पंजाबः मोर्चे पर कैप्टन
पंजाब में 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार करने अभी से सड़क पर उतर चुके हैं अमरिंदर सिंह. इधर, सत्ताधारी गठबंधन अमरिंदर की वापसी से खौफ खा रहा है.

अभी पंजाब विधानसभा चुनाव में साल भर से ज्यादा का वक्त बाकी है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले एक महीने के दौरान पंजाब के भीतरी इलाकों को जितना नाप लिया है, उतनी यात्रा उन्होंने मई, 2014 में अमृतसर से बीजेपी नेता अरुण जेटली को हराने के बाद बीते 19 महीनों में भी नहीं नहीं की थी. राज्य में दोबारा कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद वे जल्दी में दिख रहे हैं. चुनाव प्रचार का काम उन्होंने असामान्य रूप से काफी पहले ही शुरू कर दिया है. इसकी वजह यह है कि 2017 के चुनाव में उनके सामने दोहरी चुनौती है-पहली सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन के रूप में और दूसरी आम आदमी पार्टी, जो राज्य में तेजी से उभर रही है.
आजकल पटियाला में उनका खानदानी आवास न्यू मोतीबाग और चंडीगढ़ का आवास बीते दिनों की झलक दे रहे हैं. उनके दरवाजे पर तैनात राज्य पुलिस कुछ ज्यादा ही विनम्र दिखती है. भीतर समर्थकों का तांता लगा हुआ है और वे सबसे मिल रहे हैं. अपने पुराने आलोचकों से भी मिलने में उन्हें गुरेज नहीं है. वे नहीं चाहते कि उनके ऊपर “पहुंच से बाहर होने” और “करीबी लोगों से घिरे होने” का पुराना आरोप दोबारा लगे.
बीती 27 नवंबर को 73 साल के इस नेता के हाथ में तीसरी बार राज्य की कमान देने का फैसला दिखाता है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने वास्तव में अपनी रणनीति पर दोबारा विचार किया है क्योंकि पहले वे राज्य इकाइयों में नई पीढ़ी को नेतृत्व थमाने की कोशिश कर रहे थे. इसी सिलसिले में राज्य में पार्टी की लगातार दूसरी हार के बाद मार्च, 2012 में प्रताप बाजवा को लाया गया था, लेकिन यह फैसला कारगर साबित नहीं हुआ. बल्कि हुआ यह कि इससे धड़ेबाजी और बढ़ गई, जिसके चलते ज्यादातर नेता अमरिंदर के पीछे हो लिए.
अब सवाल उठता है कि दिल्ली में बैठे आलाकमान का दिल कैसे बदला? अमरिंदर कहते हैं, “मुझे इसका कोई अंदाजा नहीं. नवंबर की शुरुआत में लंदन से वापसी के तुरंत बाद राहुल ने मुझे बुलवा भेजा और कहा कि उन्होंने मुझे पीसीसी का अध्यक्ष बनाने का फैसला किया है.” (अंदर बैठे लोग बताते हैं कि कांग्रेस आलाकमान अलग पार्टी बना लेने की अमरिंदर की धमकी से डरा हुआ था और उन्हें कमान थमाने का नुस्खा यहीं से आया, जो कि कारगर साबित हुआ.)
गौर तलब है कि अमरिंदर ने 20 सितंबर को राहुल गांधी के बारे में कहा था कि वे भारत को पर्याप्त नहीं समझते. आज वे कुछ भी कहने में काफी सतर्क हैं. पंजाब में राहुल के प्रयासों की पुष्टि करते हुए वे कहते हैं, “पिछले कुछ महीनों के दौरान उनसे (राहुल) हुए संवादों के बाद मैं आपको दावे के साथ बता सकता हूं कि मैंने उन्हें काफी सुलझा हुआ पाया है. कोई भी पैदाइशी नेता नहीं होता. लोग खुद को गढ़ते हैं और परिपक्व होते हैं. मुझे भरोसा है कि मौका आने पर वे (राहुल) इस देश के लिए एक महान नेता साबित होंगे.” कांग्रेस के परोक्ष मुखिया के साथ अपने नए रिश्तों के बारे में अमरिंदर स्वीकार करते हैं, “वे बहुत ध्यान से चीजों को सुनते हैं. अक्सर हमारे बीच सहमति होती है, लेकिन उनके पास अक्सर ऐसी दलील होती है जो मेरी दलील से मजबूत होती है.”
