रघुराम राजन: छोटा दौर मगर असर बेहिसाब
अपेक्षाकृत छोटे कार्यकाल में ही रघुराम राजन का असर ऐसा कि उनके उत्तराधिकारी को बैंकिंग सुधार, महंगाई को कम और आर्थिक वृद्धि दर को ऊंचा रखने की उनकी विरासत को बनाए रखना होगा.

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) को तीन साल तक दुनिया भर में चल रही विपरीत वित्तीय हवाओं के झोंकों के बीच रास्ता दिखाने वाले ''रॉकस्टार" गवर्नर रघुराम राजन कई मायनों में बाहरी आदमी थे. ऐसा पहले कब हुआ जब हिंदुस्तान के केंद्रीय बैंक के किसी गवर्नर की 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की भविष्यवाणी करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई हो? उन्होंने अपने मोहक अंदाज और चौकन्ने व्यवहार से तो अखबारों में जगह हासिल की ही, मुद्रास्फीति के खिलाफ अपनी बेहिचक जंग की वजह से वे तीखी सार्वजनिक बहसों के विषय भी बने.
अब जब 53 वर्षीय राजन 4 सितंबर को पद से विदा होने जा रहे हैं, देश आरबीआइ के 23वें गवर्नर के तौर पर उनके बनिस्बतन छोटे कार्यकाल की खूबियों को लेकर बंटा हुआ है. छोटा कार्यकाल इसलिए कि 1991 के बाद वे इस ओहदे पर पांच साल तक काम न करने वाले सिर्फ दूसरे गवर्नर (एस. वेंकटरमणन पहले थे) होंगे. दूर-दूर तक ये चिंताएं भी जाहिर की जा रही हैं कि इस बदलाव से हिंदुस्तान की छवि को धक्का पहुंचेगा, जिसे मौजूदा सरकार बहुत मेहनत और लगन से निवेश के अनुकूल देश के तौर पर पेश कर रही है. राजन सरीखी प्रतिष्ठा और ऊंचाई का दूसरा शख्स खोज पाना मुश्किल होगा. बुराइयां खोजने वाले चाहे जो कहें, कारोबारियों और अर्थशास्त्रियों में मोटे तौर पर रजामंदी है कि देश की अर्थव्यवस्था उन्हें जिस हालत में मिली थी, उससे कहीं बेहतर हालत में छोड़कर जा रहे हैं. वे अपने पीछे एक अधूरा एजेंडा भी छोड़कर जा रहे हैं, जो विस्तृत वित्तीय सुधारों और भारतीय बैंकिग व्यवस्था की साफ-सफाई का एजेंडा है. राजन के उत्तराधिकार की नियुक्ति जल्दी ही होनी चाहिए, मगर उनका काम पहले से तय है.
यस बैंक के एमडी और सीईओ राणा कपूर कहते हैं, ''मैं उम्मीद करता हूं कि नए गवर्नर बैंकिंग व्यवस्था की साफ-सफाई राजन के जैसी मुस्तैदी और खूबी से करते रहेंगे." कपूर बैंकों की ''गैर-निष्पादित संपत्तियों" (डूबत खाते) पर काबू पाने के लिए आरबीआइ की पहल का जिक्र कर रहे थे. सरकारी बैंकों ने पिछले तीन साल में 1.14 लाख करोड़ रुपए के कर्ज बट्टे खाते में डाले हैं. उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि कुछ बड़ी कंपनियों ने भारी कर्ज लिए और चुकाने में नाकाम रहीं. राजन ने इन बैंकों से कहा कि वे इन कर्जों को बैंक की लेखा-बहियों में अलग खाने में रखें. क्रेडिट इन्फार्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया के अध्यक्ष एम.वी. नायर कहते हैं, ''समय से कर्ज चुकाने को लेकर कॉर्पोरेट कंपनियों के दिमाग में आज ज्यादा डर है."
