प्रधान संपादक की कलम से
क्या व्यापार के इर्द-गिर्द यह नजदीकी कामयाब होगी? इसके लिए सबसे जरूरी है पूर्वानुमान की गुंजाइश. अब संभावना को इस कसौटी पर आंकिए: ट्रंप के बारे में एक ही बात का अनुमान लगाया जा सकता है—उनकी अनिश्चितता

4 नवंबर, 2026 का आवरण
दुनिया उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. अंतरराष्ट्रीय रिश्ते बेहद अस्थिर हैं. हर देश ऐसे दौर में अपना रास्ता तलाश रहा है, जहां ‘जानी-पहचानी निश्चितताएं’ तेजी से बदल रही हैं, दोस्ती में स्थायित्व किसी महत्वपूर्ण खनिज जितना दुर्लभ है और बेलाग यथार्थवाद ही व्यवस्था का मूल सिद्धांत बन गया है. मगर ऐसी परिस्थितियों में भी एक पुराना सूत्र आगे की राह दिखाता है: राष्ट्रीय हित स्थायी होता है.
दो देशों के हित अगर पर्याप्त अहम और तात्कालिक जरूरतों पर मिलते हों तो समझौता संभव है. वाशिंगटन डीसी का संदेश लेकर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना है कि भारत और अमेरिका इसी सुखद स्थिति में हैं, जहां उनकी जरूरतें एक-दूसरे से मेल खाती हैं. कुछ मुद्दों पर तकलीफ हो सकती है मगर हमारे हितों में टकराव से ज्यादा मेल है—वह भी ऐसे मामलों में जिन्हें कोई पक्ष छोड़ नहीं सकता.
इंडिया टुडे को दिए खास इंटरव्यू में आश्वासन सबसे प्रमुख स्वर था और जल्द होने वाला भारत-अमेरिका व्यापार समझौता सबसे बड़ी खबर. लंबे समय से यह समझौता बारीकियों में उलझा रहा, मगर अब रूबियो के मुताबिक, “दोनों देशों के लिए फायदेमंद” शक्ल लेने के आखिरी चरण में है. उन्होंने कहा, “पांच साल बाद हम पीछे मुड़कर देखेंगे और कहेंगे कि यह दुनिया के सबसे मजबूत रिश्तों में से एक है.”
तीन दिन के आधिकारिक दौरे के आखिर में 55 वर्षीय विदेश मंत्री के साथ भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद थे. इस दुर्लभ साझा इंटरव्यू में उन्होंने ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से बातचीत की. मुंबई और जामनगर के उनके दौरे में शीर्ष स्तर की कूटनीतिक तथा कारोबारी बातचीत हुई. इंटरव्यू की जगह मुंबई का ताज महल पैलेस होटल था, जो 26/11 आतंकी हमलों का प्रमुख निशाना रहा था.
इस पृष्ठभूमि ने रूबियो के सबसे सटीक वाक्य को खास अर्थ दिया: “यह स्वाभाविक साझेदारी है.” आतंकवाद ऐसा मुद्दा है जिस पर दोनों देश सहज रूप से एकमत हैं. लेकिन यही संदर्भ एक पेचीदगी भी पैदा करता है. कोई साझेदारी कितनी मजबूत हो सकती है, जब उसके दोनों भागीदार ऐसे दूसरे रिश्ते निभाएं जो एक-दूसरे को असहज करते हों?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस एकतरफा दावे ने नई दिल्ली को असहज किया था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान युद्धविराम उन्होंने कराया. यह 2025 में भारत-अमेरिका रिश्तों का बड़ा अड़ंगा बना. पाकिस्तानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के प्रति वाशिंगटन की गर्मजोशी ने इसमें एक और पेचीदा परत जोड़ दी.
इसके अलावा ट्रंप के दौर में अमेरिका ने कई ऐसे दंडात्मक कदम उठाए जो साझेदारी की धारणा से मेल नहीं खाते—रूसी तेल खरीदने पर जुर्माने समेत 50 फीसद टैरिफ और एच-1बी वीजा पर 1,00,000 डॉलर का शुल्क, जिसकी सबसे ज्यादा मार भारतीयों पर पड़ी. भारत की ओर से विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर वाशिंगटन को असहज कर सकता है.
