पौधों से प्रेरणा | आकांक्षा सिंह, 39 वर्ष | वरिष्ठ वैज्ञानिक, सीएसआइआर-सीआइएमएपी लखनऊ

क्या है जो उन्हें बनाता है सिरमौर : भारत की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के 2026 के युवा वैज्ञानिक पुरस्कार की विजेता आकांक्षा के पौधों और सूक्ष्मजीवों की अंतर्क्रियाओं पर किए गए काम ने टिकाऊ खेती के नए रास्ते खोले

आकांक्षा सिंह (फोटो- अजहर)

कभी डॉक्टर बनने की कल्पना किया करती थीं डॉ. आकांक्षा सिंह. मगर तकदीर उन्हें वनस्पति शास्त्र की तरफ ले आई. पीएचडी करने के बाद उन्हें अपनी जिंदगी का मकसद पौधों और सूक्ष्मजीवों की अंतर्क्रियाओं में मिला.

आज सीएसआइआर-सीआइएमएपी (केंद्रीय औषधीय और सगंध पौधा संस्थान) में वरिष्ठ वैज्ञानिक के तौर पर वे एंडोफाइट या अंतःपादप के सूक्ष्मदर्शीय संसार का अध्ययन कर रही हैं. एंडोफाइट ऐसे सूक्ष्मजीव हैं जो पौधों के ऊतकों के भीतर रहते हैं और अपने मेजबानों के साथ परस्पर फायदे का रिश्ता रख सकते हैं.

खेती के लिहाज से इस विचार के गहरे निहितार्थ हैं. मिट्टी में रहने वाले और अरक्षित सूक्ष्मजीवों के विपरीत अंतःपादप पौधों के भीतर सुरक्षित रहते हैं, जिससे वे ज्यादा लचीले बन जाते हैं.

कुछ अंतःपादप बीजों के जरिए पौधों की एक से दूसरी पीढ़ी में भी आ सकते हैं, जिससे ज्यादा लंबे समय तक टिकाऊ फायदों की संभावना बढ़ जाती है. सिंह की टीम औषधीय पौधों के माइक्रोबायोम का खाका तैयार कर रही है.

मैदानी परीक्षणों में कुछ संभावनाशील अंतःपादपों के उत्साहजनक नतीजे मिले हैं और अब उनका गेहूं, चावल और टमाटर की फसलों में परीक्षण किया जा रहा है.

जहां तक उनके अपने करिअर की बात है, कुछ अड़चनों के बाद निर्णायक मोड़ 2014 में आया जब उन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की महिला वैज्ञानिक योजना फेलोशिप मिली. सिंह के लिए यह शोध और अनुसंधान में लौटने का सेतु बन गई. अंततः सीआइएमएपी से जुड़कर उन्होंने अपने करिअर को नई दिशा दी.

उनके काम को अब एक ही साल में तीन राष्ट्रीय वैज्ञानिक मंचों पर मान्यता मिली है. सिंह के लिए यह उनकी मेहनत का फल है.

उनका लक्ष्य अब ऐसे व्यावहारिक तरीकों की खोज करना है जिनमें पौधों के भीतर सूक्ष्मजीवों की अदृश्य दुनिया ज्यादा अच्छी फसलें उगाने में किसानों की मदद कर सके, और खेती को जलवायु के बदलते परिदृश्य के लिए बेहतर ढंग से तैयार कर सके.

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