विशेषांकः चलना ही जिंदगी
कोविड काल में केरल के दूरस्थ गांव में मां-बेटे की टीम स्थानीय सुपरहीरो बनकर उभरी

जब केरल के मेलूर गांव में 84 साल की बुजुर्ग कमलाक्ष्मी 9 मई को कोविड पॉजिटिव पाई गईं और उन्हें अस्पताल ले जाने की जरूरत महसूस हुई तो सड़क से करीब 400 मीटर दूर उनके घर तक एंबुलेंस नहीं पहुंच पा रही थी. उनके लक्षण काफी गंभीर थे और उन्हें फौरन चिकित्सा की जरूरत थी. उनके कोविड पॉजिटिव होने की वजह से पड़ोसी भी एंबुलेंस तक उन्हें पहुंचाने में मदद करने से हिचक रहे थे.
कमलाक्ष्मी की स्थिति की सूचना जब मेलूर ग्राम पंचायत के पालाप्पल्ली वार्ड की प्रतिनिधि साथी बाबू तक पहुंची तो वे अपने 27 साल के बेटे अनिल बाबू के साथ उनसे मिलने पहुंच गईं. जल्दी ही, पीपीई किट पहने अनिल ने कमलाक्ष्मी को एंबुलेंस तक पहुंचा दिया. वह उनके साथ तालुका अस्पताल तक गए जो वहां से आठ किलोमीटर दूर था और उपचार के बाद वही उन्हें अस्पताल से घर तक वापस भी लाए.
केरल के त्रिशूर जिले के मेलूर गांव के मां-बेटे की जरूरतमंद कोविड मरीजों की मदद की कई कहानियों में से यह महज एक कहानी है. 28 अप्रैल को पूरे मेलूर पंचायत क्षेत्र को कंटेनमेंट जोन घोषित किया गया क्योंकि इलाके में 200 से अधिक लोग कोविड पॉजिटिव पाए गए थे. अनिल, दिल्ली में एक आर्मी यूनिट में पोस्टेड हैं, लेकिन वे छुट्टियां मनाने मेलूर आए थे और इलाके में कोविड पॉजिटिव लोगों की मदद में अपनी मां के साथ जुट गए. इस गांव में 27,675 लोग रहते हैं और करीब 7,000 घर हैं, और यह पहाड़ी इलाका है. यहां एंबुलेंस नहीं पहुंच पाती है. तालुक अस्पताल में सिर्फ गंभीर मरीजों को ही दाखिला मिलता है.
मां-बेटे ने सात अन्य लोगों को चिकित्सा सहायता हासिल करने में मदद की. उनमें से सूर्यन भी हैं जो लॉकडाउन में पत्नी के साथ मुंबई से मेलूर लौटे थे. वे कहते हैं, ''साथी चेच्ची (बड़ी बहन) हमारी हर चिंता को एक बार में ही खत्म कर देती हैं.
जब हम लौटे तो मेरी पत्नी बीमार हो गई और तब उन्होंने देखभाल के लिए होम नर्स का इंतजाम किया.'' साथी ने कोविड यूथ ब्रिगेड भी गठित किया है, जिसमें 65 लड़के-लड़कियां हैं जो संक्रमितों की मदद के लिए चौबीसों घंटे काम करते हैं. मेलूर में माकपा के सदस्य एमएस बीजू कहते हैं, ''अभी स्वयंसेवा की जरूरत है. मदद के लिए सरकार इंतजार करेंगे तो हम अपनों को खो देंगे''