सेक्स सर्वेः छोटे शहरों में दिल हूम हूम करे
पार्टनर से इतर संबंध बनाने के मामले में गैर मेट्रो शहर आगे क्यों हैं? शायद इसलिए क्योंकि खुद की आजादी अब उतनी ही बड़ी चाहत है जितनी कि किसी अहम शख्स से रिश्ते.

यह बात थोड़ी विचित्र-सी नहीं लगती? यही कि आज करीब एक सदी के बाद भी फिल्मों और उपन्यासों में एक अमिट भावना के तौर पर प्रेम की आधुनिक पैकेजिंग में हम उसी पुरानी जगह पर खड़े हैं. नए युग में वैसी पैकेजिंग तो बरकरार है, लेकिन पैक अपने आप में खाली है. ऐसी दुकानों की कमी नहीं, जो प्रेम की सस्ती सामग्री धड़ल्ले से बेच रही हैं. इसी के साथ-साथ हम उन फिल्मों की ओर भाग रहे हैं, जिनमें शायद ही कभी ऐसी भरोसेमंद कहानी दिखाई जाती हो, जो बताए कि प्रेम अमिट और सदा के लिए होता है.
इसी के साथ इंडिया टुडे का सेक्स सर्वे 2016 भी यह दिखा रहा है कि स्थायी प्रेम की कल्पना धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही है. सर्वे दिखाता है कि यह भावना देश के खास कर छोटे शहरों में बहुत तेजी से क्षीण होती जा रही है. हमें उस तीर के बारे में क्या कहना चाहिए, जो नाजुक दिल की परतों को चीरकर रख देता है. प्रेम का अंत कैसे हो जाता है? और आखिर ऐसा क्यों है कि ऊपर से जो कुछ भी ठोस और मजबूत दिखाई देता था, वह छोटे शहरों की हवा में गायब होता जा रहा है?
लेकिन पहले कुछ चौंकाने वाले आंकड़े. सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि महानगरों में (अपने पार्टनर के अलावा) किसी दूसरे के साथ प्रेम संबंध बनाने के मामले अपेक्षाकृत कम (10-12 फीसदी) हैं, जबकि टियर-2 श्रेणी के शहरों में अपने साथी के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ प्रेम संबंधों के मामलों का प्रतिशत अपेक्षाकृत ज्यादा है. दिल की चंचलता के आंकड़ों की सूची में अहमदाबाद सबसे ऊपर है, जहां यह संख्या 26 फीसदी है.
इसके बाद नंबर आता है कोच्चि (21 फीसदी) और रांची (20.5 फीसदी) का. कुछ सालों से गुडग़ांव भी एक बड़े शहर का रूप ले चुका है. कुछेक साल पहले इसी गुड़गांव से लगे एक गांव में कुछ युवाओं से बात करते हुए मुझे पता चला कि वैलेंटाइंस डे को वे अपनी प्रेमिकाओं के साथ गुडग़ांव के मॉल में जाया करते हैं, जबकि उनकी बीवियां घरों में होती थीं. आकांक्षाओं का गांव भी अब गैर-मेट्रो शहर से ज्यादा पीछे नहीं.
तृप्ति की यह खोज और चाहत जीवन का लक्ष्य बन चुकी है. पहले की पीढिय़ां और उसमें भी खासकर महिलाएं विवाह के कठोर बंधन में बंध जाती थीं और जीवन भर उन्हें उसका निर्वाह करना पड़ता था.
लेकिन अब दूसरी बहुत-सी चीजों की तरह संबंध भी एक आकांक्षा की वस्तु बन चुके हैं. यह एक अनवरत तलाश हो गई है. लेकिन यह इतना रोचक विषय क्यों हो गया है कि इस तरह की 'गतिविध' अब हम गैर-मेट्रो शहरों में देख रहे हैं, और इससे भी ज्यादा रोचक बात यह क्यों है कि अब लोग इसके बारे में खुलकर बात करना चाहते हैं?
परिपूर्णता और संतृप्ति की यह तलाश शादीशुदा संबंधों में पूरी नहीं हो पाती. इस तृप्ति की तलाश के मामले में गैर-मेट्रो शहर आधुनिक समय के प्रतीक बन गए हैं. रांची और शोलापुर (और जमशेदपुर तथा दुर्गापुर) में नई चीजें (पिज्जा) और जगहें (मॉल और कैफे) आ रही हैं. इसके साथ ही युवाओं में खुद को नए जमाने के हिसाब से बदलने की चाहत भी पैदा हो रही है. कामनाओं की इस फंतासी में वे घरेलू बंधनों से मुक्त जीवन की कल्पना करने लगे हैं.
लेकिन सवाल यह है कि इस तरह की चाहत खास तौर पर गैर-मेट्रो शहरों में ही देखने को क्यों मिल रही है? एक संभावित कारण यह हो सकता है कि महानगर में खुद को अभिव्यक्त करने, करियर बनाने, मौज-मस्ती और खान-पान के ढेरों विकल्प उपलब्ध होते हैं. वहीं गैर-मेट्रो शहरों में स्थिति ठीक उलट है. वहां भीतर की अभिव्यक्ति के लिए खुद को ही आगे बढ़ाना होता है क्योंकि यही एक चीज उनकी पहुंच के भीतर है. यही वजह है कि वे अपने विचार ज्यादा खुलकर व्यक्त करते हैं और ज्यादा साहसी दिखाई देते हैं.
