कैसे कायम हो यूपी पुलिस का इकबाल

जानें किस तरह नेता-अपराधी-पुलिस गठजोड़ से घटा उत्तर प्रदेश की पुलिस का रसूख.

प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान सीएम अखिलेश यादव
प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान सीएम अखिलेश यादव

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में सक्रिय डकैत ठोकिया और ददुआ को मार गिराने वाली टीम का हिस्सा रहे अनंत देव ने पांच महीने पहले ही गोरखपुर एसएसपी की कुर्सी संभाली थी. प्रांतीय पुलिस सेवा (पीसीएस) से भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) में पदोन्नत हुए अनंतदेव की गिनती प्रदेश के काबिल अधिकारियों में होती है. उनके गोरखपुर में तैनात होते ही अपराधियों की शामत आ गई जब उन्होंने अपनी अनोखी कार्यशैली से गुंडे-माफियाओं के गांव, गली और चौराहों पर उनकी करतूत की मुनादी करवानी शुरू कर दी. उनकी पहल का परिणाम भी मिला जब गोरखपुर के साथ ही आजमगढ़ और वाराणसी रेंज की पुलिस के लिए चुनौती बन चुके माफिया धर्मेंद्र सिंह को एसटीएफ ने खोराबार इलाके में 20 मई को मार गिराया. बदमाशों को ठिकाने लगाने वाले अनंत देव समाजवादी पार्टी (सपा) के दबंग नेताओं से पार न पा सके. दरअसल 13 जून की रात दाऊदपुर में जमीन विवाद के चलते गिरक्रतार करके कैंट थाने लाए गए सपा जिला सचिव गौरव यादव ने सत्ता की ठसक दिखाते हुए पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी गौरव को काबू करने के लिए बल प्रयोग किया. इस सपा नेता की बदतमीजी के बावजूद उसकी पिटाई करने के आरोप में अनंत देव ने तीन चैकी प्रभारियों को सस्पेंड कर दिया था. लेकिन सपा नेताओं के बढ़ते दबाव के बीच मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एसएसपी अनंत देव को भी सस्पेंड कर दिया, जबकि इस पूरे प्रकरण में उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी.

वहीं दूसरी ओर मथुरा में जवाहरबाग प्रकरण की मिसाल भी है. तत्कालीन एसएसपी राकेश सिंह के कार्यालय से कुछ दूरी पर जवाहरबाग में अवैध कब्जा हो गया लेकिन उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी. पुलिस बल में आपसी तालमेल न होने की कीमत 2 जून को एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और थानेदार संतोष यादव ने जान गवां कर चुकाई. पूरे प्रकरण में पुलिस प्रशासन की लापरवाही फौरी तौर पर नजर आ गई थी लेकिन सरकार सपा के एक शीर्ष नेता के करीबी होने की वजह से एसएसपी राकेश सिंह को हटाने की हिम्मत न जुटा सकी. जब चौतरफा दबाव बढ़ा तब घटना के चौथे दिन एसएसपी राकेश सिंह का केवल ट्रांसफर कर दिया गया.

पिछले कुछ दिनों में प्रदेश में घटी ये दो घटनाएं साफ कर देती हैं कि पुलिस व्यवस्था किस कदर राजनैतिक दबाव में जकड़ चुकी है. इसी जकडऩ ने दो लाख की संख्या वाले देश के सबसे बड़े पुलिस बल का इकबाल छीन लिया है. सत्ता का संरक्षण पाए अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और प्रदेश के हर हिस्से में गुंडे-माफिया अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए पुलिस को ही निशाना बनाने से नहीं चूक रहे. प्रदेश में सपा सरकार के सत्ता संभालने के बाद से चार साल में पुलिस पर हमले के कुल 1,045 मामले थाने में दर्ज किए गए जो किसी भी शासनकाल का सर्वाधिक आंकड़ा है.

नेता-अपराधी-पुलिस गठजोड़
पिछले साल 9 जुलाई को हाइकोर्ट ने यूपी पुलिस को लेकर सबसे तल्ख टिप्पणी की थी. मामला सहारनपुर की एक लड़की के अपहरण और गैंगरेप से जुड़ा था. अगस्त, 2014 की इस घटना पर पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही क्योंकि आरोपी सत्ता पक्ष से जुड़े थे. बाद में कोर्ट के आदेश पर अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू की. कोर्ट ने टिप्पणी की, ''उत्तर प्रदेश में नेता, अपराधी और पुलिस गठजोड़ काम कर रहा है. समय रहते यह रवैया न सुधारा गया तो स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं." पिछले साल मई में जालसाजी में गिरफ्तार हुए आगरा के सपा नेता शैलेंद्र अग्रवाल ने पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ए.सी. शर्मा और आनंद लाल बनर्जी के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल कर के पुलिस अधिकारियों के मनमाने तबादले कराकर काफी पैसा बटोरा था. जांच एजेंसियां ये सारे लिंक जोडऩे की कोशिश कर रही हैं. पुलिस पर दबाव केवल राजनैतिक ही नहीं होता, बल्कि नौकरशाही भी अपनी मनमर्जी से इस बल का उपयोग करती है. लखनऊ के एसएसपी रहे राजेश पांडेय की गिनती भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर होती है. लेकिन एक बड़े नौकरशाह के बेटे के रिसेप्शन में उपहार के तौर पर मिले 30 लाख रुपए के हार की चोरी राजेश पांडेय की लखनऊ से विदाई की वजह बन गई. दबाव में पुलिस ने किसी लिखा-पढ़ी के बगैर नौकरशाह के घर में तैनात दो नौकरों को हिरासत में रखा. इसके बाद भी जब हार नहीं बरामद हुआ तो पिछले 16 मई को राजेश पांडेय को हटाकर आतंकवाद निरोधक दस्ते में भेज दिया गया.

