विकास का बीजारोपण

किसानों के आंदोलन ने एक गहरी समस्या पर परदा डाल दिया है. इस सेक्टर की वृद्धि के लिए सुधार बेहद जरूरी हैं

स्थिर प्रगति दिल्ली के बाहर एक गांव में फूलभोगी की पैदावार
स्थिर प्रगति दिल्ली के बाहर एक गांव में फूलभोगी की पैदावार

71वर्ष गणतंत्र के कृषि

हाल के महीनों में भारत का कृषि क्षेत्र सुर्खियों में बना रहा और ऐसा सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर अड़े और प्रदर्शन कर रहे किसानों की वजह से नहीं है. गणतंत्र दिवस पर हिंसा के साथ, इन विरोध प्रदर्शनों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खियां बटोरीं. किसानों ने, जो मुख्य तौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों से हैं, स्पष्ट कर दिया है कि उनकी एकमात्र मांग केंद्र के तीन कृषि कानूनों को वापस लेना है.

थोड़ा गहरा जाने पर यह डर सामने आता है कि सरकार की मंशा कृषि क्षेत्र का उदारीकरण करने की है—एक ऐसी पूंजीवादी बाजार व्यवस्था विकसित करना जिसमें प्राथमिकता फसल की गारंटीशुदा खरीद और बफर स्टॉक तैयार करने से अलग होगी.

पिछले साल सितंबर में बड़े सियासी ड्रामे और यहां तक कि गठबंधन सहयोगियों के इस्तीफे के साथ, केंद्र ने कृषि कानूनों के तीन अधिनियम पारित किए—किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 पर किसानों अधिकार (संरक्षण और संरक्षण) समझौता और आवश्यक वस्तु अधिनियम में एक संशोधन.

सरकार की टेक यही रही कि इन कानूनों से कृषि बाजार खुलेगा, किसानों और निजी खरीदारों के बीच अनुबंध को एक कानूनी ढांचा दिया जा सकेगा और इलेक्ट्रॉनिक व्यापार के लिए एक बेहतर फ्रेमवर्क तैयार करना आसान हो सकेगा. सरकार ने अनाज, दालों, आलू, प्याज, खाद्य तेलों और तिलहनों के स्टॉक करने पर जारी बंदिशों में भी ढील दी.

जब भारत आजाद हुआ था, कृषि का जीडीपी में 54.4 फीसद का योगदान था और इससे 60 फीसद लोगों का रोजगार जुड़ा हुआ था. तब से, इस सेक्टर का जीडीपी में योगदान तेजी से कम हुआ है और यह 2019-20 में घटकर 17 फीसद रह गया है. फिर भी, खेतीबाड़ी के काम में देश की आबादी का करीब आधा हिस्सा लगा हुआ है.

इस तरह कृषि देश की अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है—देश की आधी आबादी आमदनी के लिए इस पर निर्भर है, और इससे अर्थव्यवस्था में मांग पर भारी असर पड़ सकता है. पिछले दो दशकों में इस सेक्टर ने 3 से 4 फीसद वृद्धि दर बनाए रखी है.

सरकार का कहना है कि नए कानूनों से नीतिगत स्थिरता आएगी और इससे निजी क्षेत्र को एक भरोसा मिलेगा कि वे पैदावार की खरीद और ग्राहकों तक उसे पहुंचाने के लिए भंडारण, प्रोसेसिंग और वितरण के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकें. साठ के दशक में हरित क्रांति ने भारतीय कृषि में बुनियादी बदलाव ला दिया था.

ऊंची पैदावार वाली फसलें, उर्वरक और उन्नत तकनीक ऐसे इलाकों में इस्तेमाल की गई जहां तय बरसात होती थी या भरोसेमंद सिंचाई के साधन उपलब्ध थे और इससे भारत खाद्य आयातक देश से एक सरप्लस खाद्यान्न वाले देश में तब्दील हो गया—पिछले रबी सीजन में 3 करोड़ मीट्रिक टन गेहूं की पैदावार सरप्लस रही. उस क्रांति का सबसे बड़ा फायदा पंजाब को मिला था जिसे सरकार ने पूर्व-निर्धारित कीमतों पर बड़ी मात्रा में चावल और गेहूं खरीदने का भरोसा दिलाया था.

विकास का बीजारोपण

हालांकि, मौजूदा नियामक व्यवस्था—गारंटीशुदा खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य—न सिर्फ भारत की खाद्य सुरक्षा के मकसद का संरक्षण करती है, बल्कि इसके आर्थिक असर भी हैं. मसलन, गारंटीशुदा खरीद से कुछ फसलों की पैदावार को अति-प्रोत्साहन मिलता है. दूसरी बात, समर्थन मूल्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के रास्ते में आड़े आते हैं—डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) के साथ गहन सौदेबाजी के बावजूद, भारत अभी भी कृषि पर अंतरराष्ट्रीय समझौते से बाहर है.

घरेलू मोर्चे पर पिछले दशक में निजी बाजारों और अनुबंध पर कृषि को बढ़ावा देने की कोशिशों के बावजूद राज्य सरकारें इस दिशा में बेहद धीमी गति से आगे बढ़ी हैं. महज 17 राज्यों में ही अनुबंध पर खेती के लिए कानूनी ढांचा तैयार हुआ है, केवल 15 सूबों में पशुधन बाजार और है और केवल 4 में जमीन को लीज पर देने की स्थापित प्रक्रिया है.

एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने इस वक्त इन कानूनों को निलंबित कर दिया है—और यह मामला इस साल जून में सुना जाएगा—यह सुधार आने वाले दशकों में इस सेक्टर के विकास की गति पर बड़ा प्रभाव डालने वाला साबित हो सकता है. इसके समर्थकों का तर्क है कि इन कानूनों के बिना, निजी कारोबारों को नीतिगत भरोसा नहीं मिलेगा कि वे इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर सकें और बाजार के लिए सप्लाई चेन तैयार सकें.

इससे इस सेक्टर की वृद्धि एपीएमसी मंडियों से बंधी रह जाएगी. वे यह भी कहते हैं कि इन सुधारों में आगे और भी काम होने हैं—मसलन, लीजिंग कानून, टाइटिल सुधार, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास और गुणवत्ता निर्धारण और भुगतान के लिए नियामक फ्रेमवर्क. फिलहाल, केंद्र ने ऐसी हर परियोजना की मदद के लिए एक लाख करोड़ रुपए के मद से एक एग्री इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड की स्थापना की घोषणा की है. ठ्ठ

75वें 
वर्ष का एजेंडा
निजी बाजारों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास. इसमें फूड प्रोसेसिंग, मूल्य संवर्धन, भंडारण और उत्पाद डिलिवरी की सुविधाएं शामिल हों.

रकबों की जीपीएस मैपिंग से मूल्यांकन में सुधार, आगे टाइटिल सुधार होने चाहिए.

कृषि अनुबंधों के साथ जमीन के उपयोग पर राज्य सरकारों को लीज के लिए फ्रेमवर्क तैयार करना होगा

उदारीकृत एपीएमसी फ्रेमवर्क में पशुधन बाजार को शामिल किया जाए ताकि कृषि बाजार बेहतर हो सकें

निजी फर्मों के लिए व्यापार के अधिक विकल्प देने के लिए कमोडिटी एक्सचेंज को बेहतर बनाया जाए

भारत जब आजाद हुआ तो इस सेक्टर की जीडीपी में हिस्सेदारी 54 फीसद थी. आज यह आंकड़ा 17 फीसद है

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