कोणार्क के सूर्य मंदिर का 112 साल से बंद मुख्य मंडप अब खुलेगा!
प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का 112 साल से बंद मुख्य मंडप पर्यटकों के लिए खुलने की बढ़ी उम्मीद. लेकिन तकनीकी रिपोर्टों को लेकर पुरातत्व विभाग फूंक-फूंककर रख रहा कदम.

भारत के पूर्वी अंचल में एक यही वह ऐतिहासिक स्मारक है, जो देश के शीर्षपुरातात्विक महत्व के बड़े स्थलों में शुमार है. ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से डेढ़ घंटे की दूरी पर बंगाल की खाड़ी के तट पर खड़े कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर के दिन फिरते दिख रहे हैं. हालांकि इसी जून के पहले हक्रते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान यहां की मूर्तियों के संदर्भ में उनकी टिप्पणी चर्चा का विषय बनी. सोशल मीडिया पर मोदी की खासी आलोचना हुई. सूर्य मंदिर 2,000 साल पुराना बताने पर मोदी का मजाक उड़ा. यह मंदिर वैसे 766 साल पुराना है.
पर जो भी हो, इस बहाने कोणार्क का सूर्य मंदिर एक बार फिर से चर्चा में आ गया. वह मंदिर जिसकी भव्यता को देखने 6,000 विदेशियों समेत 28 लाख से ज्यादा पर्यटक हर साल यहां आते हैं. लेकिन इन पर्यटकों को भी शायद इस तथ्य का अंदाजा नहीं कि सूर्यदेव के मुख्य मंडप वाले हिस्से में परिंदा भी पर नहीं मारने पाता, दर्शन के लिए किसी के उधर जाने का तो सवाल ही नहीं. तीन मंडपों में बंटे इस मंदिर का मुख्य मंडप और नाट्यशाला ध्वस्त हो चुके हैं और अब उनका ढांचा ही शेष है. इसके बीच के हिस्से को जगमोहन मंडप या सूर्य मंदिर कहते हैं. इस वक्त इसे स्टील के सैकड़ों पाइपों का सहारा दिया गया है. जगमोहन मंडप पिछले 115 साल से बंद पड़ा है. उसे पर्यटकों के वास्ते खुलवाने की विशेषज्ञों की कोशिशों ने अब उम्मीद बंधा दी है.
बंद होने-खुलने का लोचा
कोणार्क मंदिर को गंग वंश के राजा नृसिंहदेव ने 1255 ई. में बनवाया था. मुगल काल में कई हमलों और प्राकृतिक आपदाओं के चलते मंदिर को खराब होता देख 1901 में तत्कालीन गवर्नर जॉन वुडबर्न ने जगमोहन मंडप के चारों दरवाजों पर दीवारें उठवा दीं और इसे पूरी तरह से रेत से भर दिया गया. इस काम में तीन साल लगे. हालांकि 1994 में इटली के वास्तुशास्त्री और यूनेस्को के सलाहकार प्रोफेसर जॉर्जियो क्रोसी ने अपने एक अध्ययन में पाया कि उक्त मंडप को बंद किए जाते वक्त उसकी दशा शायद उतनी खतरनाक नहीं थी, जितने का अनुमान लगाया गया. क्रोसी और बाद में और भी कई विशेषज्ञों ने कुछ मरम्मत और दूसरे सुझावों के साथ बालू हटाने और मंदिर खोलने की सिफारिश की.
कोणार्क मंदिर के संरक्षण पर छह साल पहले मार्च 2010 में हुई विशेषज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में भी कुछ ऐसी ही राय बनी. इसकी सिफारिशें लागू करवाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के महानिदेशक की अध्यक्षता में संचालन समिति बनाते हुए उसे कई अधिकार दे दिए गए. ओडिशा सरकार के सांस्कृतिक सचिव, आइआइटी खडग़पुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और उत्कल यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के प्रमुख रहे और अब प्राचीन इतिहास विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सदाशिव प्रधान, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआइ), रुड़की के निदेशक और पुरी के जिलाधिकारी को इस समिति का सदस्य बनाया गया. कोणार्क मंदिर से जुड़ी किसी भी योजना को जांच-परख के बाद मंजूरी देने का अधिकार इसी समिति को है. हाल ही में सीबीआरआइ की एक टीम ने एंडोस्कोपी कर मंदिर के भीतर के फोटो लिए और इसके वीडियो भी बनाए, जिनका अध्ययन किया जा रहा है.
