प्रधान संपादक की कलम से
तेज आर्थिक विकास, संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने के वादे का सबसे बड़ा गारंटर है. हमें अभी बहुत लंबा सफर तय करना है.

अरुण पुरी
अगले चार वर्षों में भारत अपने इतिहास में तीन महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार करेगा. यह अगस्त 2022 में अपनी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा, और 2025 में भारत के गणतंत्र की 75वीं वर्षगांठ होगी. अनुमान लगाए गए हैं कि 2024 में हम चीन को पछाड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी भी बन जाएंगे. इसलिए, यही सबसे सही समय है इस समीक्षा के लिए कि एक देश के रूप में आज हम कहां खड़े हैं और कहां जा रहे हैं.
भारत का संविधान, जिसे नवंबर 1949 में अपनाया गया था, ने इस युवा गणतंत्र के अपने सभी नागरिकों के कल्याण की बात की. संविधान की प्रस्तावना के शुरुआती वाक्यों में उनके लिए न्याय—सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक—को सुरक्षित करने का संकल्प जताया गया.
हालांकि, भारत की राह पथरीली और अबूझ थी, और चुनौतियों का अंबार था. इसके करीब 37.6 करोड़ लोग गरीबी, कुपोषण और अशिक्षा के दलदल में धंसे हुए थे. ज्यादातर कृषि अर्थव्यवस्था होने के बावजूद, यह अपने सभी लोगों का पेट भरने में सक्षम नहीं था. 1951 में भारत की विश्व आय में हिस्सेदारी महज 3.8 प्रतिशत थी, विदेशी व्यापार लगभग न के बराबर था, और जर्जर समाजवादी अर्थव्यवस्था 3.5 प्रतिशत की सुस्त दर से बढ़ रही थी.
1990 के दशक की शुरुआत तक अर्थव्यवस्था की यही स्थिति रही. 1991 में आर्थिक उदारीकरण, जो 1960 के दशक की हरित क्रांति के बाद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव था, ने आर्थिक विकास की राह के बहुत से रोड़ों को दूर करके, इसे सरपट दौड़ाया.
राजमार्ग और घर अब अभूतपूर्व गति से बन रहे हैं. भारत में अब 59 लाख किलोमीटर सड़कें और राजमार्ग हैं, जो अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है. 2019 तक बने 10 करोड़ शौचालयों ने खुले में शौच के संकट को कम किया है. 2006 और 2016 के बीच स्वच्छता और पोषण में भारी सुधार ने भारत 27.1 करोड़ लोगों को ‘बहुआयामी गरीबी’ से बाहर निकालने में मदद की है.
तेज आर्थिक विकास, संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने के वादे का सबसे बड़ा गारंटर है. हमें अभी बहुत लंबा सफर तय करना है—भारत की प्रति व्यक्ति आय (पीसीआइ) 1,876 डॉलर (लगभग 1.36 लाख रु.) है, जो इसे निम्न मध्यम आय वाले देशों के बीच रखता है. भारत का पीसीआइ चीन के 8,130 डॉलर के एक चौथाई से भी कम है.
हमारे 7 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी (1.90 डॉलर या लगभग रु 139 प्रति दिन) में जीवनयापन करते हैं और इस दशा में जीने वाली यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. भारत के 19.1 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से केवल 16.8 प्रतिशत या छह में से मात्र एक के पास, नल का ऐसा कनेक्शन है जो पीने योग्य पानी की आपूर्ति करता है. 10 में से सात भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, फिर भी छोटे और सीमांत किसान औसतन 79,779 रु. सालाना कमाते हैं.