पंजाब विश्वविद्यालय के लॉ ऑडिटोरियम में खड़े होकर सब अमरिंदर का स्वागत करते हैं. जैसा कि वे चाहते थे, यह संवाद बिना किसी बंदिश के चला. मानवाधिकार के एक मेधावी छात्र तनहीर बरियाना ने सवाल पूछा, “आप मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. असली कमान किसके हाथ में होगी? आपके या उस गिरोह के, जो आपको घेरे रहता है?” कैप्टन एक पल को ठहरते हैं, फिर तत्परता से जवाब देते हैं, “मुख्यमंत्री के रूप में किसी को भी सक्षम लेकिन वफादार लोगों की जरूरत होती ही है.” ऐसे ही एक सवाल के जवाब में वे कहते हैं, “कोई भी कोने में अकेले बैठकर काम नहीं कर सकता. मेरे पास अपना दिमाग है. मैं सुनता सबकी हूं, लेकिन फैसला सबको सुनने के बाद खुद ही लेता हूं.”
हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री को इस बात का एहसास है कि अपने पिछले कार्यकाल (2002-2007) के दौरान “बदनाम” हो चुके लोगों के साथ बने रहने के क्या खतरे हैं. इसीलिए इस बार उनके साथ पाए जाने वाले पुराने चेहरे बिल्कुल नदारद हैं. इसी तरह 22 जनवरी को होशियारपुर के छब्बेवाल स्थित एक कॉलेज की लड़कियों के साथ स्काइप पर हुए संवाद सत्र में भी वे अकेले ही नजर आते हैं. दस दिन बाद संधौर गांव में किसानों की समस्याओं को सुनते वक्त या फिर मलेरकोटला के टर्निंग प्वाइंट मैरेज पैलेस में युवाओं के सवालों का जवाब देते वक्त भी उनके साथ केवल पार्टी के स्थानीय नेता ही मौजूद रहे, जिनमें पूर्व विधायक रजिया सुल्ताना भी शामिल थीं. कम से कम अभी तो सार्वजनिक रूप से उनका पुराना भीतरी गिरोह सामने नहीं दिख रहा.
देहरादून के दून स्कूल में अमरिंदर से बीस साल जूनियर रहे मनप्रीत के बारे में कई लोगों का ख्याल है कि वे पार्टी में एक अहम राष्ट्रीय भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं. मनप्रीत मानते हैं कि अमरिंदर का व्यक्तित्व “करिश्माई भी है और साहसी भी, जो 2017 में कांग्रेस को नेतृत्वकारी भूमिका में ले आएगा.” वे इस ओर इशारा करते हैं कि किस तरह कैप्टन भारतीय फौज छोडऩे के बाद 1965 के मॉनसून के दौरान दोबारा फौज में चले गए, जब पाकिस्तान के साथ जंग छिड़ी. मनप्रीत अपने चाचा और उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल की पार्टी शिरोमणि अकाली दल के धनबल को चुनौती देने में अमरिंदर की कामयाबी को भी गिनवाते हैं.
सत्ताधारी गठबंधन वास्तव में अमरिंदर की वापसी से खौफ खा रहा है. इसे उसके बयानों से समझा जा सकता है. मुख्यमंत्री बादल ने अमरिंदर को “क्रोनिक टर्नकोट” (पुराना दल बदलू) करार दिया तो राज्य बीजेपी के मुखिया कमल शर्मा ने लगातार उन पर हमला बोला और उन पर “खालिस्तानी आतंकवादियों के साथ मिले होने” का आरोप भी लगाया. यहां तक कि आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने भी 14 जनवरी को माघी मेले में जब बादल खानदान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने अभियान की शुरुआत की तो अपना हमला उन्होंने मोटे तौर पर अमरिंदर पर ही केंद्रित रखा और उन पर सत्ताधारी खानदान के साथ मिले होने का आरोप लगा दिया.