नाकाम हुआ खुफिया तंत्र

मुजफ्फरनगर दंगे की जांच कर रहे जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट 6 मार्च को विधानसभा की कार्यवाही के दौरान सदन में रखी गई. इसमें स्पष्ट हुआ कि अभिसूचना (इंटेलिजेंस) तंत्र के नाकाम हो जाने की वजह से प्रदेश सरकार मुजफ्फरनगर दंगे की गंभीरता न भांप सकी. वहीं दूसरी ओर मथुरा के जवाहरबाग में दो साल से हो रहे अवैध कब्जे की रिपोर्ट स्थानीय इंटेलिजेंस के दारोगा ने अपने ऊपर के अधिकारियों को दी थी लेकिन सरकार इस घटना से बेफिक्र रही.

असल में हर जिले में अभिसूचना की दो यूनिट काम करती हैं. पहली लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआइयू) है जो रोज की घटनाओं की जानकारी एसपी को देती है. दूसरी एक स्पेशल ब्रांच है जो रेंज हेडक्वार्टर में बैठे एसपी (अभिसूचना) को गोपनीय सूचनाएं देती हैं. लखनऊ के गोखले मार्ग पर मौजूद अभिसूचना मुख्यालय रोज शाम को प्रदेश भर की सूचनाएं पुलिस महानिदेशक, मुख्यमंत्री कार्यालय और शासन को भेजता है. अगर कोई गंभीर मसला है तो स्वयं अपर पुलिस महानिदेशक (अभिसूचना) मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें संभावित घटना से अवगत कराते हैं. पिछले दस साल से गोपनीय सूचनाओं को सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का यह सिस्टम पूरी तरह से बंद हो गया है. यही कारण है कि हर बार इंटेलिजेंस के मोर्चे पर सरकार मात खा जाती है. यूपी अभिसूचना तंत्र के करीब तीन हजार कर्मचारियों के वेतन पर ही 120 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो जाते हैं लेकिन नतीजा सिफर ही है. यही वजह है कि किसी भी प्रकार का बलवा या दंगा रोकने में यूपी पुलिस को अभी भी पसीने छूट रहे हैं (देखें बॉक्स) क्योंकि इसकी जानकारी समय रहते सरकार को नहीं मिल रही. संगीन अपराधों से निबटने के बावजूद 2015 में छोटे-बड़े कुल बलवों की संख्या में सात फीसदी का इजाफा हुआ है.

माननीयों पर मेहरबानी
अपराधी प्रवृत्ति के नेताओं पर बिना किसी दबाव के मुकदमा दर्ज करने वाला पुलिस बल उस वक्त निरीह साबित होता है जब सरकार एक झटके में इनके मुकदमे वापस ले लेती है. जून, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश देकर सांसद और विधायकों पर चल रहे मुकदमों को एक साल के भीतर फास्ट-ट्रैक-कोर्ट के जरिए निबटाने को कहा था. इसके उलट पिछले दो साल के दौरान प्रदेश सरकार ने अपने मंत्रियों महबूब अली, रघुराज प्रताप सिंह, विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह, ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी और नरेंद्र वर्मा पर दर्ज कई मुकदमे वापस ले लिए हैं.
इतना ही नहीं, विधायक अनूप गुप्ता, जगदंबा पटेल, मोहम्मद रिजवान जैसे विधायकों पर भी सपा सरकार मेहरबान है. अपराधियों को पुलिस के खराब अभियोजन का फायदा भी मिला है. अपराध जगत से राजनीति में कदम रखने वाले माफिया मुख्तार अंसारी के खिलाफ 2010 में मऊ के दक्षिण टोला थाने में मुकदमा दर्ज हुआ था. इस मामले में नौ गवाहों में से अब तक सिर्फ एक की ही गवाही हुई है. हाल ही में उनके भाई अफजाल अंसारी ने अपनी पार्टी कौमी एकता दल का सपा में विलय कर लिया, जिस पर सियासी रार मची. वहीं भदोही के बाहुबली और सपा विधायक विजय मिश्र के खिलाफ एक मंत्री पर जानलेवा हमला कराने के पांच साल पुराने मुकदमे में कुल 84 गवाह हैं पर अब तक कोर्ट में सिर्फ आधे ही पेश हो पाए हैं. पूर्व पुलिस अधीक्षक एस.पी. सिंह बताते हैं, ''सरकार ने एक खास रणनीति के तहत पुलिस के अभियोजन विभाग को खोखला कर रखा है ताकि अपने मनमाफिक काम लिया जा सके." अभियोजन विभाग में अधिकारियों की गिनती करते ही इस आरोप में कुछ सच्चाई नजर आने लगती है. यहां कुल 1,266 अधिकारियों के पद हैं पर सिर्फ 717 अधिकारी ही काम कर रहे हैं. महानिदेशक, अभियोजन डॉ. सूर्य कुमार त्रिपाठी बताते हैं, ''हम संविदा पर अधिकारियों की तैनाती कर स्थितियों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं."

बहरहाल पुलिस का चेहरा बदलने की कवायद में जुटे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए कुछ राहत की खबर भी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में पहली बार कई अपराधों में कमी आई है. इसके बावजूद पुलिस की साख वापस लाने के लिए अभी कई कदम चलने बाकी हैं. असली बदलाव की नींव यहीं से पड़ेगी.

Read more!