असल सौंदर्य बंदिशों का
शास्त्रीय गायिका मीता पंडित लॉकडाउन में रचनात्मकता, गायिकी में अपने सिग्नेचर और अभिनय के क्षेत्र में संभावना पर

• जीवंत प्रस्तुतियां हुए अरसा हो गया. पहले जैसी निर्बाध महफिलें कब तक सजने की संभावना है?
महफिलें तो शुरू हो चुकी हैं धीमी गति-लय से. लेकिन अभी मानो डरी-सहमी-सी हैं. सजेंगी तभी तब समाज पर से महामारी का खौफ पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. बच्चे-बूढ़े और जवान निर्भय होकर बाहर निकलने, अटेंड करने लगेंगे. लेकिन अभी हमारी उम्मीदों का ही सहारा है. इसे बनाए रखना बेहद जरूरी है. दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी.
• आपकी नजर में इस लॉकडाउन का कोई रचनात्मक अर्थ था?
इस कालखंड को मितव्ययिता के लिए भी विशेष रूप से जाना जाएगा. हम एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील भी तो हुए हैं. इसने अंतरात्मा के भीतर झांकना भी सिखा दिया. इस अवधि को मैंने इस तरह साधा मानो कोई जटिल लेकिन जरूरी बंदिश हो. बुजुर्ग माता-पिता जब संग हों तो चिंतन का सिरा अपने आप खुलने लगता है.
• पिता का व्यक्तित्व आपके भीतर एक गायक के रूप में सुरक्षित है, वहीं मां का सौंदर्य के रूप में. इस गौरवशाली मेल में आपका सिग्नेचर कहां है?
रोचक प्रश्न. मेरा सिग्नेचर है क्रियात्मक, कलात्मक, सृजनात्मक, कल्पनाशील, विचारशील, संवेदनशील, विनम्र, कोमल, शांत, सौम्य, प्रीतिमय, निर्भीक मीता. जो सबकी दोस्त है. बड़ी परंपरा से होकर भी मैं उसके आतंक से बाहर हूं.
• बंदिशों का सौंदर्य बनाए रखना एक तरफ चुनौती हो जाती है, दूसरी तरफ देह सौंदर्य मेंटेन करना. दोनों अलग बाते हैं, क्या कहेंगी?
मुझे दोनों विरासत में मिले. बचपन से उसी अनुशासन में रहती आई हूं. दादा और पिता को मैंने देखा कि कैसे वे देह का भी ख्याल रखा करते थे. मैं देह सौंदर्य को मानसिक सौंदर्य के साथ जोड़ती हूं. और मानसिक सौंदर्य बनाए रखना आजीवन चलने वाली लय है. गवैयों का साज उनका गला होता है.
आपके व्यक्तित्व में क्लासिक सौंदर्य के पहलू हैं. सांगीतिक सिनेमा के लिए ही सही, कभी किसी ने अभिनय के लिए कहा नहीं?
काफी लोगों ने कहा. जब मौका आएगा तो वह भी हो सकता है. लेकिन मेरी प्राथमिकता का क्षेत्र वह नहीं है. हां, बंदिशों में निहित सौंदर्य को उभारकर उसे अपनी गायिकी से साकार करने में जरूर मैं स्वयं को डुबो दिया करती हूं.
—राजेश गनोदवाले