चीनी हथियारः चीन की दुनाली
कभी दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक रहा चीन आज सैन्य उपकरणों का तेजी से सप्लायर बनता जा रहा है. भारत के पड़ोसी ही चीनी हथियारों के सबसे बड़े ग्राहक के रूप में उभर रहे.

राष्ट्रपति शी जिनपिंग की निगरानी में पिछले साल 3 सितंबर को पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने तियानानमेन चौक पर अपने भव्य शक्ति-प्रदर्शन के दौरान पहली बार कुछ नए हथियारों को पेश किया था. विडंबना कि यह सैन्य परेड द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति को मनाने के लिए आयोजित हुई थी, जिसे “शांति परेड” का नाम दिया गया था. परेड ने चीनी सेना पर निगाह रखने वाले पर्यवेक्षकों का ध्यान खींचा, क्योंकि पहली बार यहां 4,000 किमी तक मार करने वाली मध्यम दूरी की डीएफ-26 बैलिस्टिक मिसाइल का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ. इस मिसाइल को “गुआम किलर” नाम दिया गया क्योंकि इसकी क्षमता गुआम स्थित अमेरिकी नौसेना के बेस तक पहुंचने की है. इसके अलावा तकरीबन मिथक बन चुके “एयरक्राफ्ट कैरियर विध्वंसक” डीएफ-21डी का भी प्रदर्शन किया गया, जो कुछ लोगों के मुताबिक, दुनिया की पहली जहाजरोधी बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जिनके वजूद पर लंबे समय से विदेशी पर्यवेक्षक संदेह जताते रहे थे कि अमेरिका को भ्रम में डालने की यह चीनी चाल भर है.
सितंबर की इस परेड के बारे में हालांकि सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि इसमें प्रदर्शित जेड19 मारक हेलिकॉप्टरों से लेकर लंबी दूरी के एच-6 बमवर्षक और मिसाइलें तथा टैंक सब के सब चीन निर्मित थे. यह स्थिति दो दशक पहले तक अकल्पनीय थी, जब यह देश हथियारों का सबसे बड़ा आयातक हुआ करता था, जो दर्जा आज भारत को हासिल है.
पिछले साल चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बनकर उभरा है और 2011-15 के बीच अंतरराष्ट्रीय हथियार निर्यात में उसकी भागीदारी 5.9 फीसदी रही है, जो कि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी से भी ज्यादा है. वैश्विक तौर पर हथियारों की बिक्री पर निगाह रखने वाले संस्थान स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआइपीआरआइ) की फरवरी 2016 में जारी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है. इस मामले में चीन अब भी अमेरिका और रूस से काफी पीछे है, जिनकी हथियार बिक्री में भागीदारी क्रमशः 33 फीसदी और 25 फीसदी है और जो अब भी वैश्विक हथियार बाजार पर अपना कब्जा कायम किए हुए हैं.
एसआइपीआरआइ की रिपोर्ट में बीते दस वर्षों के दौरान चीन के हथियार सौदों में जबरदस्त बदलाव देखने को मिला है. चीन का हथियार निर्यात 2006-10 से 2011-15 के बीच 88 फीसदी बढ़ा है और वह अब 37 देशों को हथियार निर्यात करने लगा है. इनमें विमानों से लेकर मिसाइल फ्रिगेट और जहाजरोधी मिसाइलें तक शामिल हैं. इसी अवधि के दौरान बीजिंग ने आयात में जबरदस्त कटौती की जो उसके घरेलू सैन्य-औद्योगिक प्रतिष्ठान की बढ़ती ताकत को दर्शाता है. इस मामले में चीन अब भारत और सऊदी अरब के पीछे है और उसका हथियार आयात आज 4.7 फीसदी है.
कैसे पलटा पांसा
सवाल उठता है कि दो दशक पहले तक खासकर रूस से हथियारों के आयात पर निर्भर रहा चीन आज आधुनिक हथियारों का एक बड़ा निर्माता और निर्यातक कैसे बन गया? हथियार निर्माण को लेकर पीएलए का लंबा इतिहास रहा है. साठ के दशक में ही रूस के सहयोग से माओ की पीएलए ने इसके लिए उद्यम स्थापित कर लिया था, जिसे वहां बिंग गोंगचैंग या सैन्य उद्योग कहा जाता था. इन उद्यमों में हल्के हथियार बनाए जाते थे और ये तमाम प्रांतों में फैले हुए थे. इनके कारखानों में हजारों मजदूर काम करते थे और वे कमतर तकनीक और कच्चे माल के बावजूद बढ़िया उत्पादक थे. चीन ने तो अस्सी के दशक में ही कुछ हथियारों का निर्यात खासकर ईरान और इराक को करना शुरू कर दिया था. पंजाब और जम्मू-कश्मीर में 1980 और 1990 के दशक में भड़के उग्रवाद के दौरान भारत में चीन निर्मित टाइप-56 राइफलों की बाढ़ आ गई थी जो सोवियत एके राइफल का चीनी संस्करण थीं.
