विशेषांकः मोहक अदाकार
बहुत कम लोग हैं जिन्होंने दिलीप कुमार जैसी बेशकीमती विरासत छोड़ी है, जिनकी शैली ने दो पीढ़ियों तक लोगों को प्रेरणा दी.

75वां स्वतंत्रता दिवस विशेषांक-पथप्रवर्तक / सिनेमा
दिलीप कुमार (1922-2021)
ऋचा चड्ढा
एक ऐसे दौर में जब उनके समकालीन अपने तकियाकलाम ठीक करने में व्यस्त थे, दिलीप कुमार ऐसे नायक थे जिन्होंने नायकत्व नहीं चुना. मधुमती के गाने चढ़ गयो पापी बिछुआ में कोई नाटकीय एंट्री नहीं थी.
वे बस चने खाते हैं, सामान्य अंदाज में आसपास देखते हैं और फिर इस खूबसूरत बाला (वैजयंती माला) को निहारते हैं, और इन सबके जरिए भी पुरअसर साबित होते हैं. मेथड ऐक्टिंग पर उनका जोर अपने समय के लिहाज से काफी आगे था.
दिलीप कुमार हमेशा उस क्षण में होते थे. उन्होंने संवाद अदायगी के प्रचलित लय का अनुसरण नहीं किया. उन्होंने भारत में अभिनेताओं के लिए स्तर काफी ऊंचा बना दिया. आज, जाने या अनजाने में, कई अभिनेता इस महान कलाकार की नकल जितना मुमकिन हो उतना कुदरती और असली दिखने की कोशिश में करते हैं. यह उनकी विरासत है.
मैं छोटी बच्ची थी जब मैंने उनको राम और श्याम में देखा था. वे कुछ अजीब हरकत कर रहे थे, मसलन उबला अंडा निगल जाना, लेकिन उन्होंने इसे भी मजेदार बना दिया था. और वे ट्रेजडी किंग के तौर पर मशहूर हैं. उनकी बहुमुखी प्रतिभा देखने लायक है.
यहां तक कि अगर आप उनके काम को 2021 के नजरिए से भी देखें, तो वे पुराने पड़े हुए नहीं नजर आएंगे. एक कलाकार के तौर पर मैं इस दिग्गज शख्सियत की ऋणी हूं.
ऋचा चड्डा मसान, फुकरे और गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों के लिए मशहूर हैं.