के एक बड़े नेता के मुताबिक, शहाबुद्दीन ने ऐसा कुछ तो मुख्यमंत्री के प्रति अपनी लंबे वक्त से चली आ रही नापसंदगी की वजह से किया है. पर सबसे ज्यादा उन्होंने 'लालू की लंबी योजना' के तहत ऐसा किया है. शहाबुद्दीन आरजेडी की जबरदस्त मुस्लिम उम्मीद हैं. उसके लिए वे अपनी खोई जमीन हासिल करने और अपने प्रतिद्वंद्वियों को मैदान से बाहर धकियाने का साधन हैं. आरजेडी नेता कहते हैं, ''लालू ने सिर्फ मौजूदा कार्यकाल के लिए नीतीश की अगुआई वाली सरकार के समर्थन की रजामंदी दी है. अपने बेटों को लेकर उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और लालू के चुनावी गुणा-भाग में शहाबुद्दीन की बड़ी भूमिका है. '' मगर राजनीति में जुर्मो-सितम के पर्याय बन चुके शहाबुद्दीन क्या इतने ज्यादा दिनों तक जेल से बाहर रह सकेंगे ताकि वह भूमिका निभा सकें जिसका उनके रहनुमा ने मंसूबा बांधा है?

Read more!