करीब पांच दशक राजनीति में रहने के बाद हो सकता है कि 2017 अमरिंदर के लिए आखिरी कामयाबी का सबब बने. यह कामयाबी सबसे ज्यादा कठिन भी साबित हो सकती है. जैसा कि मनप्रीत कहते हैं कि सत्ताधारी अकाली-बीजेपी के पास दस साल के राज (वे इसे लूट कहते हैं) में अकूत संसाधन इकट्ठा हो गए हैं. अगर पिछले चुनावों को ध्यान में रखें&जब उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने काफी महीन तरीके से चुनावी गणित को अपने पक्ष में मोड़ लिया था-तो अमरिंदर एक बार फिर बाहर रह जा सकते हैं.
हालांकि उन्हें इस बात का भरोसा है कि सत्ता विरोधी माहौल ऐसे स्तर पर पहुंच चुका है, जहां नतीजों का “मैनेज करना” संभव नहीं रह गया है. वे कहते हैं, “मैंने ऐसी सरकार नहीं देखी, जिससे लोग इतनी नफरत करते हों.” वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि “फरीदकोट के बहबल कलां गांव में (14 अक्तूबर को) ग्रंथसाहब फाड़े जाने की घटना का विरोध कर रहे ग्रामीणों पर पुलिस की गोलीबारी, अबोहर में एक अकाली नेता के फार्महाउस के भीतर (11 दिसंबर को) एक दलित भीम टांक की जघन्य हत्या, मुख्यमंत्री के अपने चुनाव क्षेत्र लॉबी में एक अकाली नेता की बस से कुचली गई 12 साल की स्कूली बच्ची के शव को पुलिसवालों द्वारा जबरन छीने जाने के बाद भड़के आक्रोश का सिलसिला अभी थमा नहीं है. इन घटनाओं ने पंजाबी मतदाताओं को “सुखबीर की साजिशों” से काफी आगे ले जाकर धकेल दिया है.आम आदमी पार्टी भी चिंता का प्रमुख कारण है, जिसके बारे में पंजाब कांग्रेस के पूर्व प्रमुख बाजवा मानते हैं कि वही “असली खतरा” है. वे कहते हैं, “हमें (कांग्रेस को) किसी तरह 18-30 साल के बीच के युवाओं को अपनी ओर करना होगा, जिन्होंने अकाली दल के बेकार शासन को ही देखा है और कांग्रेसी राज की जिन्हें कोई याद नहीं है.” अमरिंदर के एक वफादार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि असली चुनौती “मतदाताओं को राजी करने की होगी कि अमरिंदर के नेतृत्व में कांग्रेस व्यवस्था परिवर्तन ला सकती है. युवा मतदाता केवल सरकार को बदलने की इच्छा नहीं रखते. उनके मां-बाप ने सरकारों को बदलते ही देखा है. उन्हें व्यवस्था परिवर्तन का आश्वासन चाहिए और आम आदमी पार्टी यह वादा जरूर कर रही है.”
मलेरकोटला में 2,000 युवाओं की उत्साही भीड़ से अमरिंदर कहते हैं, “मैं 73 का हो चुका हूं. मेरा वक्त अब खत्म हो रहा है. मैं यह सब आपके लिए कर रहा हूं. पंजाब के अगले सूबेदार आप हैं.” वे पूछते हैं, “फेसबुक पर आपमें से कितने लोग मेरे मित्र हैं?” कम-से-कम 500 हाथ ऊपर उठ जाते हैं. वे कहते हैं, “अब ठीक है दोस्तो!” अपने प्रचार में अमरिंदर का निशाना विशेष रूप से 18-35 साल के बीच के नौजवान हैं, जिनकी आबादी कुल 2.9 करोड़ पंजाबियों के बीच 90 लाख है. प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले बीसेक साल के मुस्लिम शिक्षक समीर मलिक हों या नशे में धुत्त दिख रहे युवा किसान स्वर्ण सिंह भंगू, अमरिंदर सबकी सुन रहे हैं.
