सारसों की संरक्षक | पूर्णिमा देवी बर्मन | 46 वर्ष कंजर्वेशन | बायोलॉजिस्ट और कम्युनिटी मोबिलाइजर, गुवाहाटी
क्या है जो उन्हें बनाता है सिरमौर : उन्होंने हरगिला आर्मी के रूप में महिलाओं के नेतृत्व वाला जमीनी संरक्षण आंदोलन खड़ा किया, जिसने ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क को डरावने पक्षी से पारिस्थितिकीय गर्व के प्रतीक में बदल दिया

पूर्णिमा देवी बर्मन (फोटो- नीलोतपल बरुआ)
जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे कल्पना की दुनिया में खोए रहते हैं, नन्हीं पूर्णिमा देवी बर्मन को अपनी प्रेरणा एक ऐसे पक्षी में मिली जिससे सब डरते थे. हरगिला यानी ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क को अपशकुन माना जाता था. उसकी बेढंगी शक्ल और मरे जीवों को खाने की आदतों के कारण लोग उससे घृणा करते थे.
वर्षों बाद एक फोन कॉल ने बचपन के उसी आकर्षण को जीवन का मिशन बना दिया. गांव वालों ने घोंसले वाला एक पेड़ इसलिए काट डाला था क्योंकि वे मानते थे कि ये परिंदे बुरा वक्त लेकर आते हैं. जब बर्मन गिरे हुए परिंदों को बचाने पहुंचीं तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा.
कुछ समय पहले ही उनकी जुड़वां बेटियां पैदा हुई थीं. उन्होंने घायल चूजों में से एक को उठाया और तुरंत उससे जुड़ाव महसूस किया, उन्हें अपने बच्चों का ख्याल आया.
उस क्षण उपजी सहानुभूति ने उन्हें कदम उठाने का हौसला दे दिया. बर्मन ने आगे चलकर हरगिला आर्मी बनाई, महिलाओं के नेतृत्व वाला जमीनी संरक्षण आंदोलन, जिसमें आज 2,000 से ज्यादा स्वयंसेविकाएं हैं. और वे घोंसलों की हिफाजत से बढ़कर काम करती हैं.
उन्होंने ग्रेटर एडजुटेंट स्टार्क को डर और मजाक का पात्र माने जाने वाले पक्षी से पारिस्थितिकीय गर्व और ग्रामीण पहचान के प्रतीक में बदल दिया. नब्बे के दशक में मुश्किल से 115 पक्षियों से असम में ग्रेटर एडजुटेंट की आबादी अब 1,800 से ज्यादा हो गई है.
हरगिला को बचाने के अभियान ने बर्मन को कई प्रतिष्ठित वैश्विक संरक्षण सम्मान दिलाए हैं, जैसे व्हिटली गोल्ड अवॉर्ड (2022), टाइम मैगजीन की विमेन ऑफ द ईयर (2025) में जगह और इस वर्ष नेशनल जियोग्राफिक वेफाइंडर अवॉर्ड.
हालांकि बर्मन मानती हैं कि उनका सबसे बड़ा पुरस्कार इस मनुष्य-जितने बड़े पक्षी की किस्मत बदलना और साथ ही लोगों के नजरिए में बदलाव लाना रहा है.
—ऋद्धि ऋषिका