समिति के सदस्य सदाशिव प्रधान तो साफ तौर पर कहते हैं कि ''सूर्य मंदिर के गर्भगृह मूर्तिस्थल (जगमोहन मंडप) को पर्यटकों के लिए पहले की तरह खोला जा सकता है." वे दो साल पहले ही दी जा चुकी रिपोर्ट पर अभी तक कोई भी काम शुरू न होने पर हैरत में हैं. प्रधान के शब्दों में, ''भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण चाहे तो कोणार्क मंदिर ठीक वैसा ही हो सकता है, जैसा कि 112-115 साल पहले था. केंद्र सरकार की इच्छाशक्ति इसे भव्य रूप दे सकती है."
पिछले दिनों कोणार्क आए एएसआइ के महानिदेशक डॉ. राकेश तिवारी ने भी कहा था कि एंडोस्कोपी के अच्छे संकेत मिले हैं, लेकिन अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है. सीबीआरआइ ने अंतरिम जांच की एक छोटी रिपोर्ट एएसआइ को दी है, यह पूरी रिपोर्ट नहीं है. रिपोर्ट आने पर उसे दो अन्य विशेषज्ञ समितियों के पास भेजा जाएगा. उन दोनों समितियों की सिफारिश के बाद ही रेत निकालने और दरवाजे हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी. एएसआइ के बंगाल और ओडिशा सर्कल के प्रमुख अशोक पटेल के मुताबिक, पुरातत्व विभाग यह भी पता लगा रहा है कि जगमोहन मंडप के भीतर कौन-सा हिस्सा कमजोर है और कौन-सा मजबूत.
यानी जगमोहन मंडप दोबारा खोलने की दिशा में अभी पहला कदम उठा है. एंडोस्कोपी से मिले ब्यौरों के आधार पर अंदर की दीवारों की मजबूती, उसकी इंजीनियरिंग और नींव, पीठिका वगैरह का गहराई से अध्ययन हो रहा है. दूसरे चरण में रेत निकाली जानी है. दरवाजों की जगह बनी दीवारों को हटाने का काम तीसरे चरण में आएगा.
सूरज का सातवां घोड़ा
कोणार्क मंदिर में लाल बलुए पत्थर पर सूर्यदेव के रथ की बेहतरीन नक्काशी है. मंदिर स्थल को बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के एक रथ के रूप में बनाया गया था. इनमें से एक ही घोड़ा बचा है. कोणार्क की पहचान बन चुके रथ के पहिए बहुत-से चित्रों में दिखाई देते हैं. इस मंदिर में सूर्य देवता की तीन प्रतिमाएं हैं. पहली उगते सूर्य की 8 फुट की, दूसरी दोपहर के युवा सूर्य की 9.5 फुट की और तीसरी डूबते सूर्य की 3.5 फुट की. प्रवेश द्वार पर दो सिंह हाथियों पर हमले को आतुर मुद्रा में मौजूद हैं. दोनों हाथी एक-एक मनुष्य के ऊपर स्थापित हैं. ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर से बनी हैं. वजन है 28 टन. मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है. प्रवेश द्वार पर नट मंदिर है. यह वह स्थान है, जहां मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को अर्पण करने के लिए नृत्य किया करतीं थीं. साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नरों की आकृतियां ऐंद्रिक मुद्राओं में और कामसूत्र से ली गई हैं.
मंदिर की तमाम शिल्पाकृतियां एएसआइ के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित हैं. पर इस पुरा महत्व के मंदिर में असल रोशनी तो तभी आएगी जब धरती पर मौजूद सूरज के द्वार पर्यटकों की नजरनवाजी के लिए भी खुलें.