चीन में 1989 एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ जब तियानानमेन चौक नरसंहार के बाद चीन के जरिए हथियारों और उच्च तकनीकी सामान के आयात पर पश्चिमी दुनिया की ओर से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया. इस विवशता में चीन ने अपने पुराने उत्पादन मॉडल को पुनर्जीवित किया और वह नए तरीके खोजने लगा क्योंकि वैश्विक बाजार में उसकी पहुंच खत्म हो चुकी थी. पेकिंग यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर और उसके सेंटर फॉर आर्म्स कंट्रोल ऐंड डिसार्मामेंट की निदेशक हान हुआ कहती हैं, “बीना प्रतिबंध के चीन इतनी जल्दी अपनी देसी प्रौद्योगिकी विकसित नहीं कर पाता.”
एक अन्य निर्णायक बात यह हुई कि चीन के तत्कालीन नेता देंग जियाओ पिंग ने बिंग गोंगचैंग को फौज से अलग करने का फैसला ले लिया, सैकड़ों आदिम सैन्य उत्पादन संयंत्रों को बंद करवा दिया और सैन्य उत्पादन के लिए वाणिज्यिक आधार पर सरकार की ओर से संचालित विशाल निगम खोल दिए. हान कहते हैं कि इसी के बाद चीन में सैन्य औद्योगिक सेक्टर खुल सका और उसे मौका मिला कि वह नागरिक क्षेत्र से बेहतर प्रतिभाओं को अपने पास खींचकर ले आए और साथ में मुनाफे वाले नागरिक व्यावसायिक उपक्रम भी चलते रह सकें. इसने नब्बे के दशक में माकूल प्लेटफॉर्म तैयार कर दिया और एक दशक तक लगातार विकास और अनुसंधान में भारी निवेश से यह क्षेत्र “बेतहाशा वृद्धि की स्थिति” मे आ गया है.
चौतरफा बदलाव
चीन के घरेलू सैन्य औद्योगिक प्रतिष्ठान की “बेतहाशा वृद्धि” पर संभवतः सबसे विस्तृत अध्ययन मॉस्को स्थित सेंटर फॉर एनालिसिस ऑफ स्ट्रैटजीज ऐंड टेक्नोलॉजीज (सीएएसटी) ने 2012 में प्रकाशित किया था. रिपोर्ट में निष्कर्ष दिया गया था कि इस सदी के पहले दशक में एयरोस्पेस और जहाज निर्माण के कुछ क्षेत्रों में चीन “दो पीढ़ी आगे की छलांग लगा चुका था” जबकि हालिया “नई सदी के आने तक रक्षा प्रौद्योगिकी आदिम जमाने की सी थी.”
अध्ययन में इस बदलाव का श्रेय चाइना एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन (एवीआइसी) और चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉर्पोरेशन (सीएसएससी) जैसे निगमों की स्थापना को दिया गया. इन सरकारी कंपनियों का इस्तेमाल वाणिज्यिक कारोबारों के लिए भी किया जाता है. यही उनकी कामयाबी की कुंजी रहीः रक्षा उत्पादन की क्षमता चीन की अर्थव्यवस्था के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ती गई. मसलन, सीएसएससी दुनिया की सबसे बड़ी वाणिज्यिक जहाज बनाने वाली कंपनियों में शामिल हो गई और इसने पीएलए नेवी मिसाइल युद्धपोत तथा मालवाहक जहाज बनाने की विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचे को भी हासिल कर लिया. इसमें बने जहाजों को चीन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को बेचता है.
शुरुआत में शिपयार्ड का निर्माण रूसी सहयोग और डिजाइन से किया गया था लेकिन इस सदी की शुरुआत में चीन अपनी क्षमताएं बढ़ाने लगा. सन् 2000 के बाद सीएसएससी ने 300 मीटर से ज्यादा लंबाई वाले 22 ड्राइ डॉक (बड़े जहाजों के निर्माण में इस्तेमाल किए जाने वाले) बनाए हैं और छह ऐसे डॉक हैं जो 480 मीटर लंबे हैं. ये मिलकर चीन की डॉक की क्षमता के मामले में दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाते हैं (सीएएसटी के मुताबिक, रूस के पास 300 मीटर लंबा एक भी ड्राइ डॉक नहीं था).
