शूटिंग की सनसनी | सुरूचि सिंह, 20 वर्ष |महिलाओं की 10 मीटर एअर पिस्टल में दुनिया की नंबर वन निशानेबाज (आइएसएसएफ 2025) झज्जर, हरियाणा

क्या है जो उन्हें बनाता है सिरमौर : सालों के कड़े प्रशिक्षण के बाद उन्होंने आइएसएसएफ विश्व कप 2025 में लगातार एक के बाद एक तीन स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय शोहरत हासिल की

सुरूचि सिंह (फोटो- चंद्रदीप कुमार)

खेल के उनके शुरुआती दिनों से लेकर अब जब वे कई विश्व चैंपियनशिप जीत चुकी हैं और आने वाले मुकाबलों के लिए उनकी नजर ठीक निशाने पर टिकी है, उनमें बस एक ही फर्क आया है. वह यह कि अब वे निशाना साधने से पहले सोचतीं नहीं.

हरियाणा की 20 वर्षीया स्टार निशानेबाज सुरुचि सिंह, जिन्होंने हाल ही आइएसएसएफ (इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट फेडरेशन) के विश्व कप के पोडियम पर सातवीं बार जगह बनाई, कहती हैं, “पहले मेरे दिमाग में बहुत कुछ चलता रहता था. अब मैं बस बंदूक उठाती हूं और निशाना लगा देती हूं. यह मैं कहीं भी और किसी भी समय कर सकती हूं.”

यह वही शांत और स्थिर चित्त है जिसके बारे में कोच कहते हैं कि यह सिखाया नहीं जा सकता. यह शांत निर्लिप्तता उन्हें तभी से हासिल है जब वे कंधे की हड्डी में चोट की वजह से कुश्ती के लिए अयोग्य ठहरा दी गईं.

सुरुचि टेक्नीक को लेकर काफी सोच-विचार करती है लेकिन सहज ज्ञान उनकी पिस्तौल को अब पहले से कहीं ज्यादा रास्ता दिखाता है. उस खेल में भी जिसका मतलब ही वक्त के दबाव के बीच प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा सटीक होना है.

वे कहती हैं, “निशाना लगाते वक्त मैं दूसरे खिलाड़ियों के बारे में नहीं सोचती. मैं केवल अपने पर ध्यान देती हूं.” यह सलाह उनकी मां ने दी थी, जिसने उन्हें उतार-चढ़ावों से भरे इन सालों में स्थिर चित्त बनाए रखा. माता-पिता उनके रोल मॉडल हैं.

उन्होंने 13 साल की उम्र में खेल की तैयारी शुरू कर दी थी. छह साल बाद 2025 में आइएसएसएफ विश्व कप के 10 मीटर एअर पिस्टल मुकाबलों में लगातार तीन स्वर्ण पदक जीतकर और ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर को दूसरी पायदान पर धकेलकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शोहरत हासिल की.

इससे पहले वे 2024 की राष्ट्रीय चयन प्रतिस्पर्धाओं में शीर्ष पर आईं. वह कुछ ही महीने पहले ओलंपिक ट्रायल में बुरी तरह से तोड़ देने वाली नाकामी के बाद उनके ताबड़तोड़ प्रशिक्षण का नतीजा था.

वे कहती हैं, “वह मेरा सबसे मायूसी भरा लम्हा था, लेकिन उससे उबरने के लिए मैंने कड़ा प्रशिक्षण लिया.”

अगला पड़ाव एशियाई खेल हैं, जिनके लिए वे बेचैन नहीं, उत्साहित हैं. सुरुचि बिना थके कड़ी मेहनत के उसूल पर चलती है. आम तौर पर वे बहुत आगे का नहीं सोचतीं. वे कहती हैं, “हर मैच ही मेरा अगला लक्ष्य है.” अलबत्ता अगर कोई एक महत्वाकांक्षा उनके मन में कुलांचे भर रही है, तो वह है “ओलंपिक में तिरंगा फहराना”.

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