खुलेपन का मकसद खुद को अभिव्यक्त करना और अर्थपूर्ण बताना है. जैसे कि अहमदाबाद के लोगों को आप यह कहते हुए सुन सकते हैं कि दिल्ली और मुंबई के अलावा और भी बहुत-सी जगहें हैं, जहां जिंदगी और संभावनाएं हैं, जहां आप काफी कुछ कर सकते हैं. बाकी की जिंदगी हमारी पहुंच और पकड़ की सीमा से बाहर है, लेकिन कम से कम यह आत्माभिव्यक्ति तो अपने हाथ में है.
सेक्स सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि गैर-मेट्रो शहरों में उज्ज्वल भविष्य की तलाश में मौजूदा परिस्थितियों के दलदल से निकल भागने की घटनाएं सबसे तेजी से घटित हो रही हैं. पुणे के 31.3 फीसदी उत्तरदाताओं का कहना है कि लोग विवाहेतर संबंधों के प्रति आसानी से आकर्षित हो जाते हैं. एक से ज्यादा लोगों से प्रेम संबंध रखने के मामले में चंडीगढ़ और गुडग़ांव का नाम सबसे ऊपर है.
बेवफा पार्टनरों और समूह सेक्स के मामले में कोच्चि अव्वल है. गैर-मेट्रो शहर दरअसल शहर और गांव के बीच कही फंसकर रह गए हैं. यहां की आदतें और व्यवहार गांव की चाय की दुकान और शहरी कैफे कॉफी डे के बीच का है. वह गांव की सामाजिकता को तो छोड़कर आगे निकल आया है, लेकिन शहर की मुक्त सामाजिकता में घुलने में संकोच भी है. इसलिए न तो वह इस तरफ है, और न उस तरफ.
इन शहरों में लड़कियां जींस के साथ कुर्ता टॉप पहनती हैं और लड़के अपनी प्रेमिकाओं के कानों में झूठी कसमें खाते हैं क्योंकि वे मां-बाप की पसंद से शादी की तैयारी कर रहे होते हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि उनका प्रेम भारतीय परंपरा के अनुसार शादी की शक्ल ले लेता है, जिसे 'प्रेम और पारंपरिक विवाह' का नाम दिया जाता है.
लेकिन आमतौर पर गैर-मेट्रो शहर अभी ग्रामीण नियमों और औद्योगिक इच्छाओं के मिश्रण के साथ हल्की आंच पर धीरे-धीरे खदबदाने की स्थिति तक ही पहुंच पाए हैं. अभी इसमें उबाल आया नहीं है. लेकिन सेक्स सर्वे की यह मौजूदा रिपोर्ट एक बड़े बदलाव की खबर बन सकती है. थोड़े-से नाराज पुरुष और महिलाएं आदत और चाहत के बीच फर्क करना सीख रहे हैं. उस समाज में जहां आदतें डाली जाती हैं और चाहतों को हतोत्साहित किया जाता है. गैर-मेट्रो शहरों में विवाहेतर संबंधों की सामाजिक स्वीकार्यता तो नहीं, फिर भी वे बढ़ रहे हैं.
चेन्नै में 37 फीसदी लोग, जिन्हें प्रेम का एहसास नहीं है और इंदौर में 22.5 फीसदी लोग जो तीन से ज्यादा बार प्रेम कर चुके हैं, शायद इस सचाई को स्वीकार कर रहे हैं कि इच्छा में अगर कोई चीज स्थायी है तो वह है चपलता यानी मन किसी एक के साथ टिककर रहने वाला नहीं. मतलब, इनसान की यही वास्तविक फितरत है. इसका यह भी मतलब है कि विवाह अब सिर्फ सामाजिकता और संपत्ति से जुड़ी एक व्यवस्था है, जिसमें किसी अन्य के साथ अंतरंग संबंध की इच्छाएं खत्म नहीं हो जातीं.
हालांकि यह भी सच है कि 'सच्चा' प्रेम विवाह भी पारंपरिक विवाह की तुलना में ज्यादा खुशी की कोई गारंटी नहीं है. लेकिन इसके बावजूद यह उम्मीद जरूर जगाता है कि दोनों को एक-दूसरे से सुख मिल सकता है. हां, यह जरूरी नहीं कि वैसा ही सुख मिले, जैसा वह चाहता है. फिर भी कुछ हद तक यह मिलता ही है.
रांची जैसे गैर-मेट्रो शहर के 25.5 फीसदी लोग यह कहते हैं कि उन्हें प्रेम का कोई एहसास नहीं है. लेकिन साथ ही वे एक बहुत बड़ी उस गैर-मेट्रो आबादी का हिस्सा हैं, जो विवाहेतर संबंधों में शामिल है. जाहिर है, वे किसी दूसरी जगह संतुष्टि पा रहे हैं. निश्चित तौर पर उस रिश्ते में तो नहीं, जिनमें उन्हें बांध दिया गया है. घर में नहीं, शायद शॉपिंग मॉल में.
लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी याद रखना चाहिए कि एक संस्था के रूप में विवाह के टूटने की घटनाओं में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ है. विवाह बनाए रखने के साथ ही किसी दूसरे व्यक्ति से अंतरंग संबंध बनाना एक अनोखी भारतीय प्रवृत्ति हो सकती है. इसलिए विवाह के स्थायित्व और साथ ही दिल की चंचलता के बारे में इंडिया टुडे का सेक्स सर्वे अगर कुछ हकीकत बयान करता है तो वह यह हैः उत्तरदाता किसी दूसरे के साथ अंतरंग संबंधों की खातिर अपनी शादी तोडऩे के लिए तैयार नहीं.