एकेडमिक्स में नारी नेतृत्व | फरजाना अफरीदी | आर्थिक सशक्तीकरण, श्रम बाजार, जन नीति

क्या है जो उन्हें बनाता है सिरमौर : अफरीदी के शोध ने पिछले दशक में भारत में महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण, श्रम बाजारों और जन नीति से जुड़े विमर्श पर गहरा असर डाला

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फरजाना अफरीदी

फरजाना अफरीदी विदेश में पढ़ने और पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाली बिहार के अपने लंबे-चौड़े परिवार की पहली लड़की थीं. जिस लड़की की दादी और नानी दोनों निरक्षर हों, उसके लिए यह बड़ी उपलब्धि थी. इसका पूरा श्रेय वे अपने पिता को देती हैं, जो दिल्ली में सरकारी अफसर थे और जिन्होंने अपने बच्चों के लिए बड़े सपने देखे.

अफरीदी की परवरिश ने ही एकेडमिक्स में उनकी रुचियों को गढ़ा, जिसकी वजह से उन्होंने शोधकार्य की केंद्रीय थीम के तौर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण को चुना.

मात्रात्मक अर्थशास्त्र में अपने योगदान के लिए 2020 के महालनोबीस मेमोरियल मेडल की विजेता अफरीदी का कहना है कि निर्णायक मोड़ 2018 में आया जब उन्हें बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से शोध अनुदान मिला. वे कहती हैं, “उन्होंने मेरे शोध का मोल पहचाना...यह मेरे करिअर के लिए गेमचेंजर था.”

ज्यों-ज्यों उनका काम आगे बढ़ता गया, अफरीदी ने ज्यादा व्यापक व्यवस्था के नजरिए से श्रम बाजारों की जांच-पड़ताल शुरू की. इसमें उन्होंने नियोक्ता और कामगारों दोनों के व्यवहारों और उनके फैसलों पर असर डालने वाले प्रोत्साहनों का अध्ययन किया.

आज वे भारतीय सांख्यिकी संस्थान के दिल्ली केंद्र में अर्थशास्त्र विभाग की संकाय सदस्य (पिछले 15 सालों में आइएसआइ की अकेली महिला संकाय सदस्य) हैं, जबकि पढ़ाती भी हैं और दूसरी संस्थाओं में कई पहलकदमियों की अगुआ भी हैं.

उनका मौजूदा शोध उस बिंदु पर केंद्रित है जहां कामगार, उद्यम और उभरती टेक्नोलॉजी एक दूसरे से मिलते हैं और यह कि नई टेक्नोलॉजी मौजूदा लैंगिक असमानता पर कैसे असर डालेगी.

अपने सफर के बारे में बात करते हुए आफरीदी का कहना है कि नेतृत्व की वजह से जिंदगी की मांग और तकाजे कभी कम नहीं हुए. वे कहती हैं, “महिला की जिंदगी में चुनौतियां कभी खत्म नहीं होतीं, मेरी जिंदगी में तो कतई नहीं.”                      

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