हालांकि कुछ लोगों को लगता है कि बैंकों और उनके फंसे हुए कर्जों की साज-संभाल के लिए राजन इससे भी ज्यादा कुछ कर सकते थे. एक वरिष्ठ वित्तीय पेशेवर अश्विन पारिख कहते हैं, ''बतौर केंद्रीय बैंकर वे अपनी ऊर्जा एक अलहदा बैंकिंग ढांचा बनाने में लगा सकते थे, जो ज्यादा तगड़ा होता." ऐसा ढांचा व्यावसायिक बैंकों पर बेहतर नियंत्रण रखने में मदद करता.
राजन के उत्तराधिकारी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती आर्थिक वृद्धि को उछाल देते हुए मुद्रास्फीति पर काबू पाना होगी. राजन को महंगाई पर लगाम लगाने का श्रेय दिया जाता है. जब उन्होंने काम संभाला था, तब मुद्रास्फीति 10 फीसदी से ऊपर थी. इसे अब 6 फीसदी से नीचे ले आया गया है, जबकि जीडीपी की वृद्धि 2015-16 में छलांग लगाकर 7.6 फीसदी पर पहुंच गई. हालांकि उन्हें ब्याज दरों को ऊंचा रखकर वृद्धि को रोकने का दोषी ठहराया जाता है.
कपूर कहते हैं, ''वृद्धि की जरूरतों के साथ तालमेल बैठाकर ब्याज दरों की कमी में संतुलन लाना नए गवर्नर का अहम काम होगा." राजन ने खुदरा महंगाई पर निशाना साधा था. नए गवर्नर को क्या उसकी जगह नकारात्मक चल रही थोक कीमतों की महंगाई के पुराने औजार की तरफ लौट जाना चाहिए? कपूर मानते हैं कि मुद्रास्फीति पर निशाना साधने में थोक महंगाई को भी बराबर वजन दिया जाना चाहिए.
रेटिंग फर्म क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं, ''मौद्रिक नीति का मतलब है साख और निरतंरता." अर्थव्यवस्था का आगे का रास्ता जोखिमों से भरा रहने की आशंका है, खासकर तेल की बढ़ती कीमतों के साथ. इस बीच ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के असर से पैदा असुरक्षाएं फीकी पड़ रही हैं, वहीं अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने का डर सिर पर मंडरा रहा है. अगस्त 2013 में जब राजन ने काम संभाला, तब रुपया डॉलर के मुकाबले 68.83 की ऐतिहासिक गिरावट पर पहुंच गया था. नवंबर 2014 में यह 61 तक मजबूत हो गया. हालांकि राजन के ऐलान के बाद 20 जून को यह एक महीने के सबसे निचले स्तर 67.7 तक गिर गया. मुद्रा सलाहकार जमाल मेकलाई कहते हैं, ''कुल मिलाकर बाजार बहुत घबराया हुआ है."
वित्तीय सुधारों का फरमान
राजन के मातहत आरबीआइ ने बैंकों को जनसाधारण तक ले जाने के लिए लंबी छलांग लगाई. उन्होंने 23 नए खिलाडिय़ों को लाइसेंस दिए, जिनमें पेमेंट बैंकों (जो जमा ले सकते हैं लेकिन कर्ज नहीं दे सकते) और छोटे वित्त बैंकों के लाइसेंस शामिल हैं. 2015 में हिंदुस्तान में 23.3 करोड़ की ''बैंकरहित" आबादी थी, जिसकी वजह से यह वित्तीय समावेशन में मील का पत्थर बन गया था. नए गवर्नर को इन सुधारों को जोर देकर आगे बढ़ाना होगा.
आप उन्हें पसंद करें या नहीं, लेकिन राजन को देश के विशिष्ट केंद्रीय बैंकरों में से एक के तौर इतिहास में दर्ज किया जाएगा. उन्होंने अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने में मदद की और ऐसे बदलावों की पटकथा लिखी जिनको आगे बढ़ाना उनके उत्तराधिकारी के लिए बेहतर ही होगा.