भारत अपनी शर्तों पर ऊर्जा सुरक्षा चाहता है और रिश्तों में डगमगाहट के दौरान नई दिल्ली ने कई पक्षों में संतुलन साधने के लिए ब्रिक्स से नजदीकी बढ़ाई. इसके जवाब में रूबियो ने एक बड़ी जरूरत के ढांचे में मतभेदों को जगह देने वाला व्यावहारिक और ठोस तर्क दिया. उन्होंने कहा कि कोई वाशिंगटन से ‘अमेरिका फर्स्ट’ की प्राथमिकताओं को हल्का करने की उम्मीद नहीं कर सकता.
यह ट्रंप की नीति का आधार है और खास तौर पर भारत को निशाना बनाकर नहीं गढ़ा गया, भले ही इसकी कुछ नीतियों का उस पर असर पड़ता हो. उन्होंने कहा कि भारत हमेशा अपने राष्ट्रीय हित सबसे आगे रखेगा.
इसी तरह, “मुझे उम्मीद है कि हर कोई समझेगा कि राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अपने लोगों, अपने कामगारों और अपने देश को पहले रखेगा. दोस्त वहां मिलकर काम कर सकते हैं जहां हमारे मौजूदा साझा हित, पुराने रिश्ते और समान मूल्य हमें मतभेद दूर करके दोनों देशों के लिए अच्छे नतीजों तक पहुंचने का मौका देते हैं.”
तात्कालिक कसौटी व्यापार समझौता है, जिसका ब्यौरा बताने से रूबियो ने इनकार कर दिया. मगर उभरते तालमेल की असली धुरी ऊर्जा है. उन्होंने भारत के ऊर्जा स्रोतों में “विविधता” लाने की जरूरत को उसके आम अर्थ से आगे जाकर समझाया. “बात रूसी तेल कम खरीदने की उतनी नहीं है, जितनी अमेरिकी या वेनेजुएला का कच्चा तेल ज्यादा खरीदने की.” रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी का रूबियो का दौरा इसी सोच को दिखाता है.
भारत की रिफाइनिंग क्षमता पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले ज्यादा कच्चे तेल के शोधन में मदद कर सकती है. खासकर वेनेजुएला का कच्चा तेल भारी और बहुत गाढ़ा होता है, इसलिए युद्ध से पैदा कीमतों के उतार-चढ़ाव को तुरंत थामने के लिए उसका इस्तेमाल आसान नहीं. लिहाजा रूबियो जब कहते हैं, “ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भारत के हित में है,” तो उसका मतलब भारत को केवल निष्क्रिय शुद्ध खरीदार नहीं, बल्कि सक्रिय खिलाड़ी बनाना है.
बाकी भू-राजनैतिक दिशा इस नए मोड़ से तय भी होती है और आपसी फायदे के इसी सूत्र से अपना तर्क भी पाती है. महत्वपूर्ण खनिजों जैसे संसाधनों को किसी एक देश के हाथों में सिमटने से रोकने के लिए सहयोग पर रूबियो ने कहा, “हम किसी भी देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहते. मैं खास तौर पर चीन की बात नहीं कर रहा.”
राजदूत गोर ने अमेरिका में भारतीय निवेश को इसी तरह के “दोनों के फायदे” वाला लेनदेन बताया, जो “स्थानीय समुदायों में अमेरिकियों के लिए नौकरियां पैदा कर रहा है.” इसके बदले “अमेरिकी कंपनियां, खासकर आइटी से जुड़ी कंपनियां, यहां आई हैं.” एआइ, बायोमेडिसिन और दवा उद्योग—परस्पर सहयोग के संभावित क्षेत्रों की सूची लंबी है.
यही नया सुरक्षा ढांचा है, जिसमें भू-आर्थिक सुरक्षा लगातार प्रमुख चालक बन रही है. रक्षा सहयोग, क्वाड जैसे मंच और इस जरूरत को मजबूती देने वाली साझा “मूल्य” आधारित शर्तें इसके सहायक हैं. क्या व्यापार के इर्द-गिर्द यह नजदीकी कामयाब होगी? इसके लिए सबसे जरूरी है पूर्वानुमान की गुंजाइश. अब संभावना को इस कसौटी पर आंकिए: ट्रंप के बारे में एक ही बात का अनुमान लगाया जा सकता है—उनकी अनिश्चितता.