पहला कदम यदि उत्पादन क्षमता को बढ़ाने का था, तो दूसरा कदम नवाचार की क्षमता विकसित करना था और रूस तथा इज्राएल से आयातित डिजाइन को चीन के अनुकूल बनाना था. इस मामले में चीन का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है. जहाज बनाने में जो कामयाबी मिली, उसकी विमानों के साथ तो तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि चीन अब भी हथियार प्रणालियों, रडार और विमान के इंजन के मामले में आयात पर निर्भर है. मसलन, पांचवीं पीढ़ी के देसी जेट विमानों जे20 और जे31 के निर्माण में मिली सीमित कामयाबी के चलते चीन को दो अरब डॉलर की लागत से रूस से 35 सुखोई विमान खरीदने पड़े. यह सौदा एक ओर चीन की सीमा को दर्शाता है तो दूसरी ओर रूस की तरफ से अविश्वास के लंबे अतीत के बावजूद चीन के साथ आधुनिक प्रौद्योगिकी साझा करने की उसकी अहमियत को दिखाता है. चीन ने अगर कामयाबी के साथ कोई विमान निर्यात किया है तो वह इकलौता जेएफ-17 है जिसका निर्माण पाकिस्तान के साथ मिलकर किया जा रहा है.
बढ़ते कदम
अमेरिका और रूस के मुकाबले प्रौद्योगिकी हासिल करने के मामले में चीन को अभी लंबी दूरी तय करनी है लेकिन उसने एशिया के हथियार बाजार में अपनी अच्छी पैठ बना ली है. पिछले दशक के दौरान बीजिंग ने पाकिस्तान और बांग्लादेश को युद्धपोत निर्यात किए हैं, क्वयांमार और थाईलैंड को जहाजरोधी मिसाइलें दी हैं और वेनेजुएला को लड़ाकू विमान दिए हैं. एसआइपीआरआइ के मुताबिक, 2011-15 के बीच निर्यात किए गए 555 आधुनिक लड़ाकू विमानों में से रूस की 209, अमेरिका की 175 और चीन की 74 विमानों में हिस्सेदारी रही है. पिछले साल के अंत तक पनडुब्बियों के दिए गए 48 ऑर्डर में से चीन को सबसे ज्यादा हिस्सा मिला और उसे अभी दस पनडुब्बियां डिलीवर करनी हैं. इनमें आठ पाकिस्तान और दो बांग्लादेश को दी जाएंगी.
व्यापार के रुझान दिखाते हैं कि पिछले दशक के दौरान चीन की हथियार बिक्री ने उसकी विदेश नीति के एजेंडे को संचालित किया है. चीन ने जितनी आसानी से निर्यात सौदों को लेकर अपना पक्ष रखा है, वह केवल कारोबार का मामला नहीं है. चीन ने उन देशों पर ज्यादा जोर दिया है जो या तो उसके करीबी पड़ोसी हैं जैसे दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया या फिर अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देश, जिनके चीन के सतत प्रतिद्वंद्वी अमेरिका से तनावपूर्ण रिश्ते हैं.
चीन के “हर मौके के दोस्त” पाकिस्तान ने इसका खूब लाभ उठाया है. चीन के बेचे हथियारों में एक-तिहाई पाकिस्तान खरीदता है जिसमें विमान, मिसाइलें और युद्धपोत शामिल हैं. म्यांमार और थाईलैंड भी हाल ही में चीन के बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं जिसमें जहाज, जलयान, टैंक, मानवरहित हवाई विमान और पनडुब्बी शामिल हैं.
पेकिंग यूनिवर्सिटी की हान हुआ कहती हैं कि चीन के बेचे जाने वाले हथियारों का उसकी विदेश नीति से बेहद मामूली संबंध है. वे कहती हैं, “समस्या यह है कि जब आप गठजोड़ तंत्र की बात करते हैं, तो जापान और यहां तक कि दक्षिण कोरिया तक ऐसे कई देश हैं जिन्हें चीन अपने हथियार नहीं बेचता.”
इसलिए बीजिंग ने बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए वेनुजुएला जैसे देशों पर ध्यान दिया है. हालांकि अधिकतर चीनी विशेषज्ञों की तरह हान बीजिंग के इस उभार को अभी उल्लेखनीय नहीं मानतीं और कहती हैं कि यह अमेरिका और रूस से अभी काफी पीछे है. हालांकि वे कहती हैं कि घरेलू सैन्य औद्योगिक दायरे का विकास बीजिंग की उच्च प्राथमिकता रहेगी.
चीन के नेताओं की यह धुन खासकर 1999 के बाद से बढ़ती गई जब अमेरिका ने बेलग्रेड में चीनी दूतावास पर कोसोवो की जंग में बम गिरा दिया था. चीनी नेता इस फैसले पर पहुंचे थे कि हर महान ताकत के पास उसकी अपनी क्षमताएं होनी चाहिए. हान इस बात से सहमत हैं. वे कहती हैं, “अगर आप इतिहास देखें, तो जंग उन देशों ने जीती है जिनके पास सामने वाले के मुकाबले अपनी सेना को लैस करने की मजबूत क्षमता रही है. इनमें शायद ही वे देश रहे होंगे जो प्रौद्योगिकी के आयात पर निर्भर रहे हैं.”