सौभाग्य से, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान स्वतंत्रता के समय 54.4 प्रतिशत से घटकर अब 17 प्रतिशत रह गया है, लेकिन अब भी यह 60 प्रतिशत लोगों को रोजगार देता है. आने वाले वर्षों में महाद्वीप के आकार की इस जनसांख्यिकी को अधिक उत्पादक आजीविका में बदलना हमारी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा. साथ ही फसलों के असंतुलित पैटर्न को दुरुस्त करना होगा, जो सरकार के मूल्यवान संसाधनों को अनाज के ऐसे पहाड़ जमा करने को विवश करता है जो गोदामों में सड़ जाता है.
हमारे भीड़भाड़ वाले शहरी क्षेत्रों को उन्नत करना जहां 2030 तक भारत की 40 प्रतिशत आबादी निवास कर रही होगी, एक और अनिवार्य आवश्यकता है. दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21 भारत में हैं. सबसे ज्यादा प्रभावित नई दिल्ली में, वायु प्रदूषण का खतरनाक स्तर लोगों की उम्र 9.2 साल कम कर रहा है.
हो सकता है कि हम कोविड के खिलाफ लड़ाई जीत रहे हों, लेकिन सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच अब भी एक दूर की कौड़ी लगती है. भारत दुनिया के उन देशों में हैं जहां स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च होता है, और भारत में प्रति 1,000 रोगियों पर 0.8 डॉक्टरों का अनुपात है और 1,000 रोगियों पर न्यूनतम एक डॉक्टर की उपलब्धता के डब्ल्यूएचओ के मानदंड तक पहुंचने में इसे अभी लंबा वक्त लगेगा.
गरीबी केवल तभी कम हो सकती है जब अर्थव्यवस्था पूर्ण गति से चले और यह दीर्घकालिक पुरस्कार हो सकता है बशर्ते भारत 2030 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था—दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था—बनने के लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता रहता है.
कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण बड़े पैमाने पर आर्थिक व्यवधान ने निस्संदेह इन जीडीपी लक्ष्यों को झटका दिया है. यह संकट ने हमें अपनी नीतियों में नाटकीय परिवर्तन के लिए ठोस वजहें दी हैं. सामने एक नया सबेरा दिख रहा है इसलिए इस मौके को हमें गंवाना नहीं चाहिए. उदाहरण के लिए, विश्व बैंक की भविष्यवाणी है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस साल 11.5 प्रतिशत और 2022 में 6.8 प्रतिशत की दर से वृद्धि दर्ज करेगी.
हमारा विशेष अंक 'नया गणतंत्र’ जिसे हमारे ब्यूरो ने संकलित किया है, अगले पांच वर्षों में आने वाली चुनौतियों को देखने की कोशिश करता है. हमारे संवाददाताओं ने उन 27 प्रमुख क्षेत्रों की थाह ली, जो अपने नागरिकों का कल्याण करेंगे. इनमें बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, रक्षा, स्वास्थ्य, जल, श्रम, पर्यावरण, कानून और न्याय, ग्रामीण और शहरी विकास, महिला कल्याण, अनुसूचित जाति और जनजाति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, और खेल शामिल हैं. चुनौतियां हर क्षेत्र में हैं.
सबसे महत्वपूर्ण बात, हमारी अपनी पूरी क्षमता का दोहन करने के लिए, सरकार को अपना औपनिवेशिक रवैया छोड़ देना चाहिए. हमारे औपनिवेशिक आकाओं ने सरकारों की सारी रूपरेखा ही बस लोगों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से तैयार की थी. अब हम एक स्वतंत्र राष्ट्र हैं और इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं है. इसके बजाए, हमें एक ऐसी सरकार की जरूरत है जो हमें सक्षम, सुगम और सशक्त बनाए.
इसके लिए नेतृत्व, दृष्टि, एकता और संकल्प की जरूरत है. अपने गणतंत्र की 75वीं वर्षगांठ पर, तो हमें एक ऐसे देश के रूप में स्थापित होना चाहिए जिससे दुनिया को ईर्ष्या हो—एक राष्ट्र जो स्वतंत्र और लोकतांत्रिक है और सभी को समृद्धि प्रदान कर रहा है.
(अरुण पुरी)