विशेषांकः तिपहिये पर फरिश्ता

कोल्हापुर में एक ऑटोरिक्शा चालक की नि:स्वार्थ सेवा ने सैकड़ों लोगों की मदद की

चलने को तैयार: शिंदे सैनिटाइजर की बोतल के साथ
चलने को तैयार: शिंदे सैनिटाइजर की बोतल के साथ

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ऑटोरिक्शा चालक, जितेंद्र शिंदे सुबह में कामकाज के लिए बाहर निकलने से पहले पीपीई सूट, डबल मास्क, रबड़ के दस्ताने और एक फेस शील्ड पहनते हैं. यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि शहर और जिला सचमुच कोविड-19 महामारी का प्रमुख केंद्र है, बल्कि इसलिए कि 3.4 प्रतिशत पर कोल्हापुर की कोविड मृत्यु दर (सीएफआर) महाराष्ट्र की 1.3 प्रतिशत सीएफआर की तुलना में दोगुने से अधिक है. 7.89 लाख की जनगणना आबादी वाला यह शहर और जिला मुख्यालय, कोल्हापुर, मुंबई से 374 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में, कर्नाटक के साथ महाराष्ट्र की सीमा के करीब है.

शिंदे शहर के तेजी से भरने वाले अस्पतालों में प्रतिदिन 15 कोविड -19 रोगी पहुंचाते हैं और अब तक 1,000 से अधिक रोगियों को पहुंचा चुके हैं. यह सेवा मुफ्त देने वाले 59 वर्षीय शिंदे 12 घंटे रोज काम कर रहे हैं और रोज 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करते हैं.

शिंदे की परोपकारी प्रवृत्ति बचपन की त्रासदी से उपजी है. उन्होंने पांच साल की उम्र में माता-पिता दोनों को खो दिया था. उन्हें अस्पष्ट रूप से याद है कि उनके पिता सरकार संचालित मलेरिया अनुसंधान संस्थान में काम करते थे जबकि मां गृहिणी थीं. वे कहते हैं, ''मेरे साथ जो हुआ, वैसा किसी के साथ नहीं होना चाहिए.''

कोविड की पहली लहर के दौरान, उन्होंने विकलांगों के लिए मुफ्त दवाएं, सब्जियां और किराना सामान वितरण की सेवा चलाई. दूसरी लहर में तेजी से बढ़ते मरीजों को देख, शिंदे ने मुफ्त परिवहन सेवा दी. वे हमेशा एक फोन कॉल की दूरी पर रहते हैं. वे दिन में दो बार पीपीई किट बदलते हैं, तीन बार नहाते हैं और वाहन को रोज एक लीटर सैनिटाइजर से साफ करते हैं. उनकी निस्वार्थ सेवा को परिवार से मदद मिलती है.

100 रुपए रोज किराए पर ऑटो लिया जाता है और पेट्रोल पर 600 रुपए खर्च करते हैं. घर का खर्च उनकी पत्नी रेखा, जो पड़ोसी के घरों में रसोइए का काम करती है और बेटे की पत्नी नूतन, जो एक क्लिनिक में कंपाउंडर है, चलाती हैं. पत्नी ने हाल ही में शिंदे की यह इच्छा पूरी करने के लिए एक लाख रुपये का कर्ज लिया था. वे कहती हैं, ''पैसे का क्या उपयोग है, अगर यह किसी की मदद न करे?''

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