कोशिका की रफूगर | डॉ. अंजना बद्रीनारायणन, 40 वर्ष | मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट | नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (एनसीबीएस), बेंगलूरू

क्या है जो उन्हें बनाता है सिरमौर : डीएनए को हुए नुक्सान की मरम्मत में कोशिकाओं की मदद करने वाले मॉलीक्यूलर मैकेनिज्म पर अभूतपूर्व खोज

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डॉ. अंजना बद्रीनारायणन

एक औसत मानव कोशिका अपने डीएनए में रोज 10,000 तक टूट-फूट झेल सकती है. इन्हें बहुत तेजी  से दुरुस्त भी किया जा सकता है. मरम्मत का यह तंत्र बेहद अहम है क्योंकि कैंसर समेत बहुत सारी बीमारियां कोशिका को हुए नुक्सान को गलत तरीके से दुरुस्त करने से होती हैं.

ऐसा ही एक जानलेवा नुक्सान है डबल-स्ट्रैंड या दो-सूत्रीय डीएनए में हुई टूट-फूट, जिसकी मरम्मत के लिए कोशिका के किसी दूसरे हिस्से से मिलते-जुलते डीएनए के टुकड़े की जरूरत होती है.

यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही दुश्वार, क्योंकि डीएनए बहुत ही सूक्ष्म कोशिका में काफी सुघड़ता से जमे होते हैं. अगर सिरे से सिरे तक फैलाई जाए तो मानव डीएनए की एक ही कोशिका 6 फुट तक फैल सकती है.

तो फिर इस भीड़ में डीएनए के टुकड़े एक दूसरे को कैसे खोज लेते हैं? पिछले दशक के दौरान राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र (एनसीबीएस) में अंजना बद्रीनारायणन की प्रयोगशाला ने हाइ-रिजॉल्यूशन माइक्रोस्कोपी के जरिए वास्तविक समय में बैक्टीरिया की कोशिकाओं को गहराई से देखते हुए इस पहेली की महत्वपूर्ण गायब कड़ी खोज निकाली. ठीक उसी तरह देखते हुए जैसे “पारिस्थितिकी वैज्ञानिक जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में देखते हैं.”

प्रयोगशाला में पाया गया कि उनका मरम्मत का तंत्र सघन छानबीन की बेहद विनियमित प्रक्रिया है. इसमें मोटर की तरह काम करने वाले विशिष्ट एंजाइम शामिल होते हैं. डॉ. अंजना बताती हैं, “यह डीएनए के उस टुकड़े और डीएनए की तलाशी ले रहे प्रोटीन को झपटकर पकड़ लेता है. हमने इस प्रक्रिया को चलाने वाली मोटर खोज निकाली, जिससे यह समझने की दृष्टि मिली कि कौन-सा मिलान सही है, कौन-सा नहीं.’’

जीवन विज्ञान का 2025 का इन्फोसिस पुरस्कार जीतने वाली अंजना की सूक्ष्मजीवों के भीतर डीएनए के रखरखाव में दिलचस्पी ऑक्सफोर्ड में ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान बढ़ी.

वे कहती हैं, “सूक्ष्मजीव या जीवाणु हमारे ग्रह पर सबसे अलग जीव प्रणालियां हैं...और हम अब भी बहुत कम जानते हैं कि वे जिंदा कैसे रहते हैं. रीसाइकल करने और कूड़ा-कर्कट हटाने के साधनों से लेकर हमें जिंदा रखने के लिए बेहद जरूरी बायोजियोकेमिकल चक्रों तक सब कुछ सूक्ष्मजीवों की जिंदगी पर निर्भर करता है.”         

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