प्रधान संपादक की कलम से
सहमति की अवधारणा अपने सबसे बुनियादी रूप में आजादी की सबसे छोटी इकाई है. इसे कितनी आजादी से इस्तेमाल किया जा सकता है, इससे किसी समाज की वास्तविक स्वतंत्रता के बारे में पता चलता है

- अरुण पुरी
यह बेहद आसान और हर लिहाज से साफ शब्द है: ना. फिर भी भारत भर में हर मिनट होने वाले लाखों अंतरंग प्रसंगों में यह शब्द उन महिलाओं के पास उपलब्ध नहीं होता, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है. यह कानूनी अधिकारों का बयान नहीं है, हालांकि वे भी मायने रखते हैं. यह शक्ति का बयान है. मना करने की शक्ति, सहमति वापस लेने की शक्ति, किसी भी यौन अंतरंगता पर सीमा तय करने और उसका सम्मान करवाने की शक्ति.
सामाजिक कंडिशनिंग ने पीढ़ियों की महिलाओं को अपने बारे में ऐसा रूप भीतर तक स्वीकार करना सिखाया है, जिसमें उनकी अपनी पसंद दूसरे नंबर पर है, उनकी असहजता महत्वहीन है और उनका इनकार समझौता योग्य है. 'सहमति' का विचार उस समाज में पूरी तरह जड़ नहीं पकड़ पाया है, जिसने ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को संपत्ति की तरह देखा, और अक्सर आज भी देखता है.
जो महिलाएं अपनी शक्ति का सम्मान करती हैं, वे भी पाती हैं कि बहुत-सी स्थितियों में 'ना' का मतलब 'ना' नहीं होता. यह जानने के लिए आपको समाजशास्त्रीय डेटा की जरूरत नहीं है. बस लोकप्रिय भारतीय सिनेमा देख लीजिए, जिसमें रोमांस के नाम पर दिखाई गई बहुत-सी चीजें इस धारणा पर टिकी थीं कि महिला का इनकार और जोर लगाने का निमंत्रण है. हीरो और विलेन एक ही प्रवृत्ति से व्यवहार करते थे. ऐसा सिनेमा बनाने करने वाली संस्कृति कहीं से अचानक नहीं आई. वह महिलाओं के प्रति समाज के रवैये को ही दिखाती है.
पिछले साल हमने भारत के 'सकल घरेलू व्यवहार' (ग्रॉस डोमेस्टिक बिहेवियर या जीडीबी) का एक अग्रणी सर्वे शुरू किया था. यह खुद हमारे उन पहलुओं को सामने लाने की कोशिश थी, जिन पर हम शायद ही कभी साफ-साफ बात करते हैं. इस हफ्ते हम इसे उस क्षेत्र में ले जा रहे हैं, जो शर्म और खामोशी से ढका रहता है: रोजमर्रा के लैंगिक रिश्तों में शक्ति की रूपरेखा. इसके केंद्र में 'सहमति' की अवधारणा है. हमने भारत के हर क्षेत्र, वर्ग, धर्म, वैवाहिक स्थिति और आयु समूह की 6,379 वयस्क महिलाओं से सहमति के अधिकार पर सवाल पूछे.
वे इसके बारे में क्या सोचती हैं? जब वे इसे इस्तेमाल करने की कोशिश करती हैं, तो क्या होता है? वे साथी, बुजुर्ग, बॉस और अजनबियों के सामने 'ना' कहने जैसे आसान काम को कैसे साधती हैं? हमारा उद्देश्य सरल था. हम भारत की यौन राजनीति की संहिता का पहला मसौदा तैयार करने की कोशिश करना चाहते थे—वे अलिखित निर्देश सिद्धांत, जो लाखों निजी संदर्भों में अंतरंग संबंधों के घटने-बढ़ने को नियंत्रित करते हैं.
यह जटिल विषय है, जिसमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी आयामों की अनगिनत परतें हैं. हम इस भरोसे के साथ आगे बढ़े कि इसकी बारीकियां और अस्पष्टताएं ही बहुत कुछ उजागर करेंगी. नतीजों ने इसे सही साबित किया: वे कहीं भरोसा दिलाते हैं, असहज करते हैं, चौंकाते हैं, लेकिन कुछ न कुछ उजागर जरूर करते हैं.
