जल विशेषांकः मेड़ और पेड़ का कमाल

पानी की भारी किल्लत झेल रहे बुंदेलखंड के एक गांव ने पानी बचाने के लिए खेतों में अपने खर्चे पर जलबंध बनाए और सूखाग्रस्त गांव के अभिशाप से निकलकर पानी से भरपूर गांव बन गया, जहां साल में कई फसलें उगती हैं.

जल योद्धा जखनी गांव में उमाशंकर पांडेय (सबसे आगे) गांववालों के साथ
जल योद्धा जखनी गांव में उमाशंकर पांडेय (सबसे आगे) गांववालों के साथ

उत्तर प्रदेश में पानी का अभाव झेल रहे बुंदेलखंड के बांदा जिला मुख्यालय से प्रयागराज की ओर जाने वाले हाइवे पर 20 किलोमीटर दूर महुआ ब्लॉक का जखनी गांव एक दूसरी ही तस्वीर पेश करता है. यहां खेतों में सरसों, चना, गेहूं की फसल लहलहा रही है. खेतों में पानी है. गांव के सभी छह तालाब और 33 कुएं लबालब भरे हुए हैं. सूखे का प्रकोप झेलने वाले जखनी ने पानी प्रबंधन कर मिसाल बनाई है.

जखनी गांव में यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ. यहां के रहने वाले किसान 51 वर्षीय उमाशंकर पांडेय ने ‘‘खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़’’ जैसी अनोखी योजना शुरू कर जखनी का कायाकल्प कर दिया. 500 परिवारों वाले जखनी में पानी की किल्लत के कारण से आधे से ज्यादा परिवार पलायन कर दूसरे जिलों में चले गए थे.

इसी दौरान उमाशंकर पांडेय ने 25 अप्रैल, 2005 को दिल्ली के विज्ञान भवन में पानी पर आयोजित एक सेमिनार में हिस्सा लिया. इस सेमिनार में मुख्य अतिथि‍ के रूप में मौजूद तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपने संबोधन में सूखे का प्रकोप झेल रहे इलाकों के गावों को ‘‘जलग्राम’’ के रूप में विकसित करने की बात कही.

पांडेय बताते हैं, ''जलग्राम से तात्पर्य ऐसे गांव से था जहां पर प्राकृतिक ढंग से जल का संचयन किया जाए. विज्ञान भवन के सेमिनार के बाद मैंने जखनी को 'जलग्राम’ के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया.’’ पांडेय ने दीन दयाल उपाध्याय कृषि‍ विज्ञान केंद्र, चित्रकूट, गुजरात के अहमदाबाद और सूरत जैसे जिलों का भ्रमण कर यहां के गांवों में जल संचयन के तौर-तरीकों का अध्ययन किया.

इसके बाद पांडेय ने गांव के कुछ साथि‍यों के साथ मिलकर एक पहले 50 बीघा खेत में मेड़ बनाकर बारिश के पानी को खेतों में रोका. इस तकनीक ने कुछ काम किया. खेतों में एक बीघा में पांच कुंतल गेहूं पैदा हुआ. अगले वर्ष 2006 में उमाशंकर पांडेय और गांव के किसानों ने खेत की मेड़ पर अरहर, नींबू, अमरूद के पेड़ भी लगाए. 

पांडेय बताते हैं, ''मेड़ पर पेड़ लगाने से न केवल मेड़ मजबूत हुई बल्कि एक भी बूंद बारिश के पानी को व्यर्थ नहीं बह‍ जाने दिया. इससे खेत में काफी पानी मौजूद रहा और बासमती चावल की खेती भी संभव हुई.’’ वर्ष 2020 में जखनी गांव ने 25,000 कुंतल बासमती धान की रिकॉर्ड पैदावार की है. इससे किसानों ने 10 करोड़ रु. की कमाई की है. खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़ योजना ने इलाके में भूगर्भ जल स्तर में भी इजाफा किया है. 

उत्तर प्रदेश के जल शक्तिमंत्री डॉ. महेंद्र सिंह‍ कहते हैं, ‘‘जखनी गांव की ‘खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़’ योजना को यूपी सरकार प्रदेश में एक हजार से अधि‍क गांवों में लागू कर रही है. इससे न केवल किसान आत्मनिर्भर बनेंगे बल्कि पानी भी बचाएंगे.’’ 

बड़ी तस्वीर
समस्या बुंदेलखंड के जखनी गांव में पानी की कमी से खेती बर्बाद हो गई थी, जिसके चलते परिवार वहां से पलायन करने पर मजबूर हो गए थे

समाधान 2005 में ‘खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़’ कार्यक्रम की शुरुआत हुई, ताकि बारिश में बेकार बह जाने वाले पानी को बचाया जा सके और खेती के काम में भी उसका उपयोग हो सके.

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