विशेषांकः भारत की आवाज
अपना पहला गाना उन्होंने 13 साल की उम्र में रिकॉर्ड करवाया और फिर 73 साल लंबे करियर में भारत के सबसे प्रिय गानों की आवाज रहीं.

75वां स्वतंत्रता दिवस विशेषांक-पथप्रवर्तक / सिनेमा
लता मंगेशकर, 91वर्ष
श्रेया घोषाल
अपनी आदर्श से मैं पहली बार उनके स्टुडियो में मिली, जहां मैं रिकॉर्डिंग के लिए गई थी. मेरे संगीत निर्देशक जानते थे कि यह मेरे लिए कितना बड़ा पल है, इसलिए उन्होंने रिकॉर्डिंग रोक दी और मुझे बताया कि लताजी आ गई हैं.
मैं उसी पल सब कुछ छोड़कर उन्हें देखने नीचे भागी, जहां वे बैठी थीं, अपनी उसी जानी-पहचानी सफेद साड़ी में, चेहरे पर शर्मीली मुस्कान, उम्र के साथ थोड़ी झुकी हुई और फिर भी भीतर की रोशनी से जगमगाती आंखें. उनकी सादगी में गजब की आभा थी, जिसे देख मैं अवाक् रह गई.
उन्होंने मुझे पहचान लिया और अपना आशीर्वाद दिया, पर मैं इतनी हतप्रभ थी कि समझदारी की कोई बात न कह सकी. संगीत के बारे में मैं जो कुछ जानती हूं, उसका ज्यादातर मैंने उनके अनगिनत गाने सुनकर सीखा है. शहद में डूबी उनके कंठ की आवाज, स्वर, बारीकियां, अभिव्यक्तियां, ताकत, नजाकत, नफासत, सब बिल्कुल मुकम्मल है.
फिर भी यह बता पाना नामुमकिन है कि कभी-कभी जब मैं उनके ‘माई री मैं कासे कहूं’, ‘रस्मे उल्फत’ जैसे या कई अन्य गाने सुनती हूं तो मैं इतनी भावविभोर क्यों हो जाती हूं कि आंखों में आंसू आ जाते हैं.
यही वह अपरिभाषित पहलू है जिसे महसूस तो किया जा सकता है पर बताया नहीं जा सकता. कलाकार बारीकी से ईश्वर की मूर्ति गढ़ता है, पर हम उस मूर्ति की पूजा तभी करते हैं जब समृद्ध अनुष्ठानों से उनमें 'प्राण’ प्रतिष्ठा होती है. यही 'प्राण’ लताजी अपने हर गाने में डाल देती हैं.
श्रेया घोषाल राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता पाश्र्वगायिका हैं.