सफलता के नए शिखर की ओर
हिमालय क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी यहां के आर्किटेक्चर के छात्रों के लिए जीवंत प्रयोगशाला की तरह है. वे खास किस्म की चुनौतियों से रूबरू होकर सीख रहे उनसे निबटना.

असल में, हिमाचल प्रदेश स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआइटी), हमीरपुर का आर्किटेक्चर विभाग वास्तुकला की पढ़ाई काएक अग्रणी केंद्र बनकर उभरा है. इसका मुख्य ध्यान स्थानीय जरूरतों पर केंद्रित है, चाहे वह पहाड़ी क्षेत्रों का विकास हो, जलवायु के अनुकूल डिजाइन बनाना हो या फिर पर्यावरण को नुक्सान न पहुंचाने वाले सस्टेनेबल निर्माण.
साल 2000 में शुरू हुआ आर्किटेक्चर विभाग एनआइटी, हमीरपुर के सबसे नए विभागों में से एक है, मगर इसने इतने समय में ही अपनी खास पहचान बना ली है. साल 2022 की रैंकिंग में यह 11वें पायदान पर था और 2026 में यह छलांग लगाकर छठे नंबर पर पहुंच गया है.
अभी इस विभाग में ग्रेजुएशन, पोस्ट-ग्रेजुएशन और पीएचडी को मिलाकर करीब 380 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. यहां शिक्षण का तरीका पारंपरिक ढर्रे से एकदम अलग है. छात्रों को सिखाया जाता है कि आर्किटेक्चर का मतलब सिर्फ इमारतें बनाना भर नहीं होता है बल्कि इसमें लोगों, समाज और पर्यावरण की जरूरतों को पूरा करने पर भी ध्यान देना होता है.
इसकी लोकेशन इस विभाग को सबसे अलग बनाती है. हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी छात्रों के लिए एक प्रैक्टिकल लैब की तरह काम करती है, जहां वे पहाड़ी इलाकों में निर्माण की असल चुनौतियां बेहतर ढंग से समझ पाते हैं.
भूस्खलन, चरम मौसम और पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण जैसी समस्याओं से निपटने के लिए छात्र खुद जमीनी स्तर पर केस स्टडी करते हैं और लाइव प्रोजेक्ट के साथ सीखते हैं. आज के समय में जब सरकारें और योजनाकार संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पर्यावरण अनुकूल समाधान ढूंढ रहे हैं, तब ऐसी व्यावहारिक शिक्षा और भी जरूरी हो जाती है.
विभाग के हेड और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अश्वनी कुमार बताते हैं, ''छात्रों को यहां पर पहाड़ी इलाकों की जटिल परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार किया जाता है. हमारे ज्यादातर प्रोजेक्ट असली फील्डवर्क पर आधारित होते हैं. छात्र हिमाचल और दूसरे पहाड़ी इलाकों में जाकर सीखते हैं और वहां की जरूरतों के हिसाब से सही समाधान तैयार करते हैं.’’
आज अन्य पेशेवर क्षेत्रों की तरह आर्किटेक्चर में भी डिजिटल तकनीक और एआइ का दखल बढ़ रहा है, तो एनआइटी हमीरपुर भी उसी हिसाब से ढल रहा है. डॉ. अश्वनी कुमार का कहना है कि विभाग हाइब्रिड तरीका अपना रहा क्योंकि एआइ डिजाइन के विकल्प देने और काम आसान बनाने में मदद तो कर सकता है, मगर आखिरी फैसला इंसान की रचनात्मकता, व्यावहारिक समझ और सूझबूझ से लिया जाना चाहिए.
मकसद यह है कि छात्र नई तकनीक के साथ काम करना भी सीखें और अपनी सोचने एवं डिजाइन करने की मौलिक क्षमता को भी बनाए रखें. संस्थान की रजिस्ट्रार डॉ. अर्चना संतोष नानोटी बताती हैं कि पढ़ाई और रिसर्च के बुनियादी ढांचे में किए गए निवेश से आर्किटेक्चर विभाग को लाभ हुआ है. उनके मुताबिक, ''अपग्रेडेड स्टुडियो और लैब, एडवांस डिजाइन सॉफ्टवेयर और इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च के मौकों ने यहां पढ़ाई के माहौल को बेहद समृद्ध कर दिया है.’’
उद्योग जगत की जरूरतों को ध्यान में रखकर दी जाने वाली शिक्षा का ही नतीजा है कि पिछले तीन वर्षों से यहां 100 फीसद प्लेसमेंट रहा है. कैंपस प्लेसमेंट के लिए आने वाली मुख्य कंपनियों में एलऐंडटी, डीएलएफ लिमिटेड और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स आदि शामिल हैं.
विभाग छात्रों को बिजनेस शुरू करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है. यहां के पूर्व छात्रों के शुरू किए मशहूर स्टार्टअप में 'मेक माइ हट’ और 'नॉर्थ’ शामिल हैं जो पारंपरिक हिमालयी भवन निर्माण कला और ज्ञान को संरक्षित रखने का भी काम कर रहे हैं.
यहां से पढ़कर निकले कई छात्र अब अमेरिका, सिंगापुर, यूएई और अन्य देशों की कंपनियों में बड़े पदों पर काम कर रहे हैं. हिमालय के अलहदा माहौल, अंतर्विषयक पढ़ाई और उद्योग से जुड़े संपर्कों का सही इस्तेमाल करके, यह विभाग ऐसे प्रोफेशनल तैयार करना चाहता है जो तेजी से बदलती दुनिया में अपनी जिक्वमेदारी भी बखूबी समझें.
हमारा डिपार्टमेंट हिमालयी क्षेत्र के नजरिए से, टिकाऊपन और आपदाओं को झेलने में सक्षम वास्तुकला की भविष्योन्मुखी शिक्षा मुहैया कर रहा है. यहां मॉडर्न टूल्स के साथ प्रैक्टिकल लर्निंग के जरिए इंडस्ट्री के लिए पूरी तरह से तैयार प्रोफेशनल्स मिलते हैं.
—प्रोफेसर एच.एम. सूर्य