विशेषांकः हाल बेहाल पर उम्मीद बरकरार
भारत कोविड महामारी की चुनौती को अच्छे से निपटा लेकिन दुनिया में सबसे कम स्वास्थ्य बजट के साथ पुरानी और नई चुनौतियां उठा रही हैं सिर

नया सवेरा रायसेन, मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पताल का नवजात शिशु वार्ड
सोनाली आचार्जी
स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि देश में कोविड से मरने वाले आधे लोगों को पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या थी—डायबिटीज और हाइपरटेंशन इनमें सबसे ऊपर रही. महामारी ने न सिर्फ और अधिक स्वास्थ्यकर्मियों और बेहतर स्वास्थ्य ढांचे की जरूरत की ओर इशारा किया बल्कि यह भी दिखाया कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां किस तरह चिंताजनक हैं.
हालांकि, कई अहम बीमारियों मसलन पोलियो, खसरा, टीबी, एचआइवी और अब कोविड से निपटने के लिए बड़ी कोशिशें होती दिखी हैं, लेकिन डायबिटीज और हृदय रोग देश के 10 बड़ी बीमारियों की फेहरिस्त में शामिल भी नहीं की गई हैं. फिर भी, भारत दुनिया में मधुमेह के रोगियों की राजधानी है (2025 तक यहां 6.99 करोड़ मरीज होंगे), जिसके रोगियों की संख्या हर 30 साल में दोगुनी हो रही है और ऐसा ही हृदय रोग के लिए भी है.
जीवनशैली की यह बीमारियां और अधिक चिंताजनक होती जा रही हैं क्योंकि यह शहरी और ग्रामीण, दोनों पृष्ठभूमि के युवाओं में तेजी से बढ़ रही है. हृदय रोग और डायबिटीज से भारत की अर्थव्यवस्था पर भी जोर पड़ेगा—अनुमान है कि यह लागत 2030 तक कोई 6.2 ट्रिलियन डॉलर होगी—क्योंकि वे मरीज की उत्पादकता को कम कर देते हैं और स्वास्थ्य पर खर्च को बढ़ा देते हैं.
मैक्स हेल्थकेयर में कार्डियोलजी के प्रमुख डॉ. वी.के. बहल कहते हैं, ''कोविड ने हमें दिखाया कि खराब स्वास्थ्य सुविधाओं से हम कितने कमजोर हो सकते हैं. शहरीकरण ने हमारे जीवन में चलने-फिरने को और कम कर दिया है और खाने-पीने की आदतें भी खराब हो गई हैं. हमें दीर्घकालिक स्वास्थ्य और प्रतिरोधी क्षमता के मामले में अधिक जागरूक होने की जरूरत है. अच्छी सेहत के लिए कोई फटाफट असर की गोली नहीं होती.’’
स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात से भी चिंतित हैं कि लोग देश में अपनी जेब से अधिक खर्च कर रहे हैं. एनएसएस (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) 2014 के मुताबिक, देश की आबादी के महज 15 फीसद लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है. 2015 में, अंदाजा है कि आबादी का करीबन 8 फीसद हिस्सा बीमारियों पर अपनी क्षमता से अधिक खर्च के चलते गरीबी के साए में चला गया. देश में कैंसर की दवाएं सबसे अधिक खर्चीली हैं. आयुष्मान भारत के सीईओ इंदु भूषण कहते हैं, ''अब हम स्वास्थ्य बीमा को डिजिटल बना रहे हैं, इससे क्लेम करने की प्रक्रिया आसान और तेज हो जाएगी. हम बीमा के फायदों के बारे में और अधिक जागरूकता फैला रहे हैं.’’
पिछले कुछ दशकों में कुछ बढ़त भी हासिल हुई है. आजादी के बाद हमारी जीवन प्रत्याशा में महत्वपूर्ण सुधार आया है. बाल मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आई है. बहरहाल, नवजातों की मौत अब भी समस्या है और हर साल पैदा होने के 28 दिन के भीतर मरने वाले नवजातों की संक्चया सालाना करीबन 6,00,000 लाख है.
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में बाल स्वास्थ्य आयुक्त डॉ. अजय खेड़ा कहते हैं, ‘‘सरकार के लिए नवजातों की सेहत उच्च प्राथमिकता पर है क्योंकि हमारे शिशुओं की मौत (जब कोई बच्चा जन्म लेने के एक साल के भीतर मर जाए) का 60 फीसद जन्म के 28 दिन के भीतर होती है. यह ऐसी अवधि होती है जब बच्चा सबसे नाजुक होता है. ऐसे में, तुरंत और बढिय़ा देखभाल की जरूरत होती है.
हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के तहत, हमने संकल्प किया है कि भारत में नवजात मृत्यु दर को 2025 तक कम करके 16 से नीचे और 2030 तक 12 से नीचे लाना है. नवजात मृत्यु दर को लेकर नीतिगत स्तर पर ऐसी प्रतिबद्धता किसी और देश ने जाहिर नहीं की है.’’
नवजात मृत्यु की सबसे बड़ी वजहों में से एक है स्वास्थ्य सुविधाओं तक कम पहुंच. भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या 2011 के 23,887 से बढ़कर आज 30,045 हो गई है, लेकिन नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र की औसत दूरी 8 किमी है जबकि जिला अस्पताल की औसत दूरी 34 किमी है. बहुत सारी जगहों पर वहां तक जाने के रास्ते खराब हैं और सार्वजनिक परिवहन की सुविधा भी सीमित है.
इसके साथ ही, प्राथमिक स्वास्थ्य के स्तर पर डॉक्टरों की भारी कमी है—2018 तक, 1,974 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक भी डॉक्टर नहीं था. सभी स्वास्थ्य सुविधाओं में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 82 फीसद कमी है. हालांकि, मेडिकल कॉलेजों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है और 1965 में जो संख्या 86 थी वह आज बढ़कर 400 हो गई है, फिर भी प्रति हजार मरीजों पर डॉक्टरों की संख्या डब्ल्यूएचओ के अनुशंसित स्तर (अभी यह प्रति हजार व्यक्ति पर 0.8 है, जबकि डब्ल्यूएचओ के मानकों के हिसाब से यह न्यूनतम प्रति हजार 1 होना चाहिए) तक पहुंचने से काफी दूर है.
मोटे तौर पर ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकतर डॉक्टर विदेशों में जाकर काम करना पसंद करते हैं और ज्यादातर लोग निजी रूप से प्रैक्टिस करने को तरजीह देते हैं. हेल्थकेयर एक्सपर्ट डॉ. मीरा शिवा कहती हैं, ‘‘स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने का एक ही तरीका है, इसमें निवेश करें. स्वास्थ्य के मामले में हम अब भी बजटीय आवंटन दुनिया में सबसे कम करने वाले देशों में हैं.
अगर आप अधिक डॉक्टर चाहते हैं और बेहतर सुविधा चाहते हैं, तो आपको इसके लिए पैसों की जरूरत होगी. आखिर इस सेक्टर की अहमियत जानने के लिए हमें महामारी का इंतजार क्यों करना चाहिए? आने वाले दशकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और उसकी लागत हमारे देश की सबसे बड़ी समस्याओं में एक होगी.’’ हमने कोविड -19 के खिलाफ एक मोर्चा शायद जीत लिया है, लेकिन ऐसा लगता है कि युद्ध तो शायद अभी बस शुरू ही हुआ है.
उम्मीद का टीका
सितंबर 1964 में कोलकाता में सड़क के किनारे टीकाकरण केंद्र
75 वें वर्ष का एजेंडा
भारत में हर साल करीबन 6,00,000 नवजात शिशु मर जाते हैं जो दुनिया में सर्वाधिक है. एनएचपी 2017 का लक्ष्य मृत्यु दर को घटाकर 2025 तक 16 (हर 1,000 नवजातों पर) तक करने का है
भारत को स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाना होगा, जो अभी दुनिया में सबसे कम में से एक है, ताकि जन-स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाई जा सकें
एनएसएस 2014 के मुताबिक, देश की आबादी के महज 15 फीसद के ही पास स्वास्थ्य बीमा है. 2015 में बीमारियों पर खर्च की वजह से 8 फीसद आबादी गरीब हो गई. क्या आयुष्मान भारत नतीजे देगा?
डायबिटीज और हृदय रोग जैसे जीवनशैली से जुड़े रोग खतरनाक तरीके से बढ़ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2012-2030 के बीच इसका भारत को करीबन 6.2 ट्रिलियन डॉलर का नुक्सान होगा
देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 82 फीसद कमी है. बेहतर मेडिकल शिक्षा और सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों के लिए इनसेंटिव से यह सुधर सकता है