बातचीत खत्म होने के बाद जब वे भीड़ से निकलने लगते हैं तो एक सिख युवक गुस्से में पूछता है, “कांग्रेस की सरकार ने 1984 में हरमंदर साहब (स्वर्ण मंदिर) में फौज भिजवाई थी. क्या आपको लगता है कि यह सही कदम था?” अमरिंदर बिना चूके जवाब देते हैं, “गलत सी” (गलत था). वे उस युवा को प्यार से याद दिलाते हैं कि इस मसले पर उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी. वे कहते हैं, “इसी तरह चार साल बाद 1988 में मैंने मंत्री का पद छोड़ दिया था, जब अकाली सरकार ने हरमंदर साहब में पुलिस भिजवा दी थी (ऑपरेशन ब्लैक थंडर).” इस जवाब के बाद उनके समर्थकों में बीस साल का यह नौजवान भी जुड़ जाता है.
एक राजनेता के तौर पर अमरिंदर की कामयाबी का राज उनकी साहसिक शख्सियत है, जिसके चलते वे पार्टी आलाकमान को भी चुनौती दे देते हैं. इसी साहस के दम पर उन्होंने बादल परिवार को निशाने पर लिया और 2005 की जुलाई में सभी निकटस्थ राज्यों के साथ जल-बंटवारा संधियों को खत्म करने के लिए कानून बनवाया. अमरिंदर कहते हैं कि इस बार वे अपना प्रचार “सकारात्मक” रखना चाहते हैं. वे बादल खानदान की निंदा नहीं करेंगे. उनके पास पहले से ही अर्थशास्त्रियों और पूर्व नौकरशाहों की सक्षम टीम है, जिसके भरोसे वे पंजाब के लिए नई रणनीति पर काम कर रहे हैं जो उनके मुताबिक, “आजीविका के मसलों पर जनता को नई उम्मीद और वास्तविक विकल्प मुहैया कराएगी.”
मलेरकोटला से हम चंडीगढ़ के बाहरी इलाके जिरकपुर तक साथ जाते हैं. यह दिन का उनका आखिरी पड़ाव होगा. यहां अकाली नेता दीपेंदर ढिल्लों के बेटे की शादी का रिसेप्शन समारोह है. पंजाब में शादियां सियासी वफादारी का अचूक पैमाना होती हैं. अमरिंदर इस समारोह में प्रतिष्ठित अतिथि के रूप में मौजूद थे. यह साफ संकेत था कि ढिल्लों के सियासी भविष्य की दिशा क्या होने वाली है (और बेशक ऐसा ही है क्योंकि ढिल्लों, जिन्हें अकाली दल से इस समारोह के ठीक बाद निकाला गया था, वे आज वापस कांग्रेस में आ चुके हैं).
वापसी की यात्रा दिलचस्प थी. अमरिंदर टोयोटा एसयूवी की आगे की सीट पर बैठे सोशल नेटवर्क पर समर्थकों के जवाब देने में व्यस्त हैं. वे अपने 27 वर्षीय पोते निवरन संधू से अपनी पोस्ट के “पेज व्यू” और “शेयर” की जानकारी लेते हैं. दो घंटे की लंबी यात्रा के दौरान अमरिंदर अपने स्मार्टफोन से एकाध बार ही निगाह ऊपर उठाते हैं. एक बार उन्होंने अपने कर्मचारी से कहा कि वह चंडीगढ़ में एक रसोइए का इंतजाम करे, जो उनके एक दोस्त के घर परोसे गए चिकन के एक व्यंजन की रेसिपी सीख सके. अपने नए एफबी दोस्तों को फोन पर देखने से पहले वे उसे हिदायत देते हैं, “उसे बोलो कि बोनलेस चिकन इस्तेमाल करे. वह बेहतर होता है.”
मनप्रीत को भरोसा है कि माझा, दोआबा और मालवा के क्षेत्रों में कांग्रेस का परंपरागत वोटबैंक कायम रहेगा और तितरफा संघर्ष में पार्टी को लाभ पहुंचाएगा. अकाली नेता रह चुके और आम आदमी पार्टी से कई बार लुभाए जाने के बाद कांग्रेस में शामिल हो चुके मनप्रीत कहते हैं, “यह आसान नहीं होगा, लेकिन मुमकिन जरूर है.” इस दौरान वे ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि 2017 चुनावी राजनीति में उनका आखिरी दांव होगा. अपनी कामयाबी का वादा करते हुए वे कहते हैं, “मैं शुरुआत में फौजी था और आज भी वैसा ही हूं. मैंने कभी किसी जंग से कदम पीछे नहीं खींचे हैं.”