सीवोटर की ओर से किए गए पहले इंडिया टुडे सहमति सर्वे में बदलते देश की तस्वीर उभरती है—ऐसा देश, जिसने सहमति की शब्दावली तो सीख ली है, लेकिन उसे जीवन में उतारने के लिए अब भी संघर्ष कर रहा है. हमारे नमूने में महिलाओं की अपने इनकार के अधिकार को लेकर जागरूकता 100 में से करीब 59 स्कोर करती है. श्रेणियों के हिसाब से अपेक्षित अंतर दिखता है, लेकिन डेटा मोटे तौर पर एक समान दिशा में जाता है. असली खाई तब दिखती है, जब इसकी तुलना वास्तविक अनुभव से की जाती है.
जो महिलाएं यौन प्रसंगों पर नियंत्रण की क्षमता बताती हैं, उनका स्कोर 44 पर ठहरता है; कुछ उप-श्रेणियां 35 से भी नीचे चली जाती हैं. यानी वास्तविक स्वायत्तता जागरूकता से पूरे 15 अंक पीछे है. भारी बहुमत, 79 फीसद, को इसमें कोई संदेह नहीं कि 'नहीं का मतलब नहीं' होता है, फिर भी केवल 56 फीसद महिलाएं अनिच्छा होने पर सीधे इनकार करती हैं. कई महिलाएं बस मान जाती हैं और 'शांति बनाए रखने' के लिए असहजता को चुपचाप सहती हैं. अपना मन बदलने का अधिकार और भी कमजोर है: केवल 36 फीसद कहती हैं कि वापस ली गई 'हां' का सम्मान होता है.
जो महिलाएं किसी स्थिति के बीच में रुक जाती हैं, उन्हें आम तौर पर उसी श्रेणी में डाल दिया जाता है जिसमें इच्छा व्यक्त करने वाली महिलाओं को रखा जाता है: बहुत आक्रामक. सबसे बेचैन करने वाले आंकड़े वैवाहिक रिश्तों से जुड़े हैं. करीब आधी उत्तरदाता कहती हैं कि साथी उनके इनकार का सम्मान करते हैं. इसे भरोसा दिलाने वाला मानने से पहले, यह सोचिए कि इसका दूसरी आधी महिलाओं के लिए क्या मतलब है. अलग-अलग श्रेणियों में करीब 17 फीसद महिलाएं बताती हैं कि पति या साथी ने उन्हें जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया.
सार्वजनिक और पेशेवर जगहों पर उल्लंघन रोजमर्रा की बात है: 48 फीसद महिलाओं ने बसों और बाजारों में अनचाहे स्पर्श का सामना किया है. सबसे बड़े आंकड़े विश्वास के दायरे से जुड़े हैं. स्पष्ट बहुमत, 66 फीसद, मानता है कि विवाह के भीतर भी बलात्कार संभव है. तीन-चौथाई महिलाएं वैवाहिक बलात्कार को कानूनी मान्यता देने की समर्थक हैं, भले ही सुरक्षा उपायों के साथ.
मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह सर्वे क्या है और क्या नहीं है. यह भारतीय नारीत्व का पूरा हिसाब-किताब नहीं है. 6,379 उत्तरदाताओं का कोई सर्वे ऐसा नहीं हो सकता. यह पहला मसौदा है, एक ऐसे विषय को आंकड़ों का आकार देने की कोशिश, जिसे मापना आसान नहीं है, ठीक इसलिए क्योंकि वह लोगों के कहने और करने के बीच, सार्वजनिक रूप से स्वीकार की जाने वाली बातों और निजी तौर पर झेली जाने वाली चीजों के बीच मौजूद है. सहमति की अवधारणा अपने सबसे बुनियादी रूप में आजादी की सबसे छोटी इकाई है. इसे कितनी आजादी से इस्तेमाल किया जा सकता है, इससे किसी समाज की वास्तविक स्वतंत्रता के बारे में पता चलता है.
यह सर्वे एक शुरुआत है. आगे के पन्नों में चार प्रतिष्ठित निबंधकार, जो यौन राजनीति पर अलग-अलग नजरिया लेकर आते हैं, इस सांख्यिकीय तस्वीर को और गहराई देते हैं. उन्हें पढ़िए. यह बातचीत बहुत पहले शुरू हो जानी चाहिए थी.